अन्वेषण अध्याय 8 आइए विचार करें

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
उन स्थानों और प्राणियों के चित्रों को सावधानीपूर्वक देखिए, जिन्हें पावन माना जाता है। उत्तर में यमुना, पूर्व में महानदी तथा दक्षिण में कावेरी, ये सभी नदियाँ पावन मानी जाती हैं। फिर भी ये इतनी प्रदूषित कैसे हो गईं? क्या आपके आस-पास ऐसे पावन स्थल हैं, जो मानवीय गतिविधियों के कारण इसी तरह प्रदूषित एवं क्षीण हो गए हैं? हमारे पावन स्थलों की पावनता को बनाए रखना किसका दायित्व है? कक्षा में इस विषय पर चर्चा कीजिए।
उत्तर

पहले देखिए कि चित्रों में क्या है। चित्र 8.18 में चार छायाचित्र हैं : रासायनिक झाग से ढकी नदी, जिसके दूसरे तट पर कारखाने हैं; पहाड़ी नदी के किनारे जमा प्लास्टिक कचरा; प्लास्टिक की बोतलों और थैलियों का ढेर; और एक गाय — जो पावन मानी जाती है — उसी कचरे में मुँह डाले हुए। प्रत्येक चित्र किसी पावन वस्तु के साथ कूड़ाघर जैसा व्यवहार दिखाता है।

नदियाँ इतनी प्रदूषित कैसे हो गईं? किसी एक कारण से नहीं, अनेक कारणों से एक साथ :

कारणनदी पर प्रभाव
अनुपचारित मल-जल, तेजी से बढ़ते नगरों सेसबसे बड़ा स्रोत; नाले सीधे नदी में गिरते हैं
औद्योगिक अपशिष्ट — रंग, चर्मशोधन, रसायनजल विषैला हो जाता है; चित्र का झाग इसी का परिणाम है
खेतों का बहाव — उर्वरक और कीटनाशकशैवाल बढ़ते हैं, ऑक्सीजन घटती है, मछलियाँ मरती हैं
प्लास्टिक और ठोस कचरा, पूजा-सामग्री सहिततट भर जाते हैं; पशु उसे खाते हैं, जैसे चित्र की गाय
अति दोहन — बाँध, नहरें, नलकूपजल कम होने से नदी की अपशिष्ट बहा ले जाने की क्षमता घट जाती है

किंतु इन पाँचों के पीछे एक गहरा कारण है, जिसे अध्याय स्वयं बताता है : लोगों और पावन भूभाग के बीच का पुराना सौहार्दपूर्ण संबंध आज “संकट” में है। हम आज भी नदी को ‘गंगा जी’ कहते और पूजते हैं — और फिर उसी को नाला बना देते हैं। श्रद्धा केवल कर्मकांड रह गई, उत्तरदायित्व नहीं रहा। जो व्यक्ति नदी को सचमुच माता माने, वह उसमें कारखाने का पाइप नहीं खोलेगा।

आस-पास के क्षीण होते पावन स्थल। कक्षा में इनके वास्तविक नाम बताइए :

  • गाँव का तालाब या मंदिर का कुंड, जो अब गाद, प्लास्टिक और जलकुंभी से भरा है।
  • वह पावन निकुंज, जो खेतों, मकानों या खदान के कारण सिकुड़ गया — अध्याय बताता है कि ऐसे अतिक्रमण से हजारों निकुंज घट गए हैं।
  • नगर के नीचे की नदी का वह भाग, जहाँ नालों के मिलते ही जल का रंग बदल जाता है।
  • वह पहाड़ी मंदिर, जिसकी ढलानें अब नंगी हैं या रैपर और बोतलों से भरी हैं।
  • सड़क चौड़ी करने में कटे पुराने वृक्ष, या नलकूपों के बाद सूख गया जलस्रोत।

दायित्व किसका है? सबका — चार स्तरों पर; और सच यह है कि एक भी स्तर चूक जाए तो काम नहीं चलता।

कौनक्या करना चाहिए
हम में से प्रत्येकजल में कचरा न डालें; कपड़े का थैला लें; फूल बिना प्लास्टिक के चढ़ाएँ; पावन स्थल से अपना कचरा वापस लाएँ
समुदाय — मंदिर समितियाँ, पंचायत, नागरिक समूहतालाब, निकुंज या घाट की सफ़ाई और रखवाली; पुराने नियमों को पुनर्जीवित करना; श्रमदान
उद्योग और व्यापारअपशिष्ट को छोड़ने से पहले उपचारित करना; व्यय प्रदूषक उठाए, नदी नहीं
सरकारमल-जल शोधन संयंत्र बनाना और सचमुच चलाना; कानून लागू करना; निकुंजों और नदियों को विधिक संरक्षण देना — जैसे न्यूजीलैंड ने तारानकी माउंगा के लिए किया
इसमें संविधान कहाँ आता है: अध्याय अंत में स्मरण कराता है — “हमारी राष्ट्रीय धरोहर की रक्षा करना हमारा कर्तव्य है। हमारा संविधान भी हमें इसकी याद दिलाता है।” अनुच्छेद 51क में प्रत्येक नागरिक के मूल कर्तव्यों में सम्मिलित है — प्राकृतिक पर्यावरण की, जिसमें वन, झील, नदी और वन्य जीव हैं, रक्षा और संवर्धन करना, प्राणिमात्र के प्रति दया रखना, तथा हमारी सामासिक संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का सम्मान करना। अत: पावन नदी की चिंता केवल धार्मिक भावना नहीं, संवैधानिक कर्तव्य है।
कक्षा में यह कीजिए: अपने क्षेत्र का कोई एक पावन स्थल चुनिए। दो स्तंभों में लिखिए — वरिष्ठ लोगों के अनुसार वह पहले कैसा था और आज कैसा है। फिर तीसरा स्तंभ बनाइए — इस महीने से आप में से प्रत्येक क्या एक कार्य आरंभ कर सकता है।
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