प्र1.
नीचे दी गई तालिका में भारत की क्षेत्रीय भाषाओं में पावन निकुंजों के लिए प्रयुक्त नाम दिए गए हैं। क्या आप इसमें कुछ नए नाम जोड़ सकते हैं?
उत्तर
हाँ। पहले पुस्तक में दिए नौ नाम एक साथ देख लीजिए :
| भाषा / राज्य | पावन निकुंज का नाम |
|---|---|
| मलयालम | कावु |
| तमिल | कोविलकादु |
| कन्नड़ | देवरे कादु |
| मराठी | देवराई |
| खासी (मेघालय) | खलाव केनतांग |
| हिंदी (हिमाचल प्रदेश) | देव वन |
| झारखंड | सरना |
| छत्तीसगढ़ | देवगुड़ी |
| राजस्थान | ओरण |
अब तालिका की तीन खाली पंक्तियाँ। भारत के अन्य भागों में प्रयुक्त नाम इस प्रकार हैं :
| भाषा / क्षेत्र | नाम | टिप्पणी |
|---|---|---|
| राजस्थान (बिश्नोई एवं अन्य समुदाय) | केंकड़ी, जोगमाया | किसी स्थानीय देवता से जुड़े वन, जिनमें खेजड़ी वृक्ष और काले हिरण भी सुरक्षित रहते हैं |
| उत्तराखंड / कुमाऊँ | देवभूमि वन, बुग्याल के देव-स्थल | ग्राम देवता से जुड़े वन और ऊँचे बुग्याल |
| मणिपुर (मैतेई) | उमंगलाई | ‘वन देवता’ के निकुंज, गाँवों के भीतर और आस-पास |
| केरल | सर्पकावु | नाग देवता का निकुंज, प्राय: पारिवारिक भूमि के एक कोने में |
| कर्नाटक (कोडगु) | देवरकाडु, नागबन | अकेले कोडगु जनपद में आज भी सैकड़ों बचे हैं |
| महाराष्ट्र (कोंकण) | देवराई, राई | प्राय: किसी जलस्रोत के उद्गम पर, जिससे जल भी सुरक्षित रहता है |
| ओडिशा | जाहेरा, ठाकुरम्मा जंगल | संताल तथा अन्य समुदायों के निकुंज-स्थल |
| मेघालय (खासी) | लॉ किंतांग, लॉ लिंगदोह | मावफ्लांग (चित्र 8.14) सबसे प्रसिद्ध है |
इसे स्वयं पूरा कैसे करें: सबसे अच्छा उपाय है पूछना। पता कीजिए कि (1) आपके गाँव के पास का वन या पुराने वृक्षों का झुरमुट आपकी अपनी भाषा में क्या कहलाता है, (2) वह किस देवता का है, और (3) वहाँ क्या करना वर्जित है — प्राय: लकड़ी काटना, आखेट करना, यहाँ तक कि सूखी टहनी ले जाना भी। स्थानीय नाम खाली पंक्ति में लिखिए और उसके साथ वह नियम भी।
इतने भिन्न नाम क्यों: क्योंकि पावन निकुंज किसी सरकारी आदेश से नहीं बने। प्रत्येक समुदाय ने अपनी भाषा में और अपने देवता के नाम पर अपने वन की रक्षा की। नाम भिन्न हैं; विचार आश्चर्यजनक रूप से एक ही है — यह वन देवता का है, इसलिए इसे कोई हानि नहीं पहुँचा सकता — मेघालय से केरल तक।