प्र1.
मातृभाषया अर्थं लिखन्तु — शृगालः, वनम्, पिपासा, बुभुक्षा, किमपि, इतोऽपि, लभते, श्रान्तः, खिन्नः, जायते, वामतः, दक्षिणतः, अग्रतः, पृष्ठतः, स्वेदः, तृषा, द्राक्षालताम्, उपरि, दृश्यते, अनुक्षणम्, रसः, एकवारम्, द्विवारम्, उत्पतति, पुनः पुनः, कथयति, आम्लम्, द्राक्षाफलम्, पलायते।
उत्तर
यह अन्तिम स्तम्भ आपकी अपनी मातृभाषा के लिए है — जो भी आपकी भाषा हो (हिन्दी, मराठी, बाङ्ला, तमिऴ्, तेलुगु, गुजराती, ओडिआ, असमिया, पंजाबी …), उसमें अर्थ लिखिए। नीचे पुस्तक की पूरी सूची संस्कृत-पर्याय और हिन्दी अर्थ के साथ दी है; अन्तिम स्तम्भ आप भरिए।
| शब्दः | अर्थः (संस्कृतम्) | हिन्दी | English |
|---|---|---|---|
| शृगालः | लोमशा | लोमड़ी | Fox |
| वनम् | काननम् | अरण्य | Forest |
| पिपासा | पातुम् इच्छा | प्यास | Thirst |
| बुभुक्षा | भोक्तुम् इच्छा | भूख | Hunger |
| किमपि | यत् किञ्चित् | कुछ भी | Anything |
| इतोऽपि | अतः परम् अपि | और भी | More than this |
| लभते | प्राप्नोति | पाता है | Gets |
| श्रान्तः | क्लान्तः | थका हुआ | Tired |
| खिन्नः | दुःखितः | खेद से युक्त | Sad |
| जायते | भवति | होता है | Becomes |
| वामतः | वामभागे | बायीं ओर | Towards left |
| दक्षिणतः | दक्षिणभागे | दाहिनी ओर | Towards right |
| अग्रतः | अग्रभागे | आगे | In front |
| पृष्ठतः | पृष्ठभागे | पीछे | Behind |
| स्वेदः | घर्मः | पसीना | Sweat |
| तृषा | पिपासा | प्यास | Thirst |
| द्राक्षालताम् | द्राक्षाफलस्य वल्लीम् | अंगूर की बेल को | Grape-vine climber |
| उपरि | ऊर्ध्वभागे | ऊपर | Above |
| दृश्यते | अवलोक्यते | देखा जाता है | Seen |
| अनुक्षणम् | क्षणाभ्यन्तरे | उसी क्षण | Immediately |
| रसः | लालारसः / मुखस्रावः | लार | Saliva |
| एकवारम् | सकृत् | एक बार | Once |
| द्विवारम् | वारद्वयम् / द्विः | दो बार | Twice |
| उत्पतति | कूर्दते | कूदता है | Jumps |
| पुनः पुनः | भूयो भूयः | बार-बार | Frequently |
| कथयति | वदति | कहता है | Tells |
| आम्लम् | आम्लरसयुक्तम् | खट्टा | Sour |
| द्राक्षाफलम् | मृद्वीकाफलम् | अंगूर | Grapes |
| पलायते | अन्यत्र धावति | भाग जाता है | Runs away |
शब्द बनाने का ढंग देखिए: वामतः, दक्षिणतः, अग्रतः, पृष्ठतः — इन सबमें तसिल् (–तः) प्रत्यय लगा है, जिसका अर्थ है ‘उस ओर से / उस ओर’। इसी नियम से बनते हैं — मुखतः, सर्वतः, पुरतः। गीत में यही चार शब्द शृगाल का चारों ओर देखना दिखाते हैं।
याद रखने की तरकीब: ‘पिपासा’ और ‘तृषा’ दोनों का अर्थ प्यास है — पाठ में दोनों आए हैं। इसी तरह ‘उत्पतति’ का पर्याय ‘कूर्दते’ है, जो स्वयं एक आत्मनेपदी क्रिया है।