दीपकम् अध्याय 6 पाठस्य श्लोकाः (६–१०)

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनं, विद्या भोगकरी यशःसुखकरी विद्या गुरूणां गुरुः । विद्या बन्धुजनो विदेशगमने विद्या परा देवता, विद्या राजसु पूज्यते न हि धनं विद्याविहीनः पशुः ॥६॥ — अस्य श्लोकस्य अन्वयं अर्थं भावं च लिखन्तु ।
उत्तर

पदच्छेदः — विद्या, नाम, नरस्य, रूपम्, अधिकम्, प्रच्छन्न-गुप्तम्, धनम्, विद्या, भोगकरी, यशः-सुखकरी, विद्या, गुरूणाम्, गुरुः, विद्या, बन्धु-जनः, विदेश-गमने, विद्या, परा, देवता, विद्या, राजसु, पूज्यते, न, हि, धनम्, विद्या-विहीनः, पशुः ।

अन्वयः — विद्या नाम नरस्य अधिकं रूपं प्रच्छन्नगुप्तं धनं (च अस्ति) । विद्या भोगकरी यशःसुखकरी (च अस्ति) । विद्या गुरूणां गुरुः (अस्ति) । विदेशगमने विद्या बन्धुजनः (भवति) । विद्या परा देवता (अस्ति) । विद्या राजसु पूज्यते, धनं न हि (पूज्यते) । विद्याविहीनः (जनः) पशुः (भवति) ।

अर्थः — विद्या मनुष्य का श्रेष्ठ रूप (सौन्दर्य) है और छिपा हुआ, सुरक्षित धन है। विद्या भोग (सुख-सुविधा) देने वाली तथा यश और सुख देने वाली है। विद्या गुरुओं की भी गुरु है। विदेश-यात्रा में विद्या ही बन्धु है। विद्या ही सर्वश्रेष्ठ देवता है। राजाओं की सभा में विद्या पूजी जाती है, धन नहीं। जो विद्याहीन है वह पशु है।

भावः — यह श्लोक विद्या के आठ रूप गिनाता है — सौन्दर्य, गुप्त धन, भोगदात्री, यश-सुखदात्री, गुरुओं की गुरु, परदेस में बन्धु, परम देवता और राजसभा में सम्मान का आधार। इनमें सबसे मार्मिक पंक्ति है विदेशगमने विद्या बन्धुजनः — परदेस में जब कोई अपना नहीं होता, तब सीखा हुआ ज्ञान ही सहारा बनता है। अन्तिम चरण चेतावनी देता है — विद्याविहीनः पशुः
छन्दः: यह श्लोक शार्दूलविक्रीडितम् छन्द में है (प्रत्येक चरण में 19 वर्ण) — इसीलिए यह शेष श्लोकों से लम्बा है।
व्याकरण: राजसु = सप्तमी बहुवचन (राजाओं में); गुरूणाम् = षष्ठी बहुवचन; पूज्यते कर्मवाच्य (लट्) प्रयोग है — ‘पूजी जाती है’।
अन्त्याक्षरी: ‘पशुः’ → श् → अगला श्लोक ‘नैः पन्थाः…’।
प्र2.
शनैः पन्थाः शनैः कन्था शनैः पर्वतलङ्घनम् । शनैर्विद्या शनैर्वित्तं पञ्चैतानि शनैः शनैः ॥७॥ — अस्य श्लोकस्य अन्वयं अर्थं भावं च लिखन्तु ।
उत्तर

पदच्छेदः — शनैः, पन्थाः, शनैः, कन्था, शनैः, पर्वत-लङ्घनम्, शनैः, विद्या, शनैः, वित्तम्, पञ्च, एतानि, शनैः, शनैः ।

अन्वयः — पन्थाः शनैः, कन्था शनैः, पर्वतलङ्घनं शनैः, विद्या शनैः, वित्तं शनैः च — एतानि पञ्च (कार्याणि) शनैः शनैः (करणीयानि) ।

अर्थः — रास्ता धीरे-धीरे (तय होता है), गुदड़ी धीरे-धीरे (सिली जाती है), पर्वत धीरे-धीरे लाँघा जाता है, विद्या धीरे-धीरे (आती है) और धन धीरे-धीरे (जुड़ता है) — ये पाँचों काम धीरे-धीरे ही होते हैं।

