प्र1.
वन्दते ....... ....... / ....... वन्देथे ....... / ....... ....... वन्दामहे (वन्द् धातोः लट्-लकारस्य रूपाणि पूरयन्तु)
उत्तर
पुस्तक में तीन कोष्ठक पहले से भरे हैं — वन्दते (प्रथमः पुरुषः, एकवचनम्), वन्देथे (मध्यमः पुरुषः, द्विवचनम्) तथा वन्दामहे (उत्तमः पुरुषः, बहुवचनम्)। शेष छह स्थान इस प्रकार भरे जाएँगे —
| वन्द् (आत्मनेपदी) | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमः पुरुषः | वन्दते | वन्देते | वन्दन्ते |
| मध्यमः पुरुषः | वन्दसे | वन्देथे | वन्दध्वे |
| उत्तमः पुरुषः | वन्दे | वन्दावहे | वन्दामहे |
मञ्जूषा (लभ्) से मिलान कीजिए: ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ में दिया गया साँचा है — लभते, लभेते, लभन्ते / लभसे, लभेथे, लभध्वे / लभे, लभावहे, लभामहे। इसमें से ‘लभ्’ हटाकर ‘वन्द्’ रख दीजिए — वन्दते, वन्देते, वन्दन्ते … उत्तर स्वयं बन जाएगा। सभी आत्मनेपदी धातुओं में अन्त्य भाग (–ते, –एते, –अन्ते …) एक ही रहता है।
अर्थ: वन्द् = वन्दना करना, प्रणाम करना। अहं देवं वन्दे = मैं देवता को प्रणाम करता हूँ।