दीपकम् अध्याय 5 योग्यताविस्तरः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
स्वास्थ्यरक्षणाय नियमाः — ब्राह्मे मुहूर्ते उत्तिष्ठेत् स्वस्थो रक्षार्थमायुषः । सर्वमेव परित्यज्य शरीरमनुपालयेत् ॥
उत्तर

अन्वयः — स्वस्थः (जनः) आयुषः रक्षार्थम् ब्राह्मे मुहूर्ते उत्तिष्ठेत् । सर्वम् एव परित्यज्य शरीरम् अनुपालयेत् ।

अर्थः (हिन्दी) — स्वस्थ मनुष्य को अपनी आयु की रक्षा के लिए ब्राह्म मुहूर्त में (सूर्योदय से लगभग डेढ़ घण्टे पूर्व) उठ जाना चाहिए। आवश्यकता पड़े तो सब कुछ छोड़कर भी शरीर की रक्षा करनी चाहिए।

भावः — शरीर ही सब कर्मों का आधार है — ‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्’। धन, पद और कार्य सब बाद में; पहले स्वास्थ्य। जो प्रातःकाल जल्दी उठता है, उसे शुद्ध वायु, शान्त मन और पूरा दिन मिलता है। पाठ की कथा से इसका सीधा सम्बन्ध है — नागार्जुन स्वयं चिकित्सक थे, और यह श्लोक बताता है कि चिकित्सा से पहले रोग न होने देना ही श्रेष्ठ है।

पदम्सन्धि-विच्छेदः / व्याकरणम्अर्थः
ब्राह्मे मुहूर्तेसप्तमी एकवचनम् (अधिकरणम्)ब्राह्म मुहूर्त में (प्रातः ४–६ बजे के बीच)
उत्तिष्ठेत्उद् + स्था; विधिलिङ्-लकारः, प्रथमपुरुषः एकवचनम्उठना चाहिए
रक्षार्थमायुषःरक्षार्थम् + आयुषः (स्वर-सन्धि); ‘आयुषः’ षष्ठी एकवचनआयु की रक्षा के लिए
परित्यज्यपरि + त्यज् + ल्यप्-प्रत्ययःछोड़कर
शरीरमनुपालयेत्शरीरम् + अनुपालयेत् (विधिलिङ्)शरीर का पालन करना चाहिए
ध्यान दें: ‘उत्तिष्ठेत्’ तथा ‘अनुपालयेत्’ दोनों विधिलिङ्-लकार में हैं — यह लकार विधि, उपदेश तथा ‘चाहिए’ का अर्थ देता है। इसी कारण पूरा श्लोक एक नियम के रूप में पढ़ा जाता है।
प्र2.
भोजनान्ते पिबेत् तक्रं वासरान्ते पिबेत्पयः । निशान्ते च पिबेत् वारि त्रिभी रोगो न जायते ॥
उत्तर

अन्वयः — भोजनान्ते तक्रं पिबेत् । वासरान्ते पयः पिबेत् । निशान्ते च वारि पिबेत् । त्रिभिः (एतैः) रोगः न जायते ।

अर्थः (हिन्दी) — भोजन के अन्त में छाछ पीनी चाहिए, दिन के अन्त में (सन्ध्या-समय) दूध पीना चाहिए और रात्रि के अन्त में (प्रातःकाल) जल पीना चाहिए। इन तीनों (नियमों) से रोग नहीं होता।

भावः — आयुर्वेद का सार यही है कि औषधि से पहले दिनचर्या। भोजन के बाद तक्र पाचन ठीक रखता है, सन्ध्या को दूध बल और नींद देता है, प्रातः खाली पेट जल शरीर को शुद्ध करता है। तीनों साधारण, सुलभ और बिना खर्च के — फिर भी रोग से बचाने में समर्थ।