भावः — श्लोक का सन्देश है — धैर्य और नियमितता। मनुष्य को चलते समय सावधानी से चलना चाहिए, वस्त्र सावधानी से सीना चाहिए, पर्वत क्रम से चढ़ना चाहिए तथा विद्या और धन निरन्तर प्रयत्न से अर्जित करने चाहिए। कोई भी बड़ा काम एक छलाँग में पूरा नहीं होता; वह सोपानक्रमेण — सीढ़ी-दर-सीढ़ी — ही पूरा होता है।
सन्धि: शनैर्विद्या = शनैः + विद्या; शनैर्वित्तम् = शनैः + वित्तम् (विसर्ग-सन्धि); पञ्चैतानि = पञ्च + एतानि (वृद्धि-सन्धि — अ + ए = ऐ)।
शब्दार्थ: पन्थाः = मार्गः (रास्ता), कन्था = पुराने वस्त्रों से बनी मोटी चादर/गुदड़ी, वित्तम् = धनम् ।
अन्त्याक्षरी: ‘शनैः’ के अन्त में विसर्ग है, अतः उससे पूर्व का व्यञ्जन न् लिया गया → अगला श्लोक ‘ विद्यया विना…’।
प्र3.
न विद्यया विना सौख्यं नराणां जायते ध्रुवम् । अतो धर्मार्थमोक्षेभ्यो विद्याभ्यासं समाचरेत् ॥८॥ — अस्य श्लोकस्य अन्वयं अर्थं भावं च लिखन्तु ।
उत्तर

पदच्छेदः — न, विद्यया, विना, सौख्यम्, नराणाम्, जायते, ध्रुवम्, अतः, धर्म-अर्थ-मोक्षेभ्यः, विद्याभ्यासम्, समाचरेत् ।

अन्वयः — विद्यया विना नराणां ध्रुवं सौख्यं न जायते । अतः धर्म-अर्थ-मोक्षेभ्यः विद्याभ्यासं समाचरेत् ।

अर्थः — विद्या के बिना मनुष्यों को निश्चित (स्थायी) सुख नहीं मिलता। इसलिए धर्म, अर्थ और मोक्ष की प्राप्ति के लिए विद्या का अभ्यास करना चाहिए।

भावः — मनुष्य के चार पुरुषार्थों में से तीन — धर्म, अर्थ और मोक्ष — विद्या के बिना सिद्ध नहीं होते। धन तो भाग्य से भी मिल सकता है, पर वह ध्रुवं सौख्यम् (स्थिर सुख) नहीं देता; स्थिर सुख विवेक से आता है और विवेक विद्या से। इसीलिए विद्याभ्यास मनुष्य के लिए अनिवार्य है, विकल्प नहीं।
व्याकरण: विना के योग में प्रायः तृतीया विभक्ति आती है — इसीलिए ‘विद्यया विना’ (विद्या के बिना)। धर्मार्थमोक्षेभ्यः पञ्चमी/चतुर्थी बहुवचन का रूप है, यहाँ ‘…के लिए’ अर्थ में। समाचरेत् विधिलिङ् — ‘करना चाहिए’।
सन्धि: अतो धर्मार्थमोक्षेभ्यो = अतः + धर्म… (विसर्ग → ओ) तथा मोक्षेभ्यः + विद्याभ्यासम् ।
अन्त्याक्षरी: ‘समाचरेत्’ → त् → अगला श्लोक ‘ताराणां भूषणम्…’।
प्र4.
ताराणां भूषणं चन्द्रः लतानां भूषणं सुमम् । पृथिव्याः भूषणं राजा विद्या सर्वस्य भूषणम् ॥९॥ — अस्य श्लोकस्य अन्वयं अर्थं भावं च लिखन्तु ।
उत्तर

पदच्छेदः — ताराणाम्, भूषणम्, चन्द्रः, लतानाम्, भूषणम्, सुमम्, पृथिव्याः, भूषणम्, राजा, विद्या, सर्वस्य, भूषणम् ।

