दीपकम् अध्याय 4 वयम् अभ्यासं कुर्मः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
कः वनं गच्छति ?
उत्तर

शृगालः । (पूर्ण रूप में — एकः शृगालः ।)
[सियार / लोमड़ी।]

प्रश्नशब्द से उत्तर की विभक्ति तय होती है: प्रश्न में कः (कौन) है — यह प्रथमा विभक्ति, एकवचन, पुंलिङ्ग है। अतः उत्तर भी प्रथमा एकवचन पुंलिङ्ग में ही आएगा — शृगालः। ‘शृगालम्’ या ‘शृगालेन’ लिखना गलत होगा।
गीत की पंक्ति: ‘एकः शृगालः वनं गच्छति।’ — यहीं से उत्तर लिया गया है।
प्र2.
शृगालः कां पश्यति ?
उत्तर

द्राक्षालताम् ।
[अंगूर की बेल को।]

‘काम्’ का संकेत: प्रश्नपद काम् है — यह ‘किम्’ का स्त्रीलिङ्ग, द्वितीया विभक्ति, एकवचन रूप है। अतः उत्तर भी स्त्रीलिङ्ग द्वितीया एकवचन में — द्राक्षालताम् (मूल शब्द ‘द्राक्षालता’, आकारान्त स्त्रीलिङ्ग)। ‘लता’ स्त्रीलिङ्ग है, इसीलिए ‘कम्’ नहीं, ‘काम्’ पूछा गया।
तुलना कीजिए: पुंलिङ्ग में कं पश्यति ?, नपुंसकलिङ्ग में किं पश्यति ? — तीनों लिङ्गों के प्रश्नपद अलग हैं।
प्र3.
शृगालस्य मुखे किं जायते ?
उत्तर

रसः । (अर्थात् लालारसः ।)
[लार।]

पाठ का आधार: ‘अनुक्षणं तन्मुखे रसः जायते’ — अंगूर देखते ही उसी क्षण उसके मुँह में लार आ जाती है। यहाँ ‘रसः’ का अर्थ स्वाद नहीं, लालारसः / मुखस्रावः (लार) है — पुस्तक ने शब्दार्थ में यही दिया है।
व्याकरण: मुखे — अधिकरण (जगह) के अर्थ में सप्तमी विभक्ति, एकवचनशृगालस्य — सम्बन्ध के अर्थ में षष्ठी एकवचनतन्मुखे = तस्य + मुखे का समस्त रूप।
प्र4.
द्राक्षालतायां शृगालः किं पश्यति ?
उत्तर

द्राक्षाफलम् । (द्राक्षाफलानि इति अपि साधु ।)
[अंगूर।]

विभक्ति देखिए: द्राक्षालतायाम् सप्तमी एकवचन है (बेल पर/बेल में) — आकारान्त स्त्रीलिङ्ग में सप्तमी का रूप –आयाम् होता है, जैसे लता → लतायाम्, कथा → कथायाम्। उत्तर द्राक्षाफलम् कर्म है, अतः द्वितीया एकवचन, नपुंसकलिङ्ग
गीत की पंक्ति: ‘पश्यति द्राक्षालतां, सः पश्यति द्राक्षाफलम्।’
प्र5.
द्राक्षाफलं कुत्र दृश्यते ?
उत्तर

उपरि लतासु । (पाठे — ‘उपरि उपरि लतासु’ ।)
[ऊपर बेलों पर।]

‘कुत्र’ का उत्तर स्थान होता है: प्रश्न ‘कहाँ’ पूछता है, इसलिए उत्तर में स्थानवाचक पद आएगा — लतासु सप्तमी बहुवचन (बेलों पर) और उपरि अव्यय (ऊपर)। गीत में ‘उपरि उपरि’ की द्विरुक्ति ‘बहुत ऊँचाई पर’ का भाव देती है — और यही शृगाल की विफलता का कारण है।
क्रिया पहचानिए: दृश्यते कर्मवाच्य (भाववाच्य) का रूप है — ‘देखा जाता है’। इसका कर्तृवाच्य रूप ‘पश्यति’ है।
प्र6.
किं शृगालः पुनः पुनः उत्पतति ? (आम्/न)
उत्तर

आम् । (आम्, शृगालः पुनः पुनः उत्पतति ।)
[हाँ। हाँ, सियार बार-बार उछलता है।]

पाठ से प्रमाण:एकवारम् उत्पतति, द्विवारम् उत्पतति, त्रिवारम् उत्पतति, पुनः पुनः उत्पतति’ — गीत में गिनती बढ़ती जाती है, इसीलिए उत्तर ‘आम्’ है। ‘किम्’ जब वाक्य के आरम्भ में आता है तो वह प्रश्नपद नहीं, बल्कि ‘क्या?’ बनाने वाला अव्यय होता है — उत्तर आम्/न में देना होता है।
शब्द: आम् = हाँ, = नहीं। ये दोनों अव्यय हैं, इनके रूप नहीं चलते।
प्र7.
किं शृगालः द्राक्षाफलं प्राप्नोति ? (आम्/न)
उत्तर

न । (न, शृगालः द्राक्षाफलं न प्राप्नोति ।)
[नहीं। नहीं, सियार अंगूर नहीं पाता।]

कथा का मर्म यहीं है: बार-बार उछलने पर भी फल नहीं मिलता — ‘तस्य स्वेदः जायते, श्रमः जायते’। अन्त में वह फल को खट्टा कहकर भाग जाता है। पाठ का शीर्षक भी यही कहता है — न लभ्यते चेत् आम्लं द्राक्षाफलम् (यदि न मिले तो अंगूर खट्टे हैं)।
पर्यायवाची: प्राप्नोति = लभते — दोनों का अर्थ ‘पाता है’ है; किन्तु ‘प्राप्नोति’ परस्मैपदी और ‘लभते’ आत्मनेपदी रूप है। यही आत्मनेपद इस पाठ का व्याकरण-विषय है।
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