कक्षा ७ संस्कृत अध्याय 5 सेवा हि परमो धर्मः के लिए एनसीईआरटी समाधान
अद्यतन 2026-09-19
इस अध्याय के बारे में
पाठ का सन्देश — ‘सेवा हि परमो धर्मः’ अर्थात् सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है। विद्या, धन, उपाधि और पदवी अपनी जगह आवश्यक हैं, पर उनके साथ मानवीय गुण न हों तो मनुष्य ‘यन्त्रवत्’ रह जाता है। प्रारम्भिक संवाद — आचार्या पूछती हैं ‘जीवने सफलतायै मानवः किं किम् अर्जयेत् ?’ छात्र उत्तर देते हैं — विद्याम्, उपाधिम्, पदवीम्, धनम्। आचार्या कहती हैं कि यह पर्याप्त नहीं; सत्यं, करुणा, उदारता, सेवा, परोपकारः, अक्रोधः — ये मानवीय गुण भी आवश्यक हैं। उदाहरण — सिद्धार्थ के जीवन में विद्या, धन और पद सब कुछ था, किन्तु मानवीय गुणों से ही वे महात्मा बुद्ध बने। कथा — प्रसिद्ध रसायनशास्त्रज्ञ एवं चिकित्सक नागार्जुन को एक सहायक चाहिए था। राजा ने दो योग्य युवक भेजे। नागार्जुन ने दोनों को दो दिन में एक विशिष्ट रसायन बनाकर लाने को कहा और यह भी कहा कि ‘राजमार्गेण गच्छताम्’ । कथा का मोड़ — प्रथम युवक औषध बनाकर ले आया और अपनी
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| शब्दः (पाठे प्रयुक्तः) | संस्कृत-अर्थः | हिन्दी अर्थ | English |
|---|---|---|---|
| उपाधिम् | नामचिह्नम् | उपाधि को | Degree |
| पदवीम् | पदनाम | पदवी | Designation / Position |
| मानवीयाः | मानवे भवितव्याः | मानवों में होने वाले | Humane |
| रसायनशास्त्रज्ञः | यः औषधशास्त्रं जानाति | रसायनशास्त्र का विशेषज्ञ | Chemist & Druggist |
| चिकित्सकः | भिषक् | वैद्य | Physician |
| प्रयोगशालायाम् | अनुसन्धान-परीक्षण-कक्षे | प्रयोगशाला में | In the laboratory |
| अङ्गीकृतवान् | स्वीकृतवान् | स्वीकार किया | Accepted |
| अन्यस्मिन् दिने | अपरस्मिन् दिवसे | अगले दिन | On another day |
| खिन्नः | दुःखितः | दुःखी | Sad |
| शोचनीया | दयनीया | दुःखदायी | Miserable |
| निरतः | लीनः | मग्न | Engrossed |
| वृत्तान्तम् | घटनाम् | प्रसङ्ग को | Anecdote |
| चितवान् | चयनं कृतवान् | चुना | Selected |
| यन्त्रवत् | यन्त्रम् इव | यन्त्र की भाँति | Like a machine |
| कषायम् | क्वाथम् | काढ़ा को | Herbal decoction |
अभ्यास
- पाठे विद्यमानाः प्रश्नाः
- वयम् अभ्यासं कुर्मः
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- वयम् अभ्यासं कुर्मः
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- परियोजनाकार्यम्