दीपकम् अध्याय 13 वयम् अभ्यासं कुर्मः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
वर्णानां कतिविधाः मात्राः भवन्ति ?
उत्तर

चतुर्विधाः।
[वर्णों की चार प्रकार की मात्राएँ होती हैं।]

१. ह्रस्वः — एकमात्रः (१)
२. दीर्घः — द्विमात्रः (२)
३. प्लुतः — त्रिमात्रः (३)
४. अर्धमात्रा — व्यञ्जनम् (१/२)
क्यों: स्वरों की तीन मात्राएँ (ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत) और व्यञ्जनों की एक ही मात्रा (अर्धमात्रा) — तीन + एक = चार। पाठ का वाक्य है — ‘एवं संस्कृत-भाषायाः वर्णानां चतुर्विधाः मात्राः भवन्ति।’
प्र2.
एकविधा मात्रा केषां भवति ?
उत्तर

व्यञ्जनानाम्।
[एक ही प्रकार की मात्रा व्यञ्जनों की होती है।]

कारण: स्पर्श, अन्तःस्थ, ऊष्म तथा अयोगवाह — व्यञ्जनों के चारों भेदों का उपभेद एक ही है — एकविधा अर्ध-मात्रा। पाठ में कहा गया — ‘तेषाम् एषः — एक एव उपभेदः भवति — एकविधा अर्ध-मात्रा इति।’
व्याकरण: ‘केषाम्’ षष्ठी बहुवचन है, अतः उत्तर भी षष्ठी बहुवचन में — व्यञ्जनानाम् (नपुंसकलिङ्गम्)।
प्र3.
स्वरेषु कतिविधाः मात्राः भवन्ति ?
उत्तर

त्रिविधाः।
[स्वरों में तीन प्रकार की मात्राएँ होती हैं।]

ह्रस्वः (१)  ·  दीर्घः (२)  ·  प्लुतः (३)
क्यों: स्वरों के दो भेद हैं — समानाक्षराणि तथा सन्ध्यक्षराणि। इन दोनों के आगे तीन उपभेद होते हैं — ‘तयोः अग्रे — एते त्रयः उपभेदाः भवन्ति — त्रिविधाः मात्राः इति।’ ये तीनों मात्राएँ केवल स्वरों में ही मिलती हैं, व्यञ्जनों में नहीं।
प्र4.
संस्कृत-भाषायाम् आहत्य कति स्वराः भवन्ति ?
उत्तर

द्वाविंशतिः (२२) स्वराः।
[संस्कृत-भाषा में कुल मिलाकर बाईस स्वर होते हैं।]

वर्गःह्रस्वःदीर्घःप्लुतःसङ्ख्या
समानाक्षराणिअ, इ, उ, ऋ, ऌआ, ई, ऊ, ॠ, –अ३, इ३, उ३, ऋ३, ऌ३१४
सन्ध्यक्षराणिए, ऐ, ओ, औए३, ऐ३, ओ३, औ३
आहत्य२२
गणना: समानाक्षरों में अ, इ, उ, ऋ — इन चारों के तीन-तीन रूप (३×४ = १२) तथा ‘ऌ’ के केवल दो रूप (ऌ, ऌ३) — क्योंकि ‘ऌ’ का दीर्घ रूप संस्कृत में नहीं है। अतः १२ + २ = १४। सन्ध्यक्षरों में ए, ऐ, ओ, औ — इनके दीर्घ और प्लुत दो-दो रूप (२×४ = )। कुल १४ + ८ = २२
प्र5.
विविध-मात्राणाम् उच्चारणे कस्य भेदः भवति ?
उत्तर

कालस्य (उच्चारण-कालस्य) भेदः भवति।
[विविध मात्राओं के उच्चारण में समय का अन्तर होता है।]

उदाहरणेन: कुक्कुट-ध्वनि में — ‘उ’ अल्पकालिक (एकमात्र), ‘ऊ’ लम्बकालिक (द्विमात्र), ‘उ३’ अतिविलम्बकालिक (त्रिमात्र)। ध्वनि वही है, केवल उच्चारण में लगने वाला समय बदलता है — यही मात्रा का भेद है।
व्याकरण: प्रश्न में ‘कस्य’ (षष्ठी एकवचन) है, अतः उत्तर भी षष्ठी एकवचन में — कालस्य
प्र6.
नित्यम् अर्धमात्रा केषां भवति ?
उत्तर

व्यञ्जनानाम्।
[सदा आधी मात्रा व्यञ्जनों की होती है।]

पाठ का वाक्य: ‘सर्वेषां व्यञ्जनानां तु नित्यम् अर्ध-मात्रा एव भवति।’ इसीलिए मात्रा-गणना में क्, म्, स्, त् आदि हर हलन्त व्यञ्जन को १/२ गिना जाता है।
ध्यातव्यम्: अनुस्वार (ं) और विसर्ग (ः) भी व्यञ्जनों के ही अन्तर्गत ‘अयोगवाहौ’ हैं, अतः इनकी भी अर्धमात्रा ही होती है।
प्र7.
ध्वनयः कति-प्रकारकाः सन्ति ?
उत्तर

त्रिप्रकारकाः।
[(कुक्कुट-ध्वनि के उदाहरण में) ध्वनियाँ तीन प्रकार की हैं।]

(१) अल्पकालिकः — ‘उ’ — एकमात्रः
(२) लम्बकालिकः — ‘ऊ’ — द्विमात्रः
(३) अतिविलम्बकालिकः — ‘उ३’ — त्रिमात्रः
सन्दर्भ: अध्यापक कहते हैं — ‘अत्र त्रिप्रकारकाः ध्वनयः सन्ति।’ ये तीनों काल स्वरों की तीन मात्राओं का अनुसरण करते हैं — ह्रस्वः, दीर्घः, प्लुतः।
प्र8.
विसर्गस्य कति मात्राः भवन्ति ?
उत्तर

अर्धमात्रा (१/२ मात्रा)।
[विसर्ग की आधी मात्रा होती है।]

क्यों: विसर्ग ‘अयोगवाहौ’ में गिना जाता है और अयोगवाह व्यञ्जनों का ही एक भेद है; सब व्यञ्जनों की नित्य अर्धमात्रा होती है। यही कारण है कि रामः = र्+आ+म्+अ+ः = १/२+२+१/२+१+१/२ = ४ १/२ मात्राः
प्र9.
अनुस्वारस्य कति मात्राः भवन्ति ?
उत्तर

अर्धमात्रा (१/२ मात्रा)।
[अनुस्वार की भी आधी मात्रा होती है।]

क्यों: अनुस्वार भी विसर्ग के साथ ‘अयोगवाहौ’ कहलाता है, अतः वह भी व्यञ्जन-वर्ग का है और उसकी नित्य अर्धमात्रा है। उदाहरण — संशयः = स्+अ++श्+अ+य्+अ+ः = १/२+१+१/२+१/२+१+१/२+१+१/२ = ५ १/२ मात्राः
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