दीपकम् अध्याय 4 योग्यताविस्तरः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
श्लोकान् उच्चैः पठन्तु, अर्थम् अवगच्छन्तु च — प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः। विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः प्रारभ्य चोत्तमजनाः न परित्यजन्ति॥१॥
उत्तर

अन्वयः — नीचैः विघ्नभयेन (कार्यम्) न खलु प्रारभ्यते । मध्याः प्रारभ्य विघ्नविहताः (सन्तः) विरमन्ति । उत्तमजनाः तु विघ्नैः पुनः पुनः अपि प्रतिहन्यमानाः, प्रारभ्य च न परित्यजन्ति ।

अर्थः (हिन्दी) — नीच (निकृष्ट स्वभाव वाले) लोग विघ्न के भय से काम आरम्भ ही नहीं करते। मध्यम श्रेणी के लोग आरम्भ तो कर देते हैं, किन्तु विघ्न आते ही रुक जाते हैं (काम छोड़ देते हैं)। उत्तम लोग बार-बार विघ्नों से आहत होने पर भी आरम्भ किए हुए कार्य को नहीं छोड़ते।

भावः — श्लोक मनुष्यों को उनके पुरुषार्थ के आधार पर तीन श्रेणियों में बाँटता है —

श्रेणीस्वभावःपाठ से उदाहरण
नीचाःविघ्न के डर से आरम्भ ही नहीं करतेजो अंगूर देखकर उछलता ही नहीं
मध्याःआरम्भ करते हैं, विघ्न आने पर रुक जाते हैंशृगालः — तीन-चार बार उछलकर छोड़ देता है
उत्तमजनाःबार-बार चोट खाकर भी नहीं छोड़तेजो उपाय बदलकर अन्ततः फल पा लेता है

इस दृष्टि से गीत का शृगाल मध्यम श्रेणी में आता है — उसने प्रयत्न तो किया, पर विघ्न (ऊँचाई) देखकर छोड़ दिया, और ऊपर से फल को ही खट्टा कह दिया। श्लोक हमें उत्तमजन बनने की प्रेरणा देता है।

व्याकरण-दृष्टि: प्रारभ्यते कर्मवाच्य का रूप है (आरम्भ किया जाता है), इसीलिए कर्ता नीचैः तृतीया विभक्ति, बहुवचन में है — कर्मवाच्य में कर्ता तृतीया में आता है। विघ्नैः भी तृतीया बहुवचन है। प्रारभ्य = प्र + आ + रभ् + ल्यप् (‘आरम्भ करके’) — उपसर्गयुक्त धातु में क्त्वा के स्थान पर ल्यप् आता है। प्रतिहन्यमानाः शानच् प्रत्ययान्त है — ‘चोट खाते हुए’।
सन्धि-विच्छेद: पुनरपि = पुनः + अपि (विसर्ग-सन्धि — विसर्ग का ‘र्’)। चोत्तमजनाः = च + उत्तमजनाः (गुण-सन्धि — अ + उ = ओ)। विघ्नविहताः = विघ्नैः विहताः (तृतीया-तत्पुरुष समास)। यह श्लोक भर्तृहरि के नीतिशतक से लिया गया है।
प्र2.
गच्छन् पिपीलको याति योजनानां शतान्यपि। अगच्छन् वैनतेयोऽपि पदमेकं न गच्छति॥२॥
उत्तर

अन्वयः — गच्छन् पिपीलकः योजनानां शतानि अपि याति । अगच्छन् वैनतेयः अपि एकं पदं न गच्छति ।

अर्थः (हिन्दी) — चलती हुई चींटी सैकड़ों योजन (बहुत लम्बी दूरी) तक चली जाती है; किन्तु न चलने वाला गरुड़ भी एक कदम नहीं चल पाता।

भावः — यहाँ जान-बूझकर सबसे छोटे और सबसे बड़े प्राणी की तुलना की गई है — पिपीलकः (चींटी) अत्यन्त छोटी और धीमी है, वैनतेयः (विनता का पुत्र गरुड़) अत्यन्त बलवान् और वेगवान् है। फिर भी विजय चींटी की होती है, क्योंकि वह चलती रहती है। इसका सन्देश स्पष्ट है — सामर्थ्य से बड़ा निरन्तर प्रयत्न है। थोड़ा-थोड़ा किन्तु प्रतिदिन किया गया अभ्यास बड़ी-से-बड़ी प्रतिभा के आलस्य से आगे निकल जाता है। शृगाल के पास पैर थे, कूदने की शक्ति थी — पर उसने प्रयत्न छोड़ दिया, इसलिए उसे फल नहीं मिला।

व्याकरण-दृष्टि: गच्छन् और अगच्छन् शतृ प्रत्ययान्त (वर्तमान कृदन्त) रूप हैं — ‘चलता हुआ’ और ‘न चलता हुआ’; ये कर्ता ‘पिपीलकः/वैनतेयः’ के विशेषण हैं, अतः प्रथमा एकवचन पुंलिङ्ग में हैं। योजनानाम् — षष्ठी विभक्ति, बहुवचन (योजनों का)। शतानि — द्वितीया बहुवचन, नपुंसकलिङ्ग (सैकड़ों को)। पदम् एकम् — द्वितीया एकवचन।
सन्धि-विच्छेद: शतान्यपि = शतानि + अपि (यण्-सन्धि — इ + अ = य्)। वैनतेयोऽपि = वैनतेयः + अपि (विसर्ग-सन्धि; ‘अ’ का लोप अवग्रह ‘ऽ’ से दिखाया गया)। पदमेकम् = पदम् + एकम्। वैनतेयः = विनतायाः पुत्रः — गरुड़ का नाम; एक योजन लगभग आठ मील (13 कि.मी.) माना जाता है।
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