अन्वयः — चन्द्रः ताराणां भूषणम् (अस्ति), सुमं लतानां भूषणम् (अस्ति), राजा पृथिव्याः भूषणम् (अस्ति), (परं) विद्या सर्वस्य भूषणम् (अस्ति) ।

अर्थः — चन्द्रमा तारों का आभूषण है, फूल लताओं का आभूषण है, राजा पृथ्वी का आभूषण है, किन्तु विद्या सबका आभूषण है।

भावः — तारे चन्द्रमा के साथ ही शोभा पाते हैं, लताएँ फूलों से सुन्दर लगती हैं और पृथ्वी की शोभा उसका सुशासक बढ़ाता है — पर ये सब सीमित शोभाएँ हैं, हर एक अपने-अपने क्षेत्र की। विद्या ही एकमात्र ऐसा आभूषण है जो सबकी शोभा बढ़ाता है — राजा की भी, प्रजा की भी, धनी की भी और निर्धन की भी। यही श्लोक का चरम-बिन्दु (उत्कर्ष) है।
अलङ्कारः: तीन उदाहरण देकर अन्त में चौथी बात को सबसे बड़ा सिद्ध किया गया है — यह दृष्टान्त तथा क्रमोत्कर्ष की शैली है। ‘भूषणम्’ शब्द की चार बार आवृत्ति से लय बनती है।
अन्त्याक्षरी: ‘भूषणम्’ के अन्त में म् है, अतः नियम के अनुसार उससे पूर्व का व्यञ्जन ण् (या उससे मिलता-जुलता न्) लिया गया → अगला श्लोक ‘ चोरहार्यम्…’। पुस्तक में भी यहाँ (ण्/न्) लिखा है।
प्र5.
न चोरहार्यं न च राजहार्यं न भ्रातृभाज्यं न च भारकारि । व्यये कृते वर्धत एव नित्यं विद्याधनं सर्वधनप्रधानम् ॥१०॥ — अस्य श्लोकस्य अन्वयं अर्थं भावं च लिखन्तु ।
उत्तर

पदच्छेदः — न, चोर-हार्यम्, न, च, राज-हार्यम्, न, भ्रातृ-भाज्यम्, न, च, भारकारि, व्यये, कृते, वर्धते, एव, नित्यम्, विद्या-धनम्, सर्व-धन-प्रधानम् ।

अन्वयः — (विद्याधनं) चोरहार्यं न (अस्ति), राजहार्यं न (अस्ति), भ्रातृभाज्यं न (अस्ति), भारकारि च न (अस्ति); व्यये कृते (विद्याधनं) नित्यं वर्धते एव, (अतः) विद्याधनं सर्वधनप्रधानम् (अस्ति) ।

अर्थः — विद्यारूपी धन को न चोर चुरा सकता है, न राजा छीन सकता है, न भाइयों में बाँटना पड़ता है और न वह बोझ बनता है; खर्च करने पर वह सदा बढ़ता ही है — इसलिए विद्याधन सब धनों में प्रधान है।

भावः — साधारण धन के चार खतरे हैं — चोरी, राजा का अपहरण, बँटवारा और ढोने का बोझ; और उसका पाँचवाँ स्वभाव यह है कि खर्च करने पर वह घटता है। विद्याधन इन पाँचों से मुक्त है। उलटे, विद्यायाः वितरणेन विद्याधनम् इतोऽपि वर्धते — जितना बाँटो, उतना बढ़ता है। इसीलिए यह सर्वधनप्रधानम् कहा गया।
शब्द-रचना: चोरहार्यम् = चोरेण हरणयोग्यम्; राजहार्यम् = राज्ञा हरणयोग्यम्; भ्रातृभाज्यम् = भ्रातृषु विभाजनयोग्यम्; भारकारि = भारं करोति इति (बोझ बनाने वाला)। ‘हार्य, भाज्य’ में ण्यत्/यत् प्रत्यय है — ‘…के योग्य’।
प्रयोगः: व्यये कृते — यह सति सप्तमी (भावे सप्तमी) का प्रयोग है, अर्थात् ‘खर्च कर लेने पर’।
अन्त्याक्षरी: यहीं क्रीडा का यह चक्र पूर्ण होता है।
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