दीपकम् अध्याय 5 परियोजनाकार्यम्

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
परहितार्थं सेवारतानां प्रेरकाणां महात्मनां जीवनसम्बद्धां कथां सङ्गृह्णन्तु ।
उत्तर

कार्य-विधि: दूसरों की भलाई में लगे रहने वाले किसी एक प्रेरक महापुरुष को चुनिए, उनके जीवन की एक ऐसी घटना खोजिए जिसमें सेवा दिखती हो, और उसे 6–8 सरल संस्कृत वाक्यों में लिखकर नीचे हिन्दी अर्थ जोड़ दीजिए। कथा के साथ चित्र चिपकाइए और अन्त में एक वाक्य में सन्देश लिखिए।

एक अच्छे उत्तर में ये चार बातें होनी चाहिए —

  • महापुरुष का नाम, काल तथा स्थान (कः ? कदा ? कुत्र ?)
  • सेवा की एक ठोस घटना — केवल प्रशंसा नहीं, घटना
  • उस सेवा का परिणाम (किसे लाभ हुआ ?)
  • अन्त में एक सूक्ति — जैसे ‘सेवा हि परमो धर्मः’ / ‘परोपकाराय सतां विभूतयः’

नमूना उत्तर (संस्कृतम्) —

महात्मा गान्धी
महात्मा गान्धी दक्षिण-आफ्रिकादेशे अधिवक्ता आसीत् । एकदा तत्र प्लेगरोगः प्रसृतः । बहवः श्रमिकाः पीडिताः अभवन् । कोऽपि तेषां समीपं गन्तुं न इच्छति स्म । गान्धी स्वयं तेषां सेवां कृतवान् । सः औषधं दत्तवान्, अन्नं च योजितवान् । अनेके रोगिणः स्वस्थाः अभवन् । सः अवदत् — “सेवैव सत्यस्य साधनम्” इति ।

[हिन्दी — महात्मा गान्धी दक्षिण अफ्रीका में वकील थे। एक बार वहाँ प्लेग फैला। बहुत-से मजदूर पीड़ित हो गए। कोई उनके पास जाना नहीं चाहता था। गान्धी जी ने स्वयं उनकी सेवा की। उन्होंने औषध दी और भोजन की व्यवस्था की। बहुत-से रोगी स्वस्थ हो गए। उन्होंने कहा — “सेवा ही सत्य का साधन है।”]

अन्य विकल्प: मदर टेरेसा (कोलकाता — निराश्रितानां सेवा), बाबा आम्टे (कुष्ठरोगिणां सेवा — ‘आनन्दवनम्’), ईश्वरचन्द्रः विद्यासागरः (विधवा-शिक्षा), स्वामी विवेकानन्दः (‘दरिद्रनारायणसेवा’), भगिनी निवेदिता, तथा पाठ के अपने नायक नागार्जुनः
प्र2.
अस्माकं समाजे कुटुम्बे वा सेवाकार्यं कुर्वतः जनद्वयस्य विवरणं लिखन्तु ।
उत्तर

कार्य-विधि: अपने ही आस-पास से दो ऐसे व्यक्ति चुनिए जो बिना प्रसिद्धि के सेवा करते हैं — परिवार से एक और मुहल्ले/विद्यालय से एक। प्रत्येक के लिए लिखिए — नाम, सम्बन्ध/व्यवसाय, कौन-सी सेवा, किसके लिए, और आपने उससे क्या सीखा। यदि सम्भव हो तो उनसे दो-तीन प्रश्न पूछकर उनकी अपनी बात भी जोड़िए।

