दीपकम् अध्याय 4 कार्यकलापः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
मुखेन द्राक्षाफलस्य ग्रहणम् – इति क्रीडां कारयामः। उपरि रज्ज्वा फलस्य मधुरस्य वा बन्धनं कृत्वा तस्याः आकर्षण-शिथिलीकरणैः अध्यापकः क्रीडाङ्गणे क्रीडां कारयति। छात्राः मुखस्य साहाय्येन ग्रहीतुं प्रयत्नं कुर्वन्ति।
उत्तर

यह कक्षा में खेलकर सीखने वाला कार्य है — गीत के शृगाल की तरह छात्र भी ऊपर लटके फल या मिठाई को केवल मुँह से पकड़ने का प्रयत्न करते हैं। हाथ का प्रयोग वर्जित है।

क्रीडायाः विधिः (खेल की विधि) —

  1. क्रीडाङ्गणे द्वयोः स्तम्भयोः मध्ये एका रज्जुः बध्यते । [मैदान में दो खम्भों के बीच एक रस्सी बाँधी जाती है।]
  2. रज्ज्वाम् फलानि मधुरद्रव्याणि वा सूत्रैः लम्बन्ते । [रस्सी पर फल या मिठाइयाँ धागों से लटकाई जाती हैं।]
  3. अध्यापकः रज्जुम् आकर्षति शिथिलीकरोति च — तेन फलानि उपरि अधः च चलन्ति । [अध्यापक रस्सी को खींचते और ढीला करते हैं, जिससे फल ऊपर-नीचे होते रहते हैं।]
  4. छात्राः हस्तयोः प्रयोगं विना केवलं मुखेन फलं गृह्णन्ति । [छात्र हाथ लगाए बिना केवल मुँह से फल पकड़ते हैं।]
  5. यः प्रथमं फलं गृह्णाति सः विजयी भवति । [जो पहले फल पकड़ ले वही विजेता।]

क्रीडासमये उपयोगि-वाक्यानि (खेलते समय बोलिए) —

संस्कृतवाक्यम्हिन्दी अर्थ
फलम् उपरि अस्ति ।फल ऊपर है।
उत्पत, उत्पत !उछलो, उछलो!
सः फलं न प्राप्नोति ।वह फल नहीं पा रहा।
पुनः पुनः प्रयत्नं कुरु ।बार-बार प्रयत्न करो।
अहो ! सा फलं प्राप्नोति ।अरे! वह (लड़की) फल पा गई।
सर्वे आनन्देन हसन्ति ।सब आनन्द से हँसते हैं।
यह खेल क्या सिखाता है: खेलते ही समझ आ जाता है कि शृगाल को कैसा लगा होगा — फल दिखता है, पर पहुँच से बाहर है। जो धैर्य रखकर सही क्षण की प्रतीक्षा करता है, वही फल पा लेता है; जो एक-दो बार में हार मानकर हट जाता है, वह खाली रह जाता है। यही श्लोक का ‘उत्तमजनाः न परित्यजन्ति’ है।
सावधानी: रस्सी को छात्रों की ऊँचाई से थोड़ा ही ऊपर बाँधिए; धक्का-मुक्की न होने दीजिए और एक बार में एक ही छात्र को अवसर दीजिए। खाद्य पदार्थ स्वच्छ हों तथा खेल के बाद हाथ-मुँह धोना न भूलिए।
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