अन्वयः — स्वस्थः (जनः) आयुषः रक्षार्थम् ब्राह्मे मुहूर्ते उत्तिष्ठेत् । सर्वम् एव परित्यज्य शरीरम् अनुपालयेत् ।
अर्थः (हिन्दी) — स्वस्थ मनुष्य को अपनी आयु की रक्षा के लिए ब्राह्म मुहूर्त में (सूर्योदय से लगभग डेढ़ घण्टे पूर्व) उठ जाना चाहिए। आवश्यकता पड़े तो सब कुछ छोड़कर भी शरीर की रक्षा करनी चाहिए।
भावः — शरीर ही सब कर्मों का आधार है — ‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्’। धन, पद और कार्य सब बाद में; पहले स्वास्थ्य। जो प्रातःकाल जल्दी उठता है, उसे शुद्ध वायु, शान्त मन और पूरा दिन मिलता है। पाठ की कथा से इसका सीधा सम्बन्ध है — नागार्जुन स्वयं चिकित्सक थे, और यह श्लोक बताता है कि चिकित्सा से पहले रोग न होने देना ही श्रेष्ठ है।
| पदम् | सन्धि-विच्छेदः / व्याकरणम् | अर्थः |
|---|---|---|
| ब्राह्मे मुहूर्ते | सप्तमी एकवचनम् (अधिकरणम्) | ब्राह्म मुहूर्त में (प्रातः ४–६ बजे के बीच) |
| उत्तिष्ठेत् | उद् + स्था; विधिलिङ्-लकारः, प्रथमपुरुषः एकवचनम् | उठना चाहिए |
| रक्षार्थमायुषः | रक्षार्थम् + आयुषः (स्वर-सन्धि); ‘आयुषः’ षष्ठी एकवचन | आयु की रक्षा के लिए |
| परित्यज्य | परि + त्यज् + ल्यप्-प्रत्ययः | छोड़कर |
| शरीरमनुपालयेत् | शरीरम् + अनुपालयेत् (विधिलिङ्) | शरीर का पालन करना चाहिए |