नमूना उत्तर (संस्कृतम्) —

विवरणम्प्रथमः जनःद्वितीयः जनः
नाममम पितामही श्रीमती सरोजाअस्माकं ग्रामस्य वैद्यः श्रीरामप्रसादः
सेवाकार्यम्सा प्रतिदिनं वृद्धेभ्यः जनेभ्यः अन्नं ददाति ।सः निर्धनेभ्यः रोगिभ्यः निःशुल्कम् औषधं ददाति ।
कस्मै ?ग्रामस्य असहायेभ्यः वृद्धेभ्यःदरिद्रेभ्यः कृषकेभ्यः श्रमिकेभ्यः च
फलम्कोऽपि वृद्धः क्षुधितः न तिष्ठति ।ग्रामे रोगिणः शीघ्रं स्वस्थाः भवन्ति ।
अहं किं शिक्षितवान् ?सेवा धनेन न, हृदयेन भवति ।वृत्तिः अपि सेवा भवितुम् अर्हति ।

अनुच्छेदरूपेण — मम पितामही प्रतिदिनं ग्रामस्य वृद्धेभ्यः अन्नं ददाति । सा वदति — ‘अन्नदानं महादानम्’ इति । अस्माकं ग्रामस्य वैद्यः निर्धनेभ्यः रोगिभ्यः निःशुल्कम् औषधं ददाति । सः रात्रौ अपि रोगिणः समीपं गच्छति । एतौ द्वौ जनौ मम प्रेरकौ स्तः ।
[मेरी दादी प्रतिदिन गाँव के वृद्धों को भोजन देती हैं। वे कहती हैं — ‘अन्नदान महादान है।’ हमारे गाँव के वैद्य निर्धन रोगियों को निःशुल्क औषध देते हैं। वे रात में भी रोगी के पास जाते हैं। ये दोनों मेरे प्रेरक हैं।]

ध्यान दें: यह उत्तर आपका अपना होना चाहिए — ऊपर दिए नाम केवल ढाँचा दिखाने के लिए हैं। ‘…भ्यः’ (चतुर्थी बहुवचन) का प्रयोग ‘देना’ अर्थ में होता है — वृद्धेभ्यः, रोगिभ्यः, निर्धनेभ्यः।
प्र3.
भवतां परिवेशे विद्यमानानाम् आयुर्वेदीयसस्यानां पदार्थानां च नामानि लिखन्तु । तेषां स्वास्थ्यरक्षणलाभान् लिखन्तु । यथा – बिल्वं पाचनक्रियां वर्धते । लवङ्गं दन्तसमस्याः कासं च नाशयति ।
उत्तर

कार्य-विधि: अपने घर, आँगन, विद्यालय अथवा रसोई में मिलने वाले आयुर्वेदीय पौधे और पदार्थ ढूँढ़िए। प्रत्येक के लिए पुस्तक के उदाहरण जैसा एक संस्कृत वाक्य बनाइए — ‘(पदार्थः) + (रोगम्/लाभम्) + (क्रियापदम्)’। यदि हो सके तो पत्ती चिपकाकर चित्र-सूची (herbarium) बनाइए।

संस्कृत-नामहिन्दी नामवाक्यम् (संस्कृतम्)स्वास्थ्यलाभः
बिल्वम्बेलबिल्वं पाचनक्रियां वर्धते ।पाचन ठीक करता है
लवङ्गम्लौंगलवङ्गं दन्तसमस्याः कासं च नाशयति ।दाँत-दर्द तथा खाँसी दूर करता है
तुलसीतुलसीतुलसी कासं ज्वरं च नाशयति ।खाँसी-जुकाम-ज्वर में लाभ
आर्द्रकम्अदरकआर्द्रकं जठराग्निं वर्धयति ।भूख तथा पाचन बढ़ाता है
हरिद्राहल्दीहरिद्रा व्रणं शोधयति ।घाव भरती है, रोगप्रतिरोध बढ़ाती है
आमलकम्आँवलाआमलकं केशान् दृष्टिं च पोषयति ।बाल तथा नेत्र के लिए हितकर
निम्बःनीमनिम्बः त्वग्रोगान् नाशयति ।चर्मरोग तथा रक्तशुद्धि
पुदीना (पूतिहा)पुदीनापुदीना उदरशूलं शमयति ।पेट-दर्द में लाभ
यष्टिमधुमुलेठीयष्टिमधु कण्ठशुद्धिं करोति ।गला साफ़ करती है
अश्वगन्धाअसगन्धअश्वगन्धा बलं वर्धयति ।बल तथा स्फूर्ति बढ़ाती है
एलाइलायचीएला मुखदुर्गन्धं दूरीकरोति ।मुख की दुर्गन्ध हटाती है
मरिचम्काली मिर्चमरिचं श्लेष्माणं नाशयति ।कफ दूर करती है
भाषा-सङ्केत: पुस्तक के उदाहरण ‘बिल्वं पाचनक्रियां वर्धते’ में क्रिया आत्मनेपदी है; कर्मयुक्त वाक्य में ‘वर्धयति’ (बढ़ाता है) अधिक शुद्ध बैठता है — दोनों में से जो आपके शिक्षक बताएँ, वही प्रयोग करें। चेतावनी: कोई भी औषधि बिना वैद्य/चिकित्सक की सलाह के स्वयं न लें।
प्र4.
अधः कानिचन चित्राणि वाक्यानि च सन्ति । चित्राणि पश्यन्तु , वाक्यानि पठन्तु । इदानीम् उचितं वाक्यं चित्रेण सह योजयन्तु । (वाक्यानि — धेनुर्माता परमशिवा / नित्यं मातापित्रोः सेवा / रोगातुराणाम् उपचारः / गृहकार्येषु भगिन्याः साहाय्यम् / परस्परं कार्यकरणे साहाय्यम्)
उत्तर

