प्र1.
एकः शृगालः इति गीतस्य साभिनयं कक्षायां गानं कुर्वन्तु।
उत्तर
यह करने का प्रश्न है — कक्षा में मिलकर ‘एकः शृगालः’ गीत गाइए और साथ-साथ अभिनय (मूक-अभिनय) कीजिए। नीचे गीत की पूरी पंक्तियाँ और हर पंक्ति पर करने योग्य अभिनय दिया है।
| गीत-पङ्क्तिः | हिन्दी अर्थ | अभिनयः (क्या करें) |
|---|---|---|
| एकः शृगालः वनं गच्छति । | एक सियार वन जाता है। | एक ओर से धीरे-धीरे चलते हुए मंच पर आइए |
| पिपासया बुभुक्षया वनं गच्छति । | प्यास और भूख से वन जाता है। | पेट पर तथा गले पर हाथ रखकर भूख-प्यास दिखाइए |
| तत्र गच्छति, किमपि न लभते । | वहाँ जाता है, कुछ भी नहीं पाता। | इधर-उधर खोजते हुए दोनों हाथ फैलाइए |
| सः श्रान्तः जायते, खिन्नः जायते । | वह थक जाता है, दुखी हो जाता है। | कंधे ढीले करके थका हुआ मुख बनाइए |
| वामतः पश्यति, दक्षिणतः पश्यति । | बाएँ देखता है, दाएँ देखता है। | बाएँ–दाएँ, फिर आगे–पीछे गरदन घुमाइए |
| तस्य स्वेदः जायते, तृषा जायते । | उसे पसीना आता है, प्यास लगती है। | माथे से पसीना पोंछने का अभिनय कीजिए |
| सः पश्यति द्राक्षाफलम् । | वह अंगूर देखता है। | ऊपर की ओर उँगली उठाकर आँखें बड़ी कीजिए |
| अनुक्षणं तन्मुखे रसः जायते । | उसी क्षण उसके मुँह में लार आ जाती है। | होंठों पर जीभ फेरने का संकेत कीजिए |
| एकवारम् उत्पतति, द्विवारम् उत्पतति । | एक बार उछलता है, दो बार उछलता है। | गिनती के साथ तीन-चार बार उछलिए |
| आम्लं द्राक्षाफलम्, आम्लं द्राक्षाफलम् । | अंगूर खट्टे हैं, अंगूर खट्टे हैं। | मुँह बनाकर नाक-भौं सिकोड़िए |
| इत्येवं कथयति, सः पलायते । | ऐसा कहकर वह भाग जाता है। | मुँह फेरकर तेज़ी से मंच से बाहर जाइए |
गाने का ढंग: गीत की हर पंक्ति में दोहराव है — ‘सः वनं गच्छति, सः वनं गच्छति’। इसीलिए इसे दो दलों में बाँटकर गाइए — पहला दल पहली आधी पंक्ति गाए, दूसरा दल उसे दोहराए। ताल के लिए हाथ से थपकी दीजिए; ‘उत्पतति’ पर सब उछलें — इससे गीत याद भी हो जाएगा और आनन्द भी आएगा।
सुझाव: एक छात्र शृगाल बने, दो-तीन छात्र हाथ ऊपर उठाकर द्राक्षालता बनें और शेष सब कोरस (समवेत गान) गाएँ। कागज़ के अंगूर बनाकर ऊपर लटकाइए — दृश्य और भी सुन्दर लगेगा।