प्र1.
विद्यालय का उदाहरण हमें प्रतिनिधित्व की अवधारणा और इसकी कार्यप्रणाली को समझने में सहायता करता है। यद्यपि विद्यार्थियों की समिति, संसदीय और विधायी समितियों से भिन्न होती है, जैसे कि विद्यालय के कक्षा प्रतिनिधि संसद अथवा विधान सभा के सदस्यों से काफी भिन्न होते हैं। ये भिन्नताएँ क्या हैं? कक्षा में अपने शिक्षक के साथ चर्चा कीजिए और इन भिन्नताओं की एक सूची बनाइए।
उत्तर
विचार दोनों में एक ही है — बहुतों द्वारा चुने गए कुछ लोग सबकी ओर से बोलते हैं। इसके अतिरिक्त लगभग सब कुछ भिन्न है। कक्षा-चर्चा के लिए तैयार सूची नीचे दी गई है।
| विद्यालय का कक्षा प्रतिनिधि | संसद सदस्य / विधान सभा सदस्य | |
|---|---|---|
| कौन चुनता है | एक कक्षा के विद्यार्थी | पूरे निर्वाचन क्षेत्र के सभी वयस्क मतदाता, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार से |
| कौन खड़ा हो सकता है | उसी कक्षा का कोई भी विद्यार्थी | वह नागरिक जो आयु, नागरिकता और कानून द्वारा निर्धारित अन्य योग्यताएँ पूरी करता हो |
| अधिकार का स्रोत | प्रधानाध्यापिका का समिति बनाने का निर्णय | भारत का संविधान |
| किस विषय पर निर्णय | विद्यालय के काम — प्रार्थना सभा के वक्ता, खेलकूद, स्वच्छता, बस्तारहित दिवस की गतिविधियाँ | कानून और बजट, जो पूरे राज्य या देश पर बाध्यकारी होते हैं |
| शक्तियाँ | विद्यालय के नियम सुझाना और उनके क्रियान्वयन में सहायता करना; प्रधानाध्यापिका ही प्रमुख रहती हैं | कानून बनाना और बदलना, कर तथा व्यय स्वीकृत करना, मंत्रियों से प्रश्न पूछना, नीतियों पर बहस |
| निर्णय का प्रभाव | एक विद्यालय पर, एक सत्र के लिए | लाखों-करोड़ों लोगों पर, कभी-कभी पीढ़ियों तक |
| कार्यकाल और हटाना | प्रायः एक सत्र या एक वर्ष; विद्यालय तय करता है | लोक सभा और अधिकांश विधान सभाओं के लिए पाँच वर्ष, कानून द्वारा निश्चित; हटाना केवल निर्धारित प्रक्रिया से |
| उत्तरदायित्व | सहपाठियों और शिक्षकों के प्रति | अगले चुनाव में मतदाताओं के प्रति, सदन के प्रति और न्यायालय के प्रति |
| वेतन और कार्यालय | कुछ नहीं — यह स्वैच्छिक सेवा है | वेतन, भत्ते, कार्यालय और क्षेत्र विकास निधि |
सबसे गहरा अंतर: विद्यार्थी समिति उस विद्यालय के भीतर सलाह और सहायता करती है, जिसे प्रधानाध्यापिका चलाती हैं। विधायिका स्वयं राज्य के तीन अंगों में से एक है — वह कानून बनाती है और सरकार को भी उसका पालन करना पड़ता है। इसीलिए संसदीय समिति अधिकारियों को बुला सकती है और सरकारी व्यय की जाँच कर सकती है, जबकि विद्यालय की समिति ऐसा नहीं कर सकती।
ध्यान दें: फिर भी समानता उपयोगी है। दोनों एक ही प्रश्न का उत्तर देते हैं — बहुत से लोगों की बात एक साथ बोले बिना कैसे सुनी जाए? दोनों का उत्तर है — प्रतिनिधित्व।