प्र1.
मोहनजोदड़ो की इस मुहर का अवलोकन कीजिए। क्या आप इसके ऊपरी भाग में अंकित पत्तियों को पहचान सकते हैं?
उत्तर
हाँ — ये पीपल की पत्तियाँ हैं।
चित्र 8.12 को ध्यान से देखिए। छोटी वर्गाकार मुहर के ऊपरी आधे भाग में पत्तियों का एक पंखा-सा फैला है, जिसकी प्रत्येक पत्ती हृदय के आकार की है और आगे जाकर लंबी नोक में बदल जाती है। यही लंबी नोक पीपल की पहचान है; किसी अन्य सामान्य भारतीय वृक्ष में ऐसी नहीं होती। पत्तियों के नीचे आमने-सामने दो सींगधारी पशु-आकृतियाँ हैं और सबसे नीचे सिंधु लिपि के चिह्नों की एक पंक्ति है।
| क्या देखें | मुहर पर |
|---|---|
| पत्ती का आकार | चौड़ी, हृदय जैसी पत्ती जो लंबी पतली नोक में समाप्त होती है |
| सजावट | एक केंद्रीय डंठल से फैलती पत्तियों का गुच्छ, जो मुहर का ऊपरी भाग भर देता है |
| पत्तियों के नीचे | दोनों ओर संतुलित रूप से रखी दो सींगधारी आकृतियाँ |
| निचली पट्टी | सिंधु लिपि के अब तक न पढ़े जा सके चिह्न, जिनमें एक पहिए जैसा चिह्न भी है |
यह क्यों महत्वपूर्ण है: यह मुहर लगभग 4,500 वर्ष पुरानी है। यदि मोहनजोदड़ो में पीपल इतना महत्वपूर्ण था कि मुहर पर अंकित हुआ, तो इस एक वृक्ष के प्रति श्रद्धा उपमहाद्वीप में कम-से-कम साढ़े चार सहस्राब्दियों से चली आ रही है — “पीपल का वृक्ष कितनी शताब्दियों से भारत के सांस्कृतिक भूगोल का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।” यही वृक्ष आज भी हिंदू, बौद्ध, सिख तथा जैन — चारों के लिए पावन है, और उसका वानस्पतिक नाम भी यही कहता है : फाइकस रिलिजियोसा।
आइए विचार करें (पृष्ठ 179): पुस्तक आगे बताती है कि पीपल के अनेक भागों का औषधीय उपयोग होता है — पत्तियाँ त्वचा रोगों में और छाल उदर रोगों के निवारण में उपयोगी होती है — तथा वर्ष भर हरा रहने के कारण यह अनेक पक्षियों और पशुओं को भोजन एवं आश्रय देता है। अर्थात यह वृक्ष केवल प्रतीक नहीं है : यह औषधालय भी है और जीवों का आश्रय भी। उसे पावन कहना समुदाय का वह उपाय है जिससे ऐसा वृक्ष कभी काटा न जाए।