अन्वेषण अध्याय 7 इसे अनदेखा न करें

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
क्या आपने चंद्रगुप्त द्वितीय के नाम में ‘द्वितीय (II)’ देखा?
उत्तर

हाँ — और यह केवल सजावट नहीं, एक संकेत है। यह संख्या इतिहासकारों ने जोड़ी है, क्योंकि इसी वंश में उनसे पूर्व एक और ‘चंद्रगुप्त’ हो चुके थे — उनके पितामह। संख्या के बिना किसी अभिलेख में दोनों को अलग पहचानना असंभव होता।

इस पुस्तक में तीन नाम लगभग एक-से हैं। इन्हें इस प्रकार अलग रखिए —

नामराजवंशपहचान
चंद्रगुप्त मौर्यमौर्यपिछले किसी अध्याय में पढ़े गए — बिलकुल भिन्न राजवंश, गुप्तों से शताब्दियों पहले। इन्हें गुप्तों से न जोड़ें
चंद्रगुप्त प्रथमगुप्तपितामह। गुप्त साम्राज्य के प्रारंभिक विस्तार की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण; सिक्कों (चित्र 7.4, रानी कुमारदेवी के साथ) और रणनीतिक गठबंधनों के लिए प्रसिद्ध
चंद्रगुप्त द्वितीयगुप्तपौत्र, जिन्हें विक्रमादित्य भी कहा जाता है; विष्णु के उपासक, अभिलेखों पर गरुड़; लौह-स्तंभ वाले शासक, जिन्हें अभिलेख में ‘चंद्र’ कहा गया है
एक ही नाम बार-बार क्यों: अनेक भारतीय परिवारों में पहले पुत्र का नाम उसके पितामह के नाम पर रखा जाता है — यह परंपरा आज भी कहीं-कहीं देखी जाती है। इसलिए किसी राजपरिवार में हर दूसरी पीढ़ी में ‘चंद्रगुप्त’ नाम लौट आना बिलकुल सामान्य बात थी। रोमन अंक तो इतिहासकारों की आधुनिक सुविधा हैं।
संकेत: यदि प्रश्न में ‘लौह-स्तंभ किसके शासनकाल में स्थापित हुआ’ पूछा जाए तो उत्तर है चंद्रगुप्त द्वितीय। यदि ‘सिक्कों और गठबंधनों से साम्राज्य की नींव किसने रखी’ पूछा जाए तो उत्तर है चंद्रगुप्त प्रथम
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