अन्वयः — नीचैः विघ्नभयेन (कार्यम्) न खलु प्रारभ्यते । मध्याः प्रारभ्य विघ्नविहताः (सन्तः) विरमन्ति । उत्तमजनाः तु विघ्नैः पुनः पुनः अपि प्रतिहन्यमानाः, प्रारभ्य च न परित्यजन्ति ।
अर्थः (हिन्दी) — नीच (निकृष्ट स्वभाव वाले) लोग विघ्न के भय से काम आरम्भ ही नहीं करते। मध्यम श्रेणी के लोग आरम्भ तो कर देते हैं, किन्तु विघ्न आते ही रुक जाते हैं (काम छोड़ देते हैं)। उत्तम लोग बार-बार विघ्नों से आहत होने पर भी आरम्भ किए हुए कार्य को नहीं छोड़ते।
भावः — श्लोक मनुष्यों को उनके पुरुषार्थ के आधार पर तीन श्रेणियों में बाँटता है —
| श्रेणी | स्वभावः | पाठ से उदाहरण |
|---|---|---|
| नीचाः | विघ्न के डर से आरम्भ ही नहीं करते | जो अंगूर देखकर उछलता ही नहीं |
| मध्याः | आरम्भ करते हैं, विघ्न आने पर रुक जाते हैं | शृगालः — तीन-चार बार उछलकर छोड़ देता है |
| उत्तमजनाः | बार-बार चोट खाकर भी नहीं छोड़ते | जो उपाय बदलकर अन्ततः फल पा लेता है |
इस दृष्टि से गीत का शृगाल मध्यम श्रेणी में आता है — उसने प्रयत्न तो किया, पर विघ्न (ऊँचाई) देखकर छोड़ दिया, और ऊपर से फल को ही खट्टा कह दिया। श्लोक हमें उत्तमजन बनने की प्रेरणा देता है।