दीपकम् अध्याय 4 वयम् अभ्यासं कुर्मः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
वन्दते ....... ....... / ....... वन्देथे ....... / ....... ....... वन्दामहे (वन्द् धातोः लट्-लकारस्य रूपाणि पूरयन्तु)
उत्तर

पुस्तक में तीन कोष्ठक पहले से भरे हैं — वन्दते (प्रथमः पुरुषः, एकवचनम्), वन्देथे (मध्यमः पुरुषः, द्विवचनम्) तथा वन्दामहे (उत्तमः पुरुषः, बहुवचनम्)। शेष छह स्थान इस प्रकार भरे जाएँगे —

वन्द् (आत्मनेपदी)एकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमः पुरुषःवन्दतेवन्देतेवन्दन्ते
मध्यमः पुरुषःवन्दसेवन्देथेवन्दध्वे
उत्तमः पुरुषःवन्देवन्दावहेवन्दामहे
मञ्जूषा (लभ्) से मिलान कीजिए: ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ में दिया गया साँचा है — लभते, लभेते, लभन्ते / लभसे, लभेथे, लभध्वे / लभे, लभावहे, लभामहे। इसमें से ‘लभ्’ हटाकर ‘वन्द्’ रख दीजिए — वन्दते, वन्देते, वन्दन्ते … उत्तर स्वयं बन जाएगा। सभी आत्मनेपदी धातुओं में अन्त्य भाग (–ते, –एते, –अन्ते …) एक ही रहता है।
अर्थ: वन्द् = वन्दना करना, प्रणाम करना। अहं देवं वन्दे = मैं देवता को प्रणाम करता हूँ।
प्र2.
पलायते ....... ....... / ....... ....... ....... / ....... ....... ....... (पलाय् धातोः लट्-लकारस्य रूपाणि पूरयन्तु)
उत्तर

इस भाग में केवल पलायते दिया है; शेष आठ स्थान भरने हैं —

पलाय् (आत्मनेपदी)एकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमः पुरुषःपलायतेपलायेतेपलायन्ते
मध्यमः पुरुषःपलायसेपलायेथेपलायध्वे
उत्तमः पुरुषःपलायेपलायावहेपलायामहे
पहचान: धातु का स्थिर भाग पलाय् है, उसके बाद वही नौ अन्त्य-भाग जुड़ते हैं जो ‘लभ्’ में जुड़े थे। ध्यान दीजिए — द्विवचन में ‘य’ के बाद ‘ए’ आता है (पलाय + एते = पलायेते), इसलिए यहाँ कोई सन्धि-परिवर्तन नहीं दिखता।
पाठ में प्रयोग: ‘इत्येवं कथयति, सः पलायते।’ — अर्थ है ‘भाग जाता है’। बहुवचन में ‘चोराः पलायन्ते’।
प्र3.
जायते ....... ....... / ....... ....... ....... / ....... ....... ....... (जन् धातोः लट्-लकारस्य रूपाणि पूरयन्तु)
उत्तर

यहाँ केवल जायते दिया है; शेष आठ स्थान इस प्रकार भरिए —

जन् / जाय् (आत्मनेपदी)एकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमः पुरुषःजायतेजायेतेजायन्ते
मध्यमः पुरुषःजायसेजायेथेजायध्वे
उत्तमः पुरुषःजायेजायावहेजायामहे
क्यों ‘जन्’ से ‘जाय’ बनता है: ‘जन्’ दिवादिगण की आत्मनेपदी धातु है; लट्-लकार में इसका अङ्ग जाय बन जाता है — जन् + य = जाय। इसके बाद वही परिचित अन्त्य-भाग जुड़ते हैं। अर्थ है ‘होना, उत्पन्न होना’ (= भवति)।
पाठ में प्रयोग: ‘श्रान्तः जायते, खिन्नः जायते’, ‘तस्य स्वेदः जायते, तृषा जायते’ — पूरे गीत में यही क्रिया बार-बार आती है।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