प्र1.
पारदर्शी कागज की एक शीट लीजिए जिसका उपयोग अनुरेखण (ट्रेसिंग) के लिए किया जा सकता हो। ‘साम्राज्यों उदय’ का नामक अध्याय में दिए व्यापारिक मार्गों के मानचित्र का अनुरेखण कीजिए। इसे महत्वपूर्ण तीर्थस्थलों के मानचित्र पर रखिए। आप इसके द्वारा क्या अवलोकन कर पा रहे हैं?
उत्तर
करने की विधि: पारदर्शी शीट को चित्र 5.5 (पृष्ठ 92) पर रखिए। पहले समुद्र-तट की रेखा खींचिए, फिर उत्तरापथ एक रंग से, दक्षिणापथ दूसरे रंग से और शेष मार्ग तीसरे रंग से, और नगरों को बिंदुओं से अंकित कीजिए। अब शीट उठाकर चित्र 8.6 (पृष्ठ 174) पर रखिए और तट-रेखा तथा 70° पू०, 80° पू०, 90° पू० की रेखाओं को मिलाइए, जिससे दोनों मानचित्र ठीक एक-दूसरे पर बैठ जाएँ।
अवलोकन: दोनों मानचित्र बहुत हद तक एक-दूसरे पर बैठ जाते हैं।
| व्यापार-मार्ग का नगर (चित्र 5.5) | चित्र 8.6 में उसी स्थान पर क्या है |
|---|---|
| काशी | वाराणसी — एक महान तीर्थ, ठीक पास में सारनाथ (बौद्ध) |
| कौशांबी | प्रयागराज — कुंभ मेला स्थल, गंगा-यमुना के संगम पर |
| मथुरा | मथुरा, जहाँ की यात्रा सिख परंपरा में गुरु नानक से जुड़ी है |
| उज्जयिनी | उज्जैन — कुंभ मेला स्थल तथा महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग |
| द्वारका | द्वारका, पश्चिमी चार धाम |
| कलिंगनगर | पुरी के निकट, पूर्वी चार धाम |
| कांचीपुर | कांचीपुरम, मंदिर-नगर तथा शक्तिपीठ |
| मदुरई | मदुरई, और आगे रामेश्वरम का मार्ग — दक्षिणी चार धाम |
| पाटलिपुत्र / राजगृह / चंपा | पटना साहिब (सिख), तथा बिहार-झारखंड के बौद्ध और जैन स्थल |
| तक्षशिला, सुदूर उत्तर-पश्चिम में | व्यापार-जाल और शक्तिपीठ-जाल, दोनों का उत्तर-पश्चिमी छोर |
इससे तीन निष्कर्ष स्पष्ट निकलते हैं :
- तीर्थयात्रा मार्ग और व्यापार मार्ग बहुत हद तक एक ही सड़कें हैं। उत्तरापथ उत्तर में पूर्व-पश्चिम चलता था — मथुरा, काशी और पाटलिपुत्र से होकर; दक्षिणापथ कौशांबी से उज्जयिनी होते हुए प्रतिष्ठान तक। दोनों शृंखलाएँ तीर्थों की भी शृंखलाएँ हैं।
- दोनों जाल एक-दूसरे को पुष्ट करते थे। तीर्थयात्रियों को भोजन, वस्त्र, पात्र और आवास चाहिए था, जो व्यापारी देते थे; व्यापारियों को सुरक्षित, व्यस्त मार्ग और विश्रामगृह चाहिए थे, जो तीर्थयात्रियों की आवाजाही से बने रहते थे। कुछ व्यापारी “तीर्थयात्री के रूप में” चलते हुए अपनी वस्तुएँ दूर के नगरों तक ले जाते थे।
- दोनों जाल एक ही परिणाम की व्याख्या करते हैं। वस्तुएँ, सिक्के, विचार और कहानियाँ एक ही रेखाओं पर चलीं — इसीलिए अध्याय इसे “भारतीय उपमहाद्वीप के सांस्कृतिक एकीकरण का प्रमुख कारण” कहता है।
अंतर भी देखिए: व्यापार-मानचित्र में तटीय और बंदरगाह रेखाएँ प्रबल हैं (भरुकच्छ, सोपारा, ताम्रलिप्ति, मुचिरि, कावेरीपट्टिनम), जो समुद्री व्यापार से जुड़ी थीं; जबकि तीर्थ-मानचित्र हिमालय में भीतर तक जाता है (बद्रीनाथ, केदारनाथ, अमरनाथ), जहाँ कोई व्यापार-मार्ग नहीं जाता। जहाँ धन ले जाता है, वहाँ मार्ग बंदरगाहों तक जाते हैं; जहाँ श्रद्धा ले जाती है, वहाँ पगडंडियाँ पर्वतों पर चढ़ती हैं।