दीपकम् अध्याय 4 परियोजनाकार्यम्

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
त्वं जीवने कदाचित् अभीष्टं वस्तु न लभसे। कदाचित् तव लक्ष्यपूर्तिः न भवति। तदा त्वं किं करोषि, किं च चिन्तयसि इति संस्कृतभाषया / स्वभाषया प्रसङ्गसहितं लिख।
उत्तर

प्रश्न का आशय — जब तुम्हें मनचाही वस्तु न मिले या तुम्हारा लक्ष्य पूरा न हो, तब तुम क्या करते हो और क्या सोचते हो — यह अपने जीवन का कोई सच्चा प्रसंग देकर संस्कृत में या अपनी भाषा में लिखना है। यह व्यक्तिगत उत्तर है, इसलिए इसे अपने ही अनुभव से लिखिए।

अच्छे उत्तर में ये चार बातें होनी चाहिए —

  1. प्रसंग — कब, कहाँ, क्या चाहिए था (प्रतियोगिता, परीक्षा, कोई वस्तु, किसी खेल में स्थान)।
  2. अनुभूति — उस समय क्या लगा (खेद, निराशा) — पर उसे शृगाल की तरह ‘अंगूर खट्टे हैं’ कहकर मत टालिए।
  3. प्रतिक्रिया — फिर आपने क्या किया — कारण खोजा, अभ्यास बढ़ाया, किसी बड़े से पूछा।
  4. सीख — पाठ या श्लोक से जोड़िए — ‘उत्तमजनाः न परित्यजन्ति’ अथवा ‘गच्छन् पिपीलकः योजनानां शतान्यपि याति’।

नमूना उत्तर (संस्कृतभाषया):

गतवर्षे मम विद्यालये चित्रकलास्पर्धा आसीत् । अहं बहु परिश्रमम् अकरवम्, किन्तु प्रथमं स्थानं न अलभे । तदा अहं खिन्नः अभवम् । अहं चिन्तितवान् — ‘किम् अहं चित्रकलां त्यजामि ?’ अनन्तरम् अहं गुरुं पृष्टवान् । गुरुः अवदत् — ‘तव रेखाः शोभन्ते, किन्तु वर्णसंयोजनम् अभ्यासम् अपेक्षते ।’ अतः अहं प्रतिदिनं त्रिंशत्-निमेषपर्यन्तम् अभ्यासम् आरब्धवान् । अस्मिन् वर्षे अहं द्वितीयं स्थानम् अलभे । अधुना अहं जानामि — यत् न लभ्यते तत् आम्लम् इति न वक्तव्यम् । ‘गच्छन् पिपीलकः योजनानां शतान्यपि याति’ इति श्लोकः मम प्रेरणा अस्ति ।

नमूना उत्तर (हिन्दी में वही बात): पिछले वर्ष मेरे विद्यालय में चित्रकला प्रतियोगिता थी। मैंने बहुत परिश्रम किया, पर प्रथम स्थान नहीं मिला। उस समय मैं दुखी हुआ और सोचा — क्या चित्रकला छोड़ दूँ? फिर मैंने गुरुजी से पूछा। उन्होंने कहा — ‘तुम्हारी रेखाएँ अच्छी हैं, पर रंग-संयोजन में अभ्यास चाहिए।’ इसलिए मैंने प्रतिदिन तीस मिनट अभ्यास आरम्भ किया। इस वर्ष मुझे दूसरा स्थान मिला। अब मैं जानता हूँ कि जो न मिले उसे खट्टा कह देना उत्तर नहीं है — ‘चलती चींटी सौ योजन पार कर जाती है’।

यह प्रश्न पाठ से क्यों जुड़ा है: शृगाल के पास दो ही रास्ते थे — उपाय बदलना या फल को बुरा कह देना। उसने दूसरा चुना। परियोजना आपसे पहला रास्ता चुनना सिखाती है — असफलता का कारण खोजना, ठीक करना और फिर प्रयत्न करना।
लिखते समय काम आने वाले वाक्य-साँचे: ‘अहं खिन्नः अभवम्’ (मैं दुखी हुआ), ‘अहं पुनः प्रयत्नम् अकरवम्’ (मैंने फिर प्रयत्न किया), ‘गुरुः माम् अबोधयत्’ (गुरु ने मुझे समझाया), ‘अन्ते अहं सफलः अभवम्’ (अन्त में मैं सफल हुआ)। लड़कियाँ ‘खिन्ना अभवम्’, ‘सफला अभवम्’ लिखें।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