दीपकम् अध्याय 4 न लभ्यते चेत् आम्लं द्राक्षाफलम् के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन 2026-09-05

इस अध्याय के बारे में

पाठ का आरम्भ (पृष्ठ 39) — कक्षा में आचार्य एक चित्र दिखाते हैं। छात्र बताते हैं कि चित्र में वृक्षः, शृगालः, द्राक्षाफलानि हैं और शृगाल अंगूर खाना चाहता है पर खा नहीं पाता। छात्र कहते हैं कि यह कथा वे मातृभाषा में सुन चुके हैं; आचार्य कहते हैं कि अब इसे संस्कृत में गीतरूप में गाएँगे और अभिनय करेंगे । गीत की कथा (पृष्ठ 40–41) — एक शृगाल प्यास और भूख से वन जाता है, वहाँ कुछ नहीं मिलता; वह श्रान्तः (थका) और खिन्नः (दुखी) हो जाता है, पसीना और प्यास बढ़ती है। वह बाएँ-दाएँ, आगे-पीछे देखता है और ऊपर बेल पर द्राक्षाफलम् देख लेता है। कथा का मोड़ — अंगूर देखते ही उसके मुँह में रसः (लार) आ जाता है। वह एक बार, दो बार, तीन बार, बार-बार उत्पतति (उछलता है), पर फल नहीं मिलता — केवल पसीना और श्रम बढ़ता है। अन्त में वह ‘आम्लं द्राक्षाफलम्’ कहकर पलायते (भाग जाता है)। पाठ का व्याकरण — आत्मनेपदी लट्-लकार — ‘अत

  1. पाठारम्भे चित्रसंवादः
  2. वयं शब्दार्थान् जानीमः
  3. वयम् अभ्यासं कुर्मः
  4. वयम् अभ्यासं कुर्मः
  5. वयम् अभ्यासं कुर्मः
  6. वयम् अभ्यासं कुर्मः
  7. वयम् अभ्यासं कुर्मः
  8. वयम् अभ्यासं कुर्मः
  9. वयम् अभ्यासं कुर्मः
  10. योग्यताविस्तरः
  11. परियोजनाकार्यम्
  12. कार्यकलापः
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