दीपकम् अध्याय 5 सेवा हि परमो धर्मः के लिए एनसीईआरटी समाधान
अद्यतन 2026-09-05
इस अध्याय के बारे में
पाठ का सन्देश — ‘सेवा हि परमो धर्मः’ अर्थात् सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है। विद्या, धन, उपाधि और पदवी अपनी जगह आवश्यक हैं, पर उनके साथ मानवीय गुण न हों तो मनुष्य ‘यन्त्रवत्’ रह जाता है। प्रारम्भिक संवाद — आचार्या पूछती हैं ‘जीवने सफलतायै मानवः किं किम् अर्जयेत् ?’ छात्र उत्तर देते हैं — विद्याम्, उपाधिम्, पदवीम्, धनम्। आचार्या कहती हैं कि यह पर्याप्त नहीं; सत्यं, करुणा, उदारता, सेवा, परोपकारः, अक्रोधः — ये मानवीय गुण भी आवश्यक हैं। उदाहरण — सिद्धार्थ के जीवन में विद्या, धन और पद सब कुछ था, किन्तु मानवीय गुणों से ही वे महात्मा बुद्ध बने। कथा — प्रसिद्ध रसायनशास्त्रज्ञ एवं चिकित्सक नागार्जुन को एक सहायक चाहिए था। राजा ने दो योग्य युवक भेजे। नागार्जुन ने दोनों को दो दिन में एक विशिष्ट रसायन बनाकर लाने को कहा और यह भी कहा कि ‘राजमार्गेण गच्छताम्’ । कथा का मोड़ — प्रथम युवक औषध बनाकर ले आया और अपनी
अभ्यास
- पाठे विद्यमानाः प्रश्नाः
- वयम् अभ्यासं कुर्मः
- वयम् अभ्यासं कुर्मः
- वयम् अभ्यासं कुर्मः
- वयम् अभ्यासं कुर्मः
- वयम् अभ्यासं कुर्मः
- वयम् अभ्यासं कुर्मः
- योग्यताविस्तरः
- परियोजनाकार्यम्