प्र1.
तीनों तरीकों में से आप सबसे अधिक प्रभावी किसे मानते हैं और क्यों?
उत्तर
तीसरा तरीका — प्रत्येक कक्षा के विद्यार्थी अपना एक प्रतिनिधि चुनें और वही प्रतिनिधि मिलकर समिति बनाएँ। तीनों को इस कसौटी पर कसिए कि समिति को वास्तव में करना क्या है।
| तरीका | क्या शीघ्र निर्णय हो सकेगा? | क्या हर कक्षा की बात सुनी जाएगी? | निष्कर्ष |
|---|---|---|---|
| 1. विद्यालय के सभी विद्यार्थी समिति में | नहीं — सैकड़ों सदस्यों के साथ निर्णय तक पहुँचना और उसका अनुपालन कराना बहुत कठिन | सिद्धांततः हाँ | न्यायसंगत, पर अव्यावहारिक |
| 2. प्रधानाध्यापिका स्वयं सदस्य चुनें | हाँ — समिति छोटी रहेगी | नहीं — अधिकांश विद्यार्थियों को दायित्व नहीं मिलेगा और अपनी बात पहुँचाने का कोई तरीका नहीं होगा | व्यावहारिक, पर न्यायसंगत नहीं |
| 3. प्रत्येक कक्षा अपना प्रतिनिधि चुने | हाँ — समिति छोटी रहेगी | हाँ — हर कक्षा का कोई व्यक्ति उसकी आवश्यकताओं का पक्ष रखेगा | न्यायसंगत भी और व्यावहारिक भी |
ऐसा क्यों: समिति को दो ऐसी बातें एक साथ चाहिए जो एक-दूसरे को खींचती हैं — वह इतनी छोटी हो कि काम कर सके और इतनी व्यापक हो कि सबका प्रतिनिधित्व करे। पहला तरीका प्रतिनिधित्व देता है पर कार्यक्षमता नहीं, दूसरा कार्यक्षमता देता है पर प्रतिनिधित्व नहीं। तीसरा दोनों देता है, क्योंकि कुछ लोग बहुतों की आवाज लेकर चलते हैं। यही कारण है कि बड़े देश प्रत्यक्ष लोकतंत्र की जगह प्रतिनिधि लोकतंत्र चुनते हैं।
क्या आप जानते हैं? यही तर्क बड़े पैमाने पर भी लागू होता है। भारत में लगभग 96 करोड़ मतदाता हैं, जो लोक सभा के 543 सदस्य चुनते हैं। इनमें से हर सदस्य वही कर रहा है जो आपका कक्षा प्रतिनिधि करता है — बहुत-सी आवाजें उस कक्ष तक ले जाना जो निर्णय ले सकने लायक छोटा हो।