प्र1.
समय-रेखा पर कार्य करते हुए क्या आपने सा.सं.पू. से सा.सं. तक के बदलाव पर ध्यान दिया है? याद कीजिए कि आपने कक्षा 6 के अध्याय ‘इतिहास की समयरेखा एवं उसके स्रोत’ के अंतर्गत इतिहास में समय को मापने के बारे में क्या पढ़ा था?
उत्तर
हाँ — और समय-रेखा पर यही वह स्थान है जहाँ सबसे अधिक सावधानी चाहिए।
- सा.सं.पू. का अर्थ है सामान्य संवत पूर्व और सा.सं. का अर्थ है सामान्य संवत। दोनों एक ही बिंदु पर मिलते हैं और बीच में कोई वर्ष 0 नहीं होता : 1 सा.सं.पू. के तुरंत बाद 1 सा.सं. आता है।
- सा.सं.पू. के वर्ष उलटे चलते हैं। 200 सा.सं.पू. 100 सा.सं.पू. से पहले का है। इसलिए पुष्यमित्र शुंग (185 सा.सं.पू.) खारवेल से पहले हुए, यद्यपि 185 बड़ी संख्या है।
- सा.सं. के वर्ष सीधे चलते हैं — गौतमीपुत्र शातकर्णी (लगभग 100 सा.सं.) कनिष्क (लगभग 150 सा.सं.) से पहले हुए।
यदि अंतराल इस विभाजन को पार करता हो तो जोड़िए, घटाइए मत।
185 सा.सं.पू. से 150 सा.सं. तक = 185 + 150 = 335 वर्ष
(घटाने पर 35 वर्ष आता — जो पूर्णतः गलत है।)
185 सा.सं.पू. से 150 सा.सं. तक = 185 + 150 = 335 वर्ष
(घटाने पर 35 वर्ष आता — जो पूर्णतः गलत है।)
ऐसा क्यों : सा.सं.पू. और सा.सं. एक ही बिंदु पर टिकी दो सीढ़ियाँ हैं — एक पीछे की ओर चढ़ती है, दूसरी आगे की ओर। एक सीढ़ी से दूसरी तक जाने के लिए दोनों की ऊँचाइयाँ जोड़नी पड़ती हैं, अंतर नहीं निकाला जाता।
क्या आप जानते हैं? भारत की अपनी संवत् गणनाएँ भी हैं। पृष्ठ 135 पर आने वाला शक संवत 78 सा.सं. से आरंभ होता है — इसलिए शक वर्ष ग्रेग्रोरियन वर्ष से 78 कम होता है (जनवरी से मार्च तक 79 कम)।