प्र1.
परस्परं मेलयत — (क) अ३, ऊ, ऋ, एँ, कू ; (ख) ह्रस्वः, २ १/२, प्लुतः, दीर्घः, अनुनासिक-स्वरः
उत्तर
पुस्तक में अ३ — प्लुतः का मेल उदाहरण-स्वरूप पहले ही जोड़कर दिखाया गया है। शेष चार का मेल इस प्रकार है —
| (क) | (ख) | कारणम् / कारण |
|---|---|---|
| अ३ | प्लुतः | त्रिमात्रः स्वरः (३) — पुस्तके प्रदत्तम् उदाहरणम् |
| ऊ | दीर्घः | ‘उ’ इत्यस्य दीर्घ-रूपम् — द्विमात्रः (२) |
| ऋ | ह्रस्वः | समानाक्षरेषु ह्रस्व-स्वरः — एकमात्रः (१) |
| एँ | अनुनासिक-स्वरः | चन्द्रबिन्दु-युक्तः स्वरः — नासिकया सह उच्चार्यते |
| कू | २ १/२ | क् (१/२) + ऊ (२) = २ १/२ मात्राः |
कू = क् + ऊ
= १/२ + २
= २ १/२ मात्राः
= १/२ + २
= २ १/२ मात्राः
मेल कैसे पहचानें: (ख) स्तम्भ में चार नाम स्वर के प्रकार बताते हैं (ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत, अनुनासिक) और एक मात्रा-सङ्ख्या है (२ १/२)। मात्रा-सङ्ख्या केवल उसी के साथ जुड़ेगी जो अकेला स्वर न होकर व्यञ्जन-सहित अक्षर है — वही ‘कू’ है। शेष तीन शुद्ध स्वर हैं, इसलिए उन्हें उनके प्रकार से जोड़ा गया।
Check it yourself: ‘एँ’ में चन्द्रबिन्दु है — पाठ में इसी प्रकार के काँस्कान् तथा सँस्कर्ता शब्द ‘अनुनासिक-स्वर-युक्ताः शब्दाः’ शीर्षक के नीचे दिये गये हैं। अनुनासिकता से मात्रा नहीं बदलती — आँ की मात्रा आ जितनी (२) ही रहती है।