प्र1.
‘पावनता’ क्या है?
उत्तर
अध्याय एक सीमित किंतु स्पष्ट परिभाषा देता है : पावनता का तात्पर्य उन समस्त धार्मिक एवं आध्यात्मिक भावों से है, जो पावन और दिव्य हों तथा आदर एवं श्रद्धा के योग्य हों।
असली प्रश्न यह है कि यह ‘भाव’ किसमें दिखाई देता है। इस अध्याय में चार अलग-अलग वस्तुओं में :
| क्या पावन बनता है | अध्याय से उदाहरण |
|---|---|
| कोई विशेष स्थल या धार्मिक स्थान, जो गंभीर भावों, उच्च विचार और संवेदनाओं को प्रकट करता है | बोधगया का महाबोधि स्तूप; अमृतसर का अकाल तख्त; अजमेर शरीफ़ |
| किसी विशेष प्रकार की यात्रा — तीर्थयात्रा | पंढरपुर की वारी, जिसमें प्रतिवर्ष इक्कीस दिन पैदल चला जाता है |
| वह मार्ग जिससे होकर यात्रा गुजरती है | सबरीमाला तक पहाड़ियों और जंगलों से होकर जाने वाला कठिन मार्ग, जिसके प्राकृतिक संकेत स्वयं पावन माने जाते हैं |
| स्वयं वह भूभाग | संपूर्ण भारत, और अंतत: संपूर्ण पृथ्वी — पृथ्वी माता या भूदेवी |
यह क्यों महत्वपूर्ण है: अंतिम पंक्ति के कारण ही भारत में पावनता केवल धर्म और आध्यात्मिकता तक सीमित नहीं रहती। यह भूगोल और अनेक परंपराओं से भी जुड़ जाती है। इसी से अध्याय का शीर्षक संभव होता है — केवल मंदिर नहीं, भूभाग भी पावन हो सकता है।
ध्यान दें: पुस्तक ने सावधानी से लिखा है — ‘इस अध्याय के सीमित संदर्भ में'। ‘पावन’ शब्द अन्य अर्थों में भी प्रयोग होता है, जैसे पावन कर्तव्य या पावन वचन। यहाँ केवल धार्मिक और आध्यात्मिक अर्थ लिया गया है।