समयःपेयम् (संस्कृतम्)हिन्दीलाभः
भोजनान्ते (भोजन के बाद)तक्रम्छाछ / मट्ठापाचनशक्ति बढ़ती है
वासरान्ते (दिन के अन्त में)पयःदूधबल तथा सुनिद्रा
निशान्ते (रात के अन्त में)वारिजलशरीर की शुद्धि, कोष्ठशुद्धि
सन्धि तथा पद-परिचय: भोजनान्ते = भोजन + अन्ते (दीर्घ-सन्धि, सप्तमी एकवचन)। पिबेत्पयः = पिबेत् + पयः। निशान्ते = निशा + अन्ते। पिबेत् — ‘पा’ धातु, विधिलिङ्-लकार (‘पीना चाहिए’)। त्रिभी छन्द की सुविधा के लिए ‘त्रिभिः’ (तृतीया बहुवचन) का ही रूप है।
Tip: दोनों श्लोक ‘अनुष्टुप्’ छन्द में हैं — प्रत्येक चरण में आठ अक्षर, कुल बत्तीस अक्षर। इसी छन्द में गीता तथा रामायण के अधिकांश श्लोक हैं, इसलिए ये सरलता से कण्ठस्थ हो जाते हैं।
प्र3.
भूतकालः गतकालं ज्ञापयति । धातुना सह क्तवतु इति प्रत्ययस्य योजनेन अपि भूतकालार्थकानि पदानि भवन्ति । यथा — पठ् + क्तवतु = पठितवान् (पुंलिङ्गम्) पठितवती (स्त्रीलिङ्गम्) । वर्तमानकालक्रियापदेन सह स्म इति अव्ययपदस्य योजनेन अपि भूतकालार्थः भवति । यथा — गच्छति स्म – गतवान् / गतवती, लिखति स्म – लिखितवान् / लिखितवती । (धातु-सारणी : धातुः, लट्-लकारः, लङ्-लकारः, क्तवतुप्रत्ययः पुंलिङ्गे, क्तवतुप्रत्ययः स्त्रीलिङ्गे, स्म-प्रयोगः)
उत्तर

पृष्ठ 55 की सारणी पूरी इस प्रकार है — इसे कण्ठस्थ कर लेने पर अभ्यास ३, ४, ५ तथा ६ अपने आप हल हो जाते हैं।

धातुःलट्-लकारः (वर्तमानकाले)लङ्-लकारः (भूतकाले)क्तवतुप्रत्ययः — पुंलिङ्गेक्तवतुप्रत्ययः — स्त्रीलिङ्गेस्म-प्रयोगः (भूतकाले)
गम्गच्छतिअगच्छत्गतवान्गतवतीगच्छति स्म
लिख्लिखतिअलिखत्लिखितवान्लिखितवतीलिखति स्म
गागायतिअगायत्गीतवान्गीतवतीगायति स्म
पापिबतिअपिबत्पीतवान्पीतवतीपिबति स्म
श्रुशृणोतिअशृणोत्श्रुतवान्श्रुतवतीशृणोति स्म
दाददातिअददात्दत्तवान्दत्तवतीददाति स्म
ज्ञाजानातिअजानात्ज्ञातवान्ज्ञातवतीजानाति स्म
कृकरोतिअकरोत्कृतवान्कृतवतीकरोति स्म
दृश्पश्यतिअपश्यत्दृष्टवान्दृष्टवतीपश्यति स्म
स्थातिष्ठतिअतिष्ठत्स्थितवान्स्थितवतीतिष्ठति स्म
तीनों रूप एक ही अर्थ देते हैं: ‘सः अगच्छत्’ = ‘सः गतवान्’ = ‘सः गच्छति स्म’ — तीनों का अर्थ है ‘वह गया / जाता था’। अन्तर केवल इतना है कि लङ्-लकार में क्रिया का रूप बदलता है, क्तवतु में कर्ता का लिङ्ग-वचन देखना पड़ता है, और ‘स्म’ में क्रिया वर्तमानकाल की ही रहती है।
ध्यान रखने योग्य अनियमित रूप: पश्यति → दृष्टवान् (न कि ‘पश्यितवान्’), गायति → गीतवान्, पिबति → पीतवान्, ददाति → दत्तवान्, तिष्ठति → स्थितवान्, शृणोति → श्रुतवान्। इनमें क्तवतु मूल धातु (दृश्, गा, पा, दा, स्था, श्रु) से बनता है, लट्-लकार के अङ्ग से नहीं।
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