पुस्तक के पृष्ठ 56 पर ऊपर से नीचे पाँच चित्र हैं। उनका सही मेल इस प्रकार है —

क्रमःचित्रम् (किं दृश्यते ?)उचितं वाक्यम्हिन्दी अर्थ
भगिनी प्रक्षालनपात्रे पात्राणि प्रक्षालयति, भ्राता तस्याः साहाय्यं करोति ।
(बहन बर्तन धो रही है, भाई साथ में हाथ बँटा रहा है)
गृहकार्येषु भगिन्याः साहाय्यम्घर के कामों में बहन की सहायता
त्रयः बालकाः मिलित्वा चित्रफलकं रचयन्ति ।
(तीन बच्चे मिलकर एक चित्र/प्रतिकृति बना रहे हैं)
परस्परं कार्यकरणे साहाय्यम्काम करने में एक-दूसरे की सहायता
बालकः स्थालिकायां जलपात्रे मातापित्रोः समीपम् आनयति ।
(बालक माता-पिता को तश्तरी में पानी के गिलास दे रहा है)
नित्यं मातापित्रोः सेवाप्रतिदिन माता-पिता की सेवा
बालिका धेनुं भोजयति, धेनुं च स्पृशति ।
(बच्ची गाय को चारा खिला रही है)
धेनुर्माता परमशिवागौ माता परम कल्याणकारिणी है
शय्यायां रुग्णः शेते, बालकौ जलम् औषधं च ददतः ।
(बिस्तर पर लेटे रोगी को बच्चे पानी और दवा दे रहे हैं)
रोगातुराणाम् उपचारःरोग से पीड़ितों का उपचार
मेल करने की कुञ्जी: हर वाक्य में एक शब्द ‘पात्र’ बता देता है — भगिन्याः (बहन) → रसोई/घर का चित्र, परस्परम् (आपस में) → समूह में मिलकर काम, मातापित्रोः (माता-पिता का, षष्ठी द्विवचन) → माता-पिता वाला चित्र, धेनुः (गाय) → गाय वाला चित्र, रोगातुराणाम् (रोगियों का, षष्ठी बहुवचन) → रोगी वाला चित्र।
सन्धि-विच्छेद: धेनुर्माता = धेनुः + माता (विसर्ग-सन्धि — विसर्ग का ‘र्’)। रोगातुराणाम् = रोग + आतुराणाम् (दीर्घ-सन्धि); ‘आतुरः’ = पीड़ित। मातापित्रोः — द्वन्द्व समास, षष्ठी द्विवचन। पाँचों वाक्य मिलकर पाठ का सन्देश दोहराते हैं — सेवा घर से आरम्भ होती है और समाज तक फैलती है।
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