दीपकम् अध्याय 6 पाठस्य श्लोकाः (१–५)

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
रूपयौवनसम्पन्ना विशालकुलसम्भवाः । विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः ॥१॥ — अस्य श्लोकस्य अन्वयं अर्थं भावं च लिखन्तु ।
उत्तर

पदच्छेदः — रूप-यौवन-सम्पन्नाः, विशाल-कुल-सम्भवाः, विद्या-हीनाः, न, शोभन्ते, निर्गन्धाः, इव, किंशुकाः ।

अन्वयः — रूपयौवनसम्पन्नाः विशालकुलसम्भवाः (परन्तु) विद्याहीनाः (जनाः) निर्गन्धाः किंशुकाः इव न शोभन्ते ।

अर्थः — जो लोग रूप और यौवन से सम्पन्न हैं तथा बड़े (उत्तम) कुल में जन्मे हैं, किन्तु विद्याहीन हैं, वे गन्धरहित पलाश (ढाक/टेसू) के फूलों के समान शोभा नहीं पाते।

भावः — पलाश का फूल देखने में अत्यन्त सुन्दर, दहकता हुआ लाल होता है, पर उसमें सुगन्ध नहीं होती — इसलिए न कोई उसे माला में पिरोता है, न पूजा में चढ़ाता है। ठीक वैसे ही सुन्दरता, जवानी और ऊँचा खानदान — ये तीनों बाहरी शोभा हैं; विद्या ही वह सुगन्ध है जो व्यक्ति को सचमुच आदरणीय बनाती है। अतः रूप, यौवन और कुल की अपेक्षा विद्या एव श्रेष्ठा
अलङ्कारः: यहाँ उपमा अलङ्कार है — इव (के समान) वाचक शब्द है; उपमेय = विद्याहीन जन, उपमान = निर्गन्ध किंशुक, साधारण धर्म = ‘न शोभन्ते’।
अन्त्याक्षरी: श्लोक ‘किंशुकाः’ पर समाप्त हुआ → अन्तिम व्यञ्जन क् → अगला श्लोक ‘काव्यशास्त्र…’ से आरम्भ होगा।
प्र2.
काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम् । व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा ॥२॥ — अस्य श्लोकस्य अन्वयं अर्थं भावं च लिखन्तु ।
उत्तर

पदच्छेदः — काव्य-शास्त्र-विनोदेन, कालः, गच्छति, धीमताम्, व्यसनेन, च, मूर्खाणाम्, निद्रया, कलहेन, वा ।

अन्वयः — धीमतां कालः काव्यशास्त्रविनोदेन, मूर्खाणां च (कालः) व्यसनेन निद्रया कलहेन वा गच्छति ।

अर्थः — बुद्धिमानों का समय काव्य और शास्त्रों के आनन्द में बीतता है, और मूर्खों का समय व्यसन (बुरी लत/भोग-विलास), नींद अथवा झगड़े में बीतता है।

भावः — समय सबको बराबर मिलता है — अन्तर केवल उसके उपयोग का है। बुद्धिमन्तः जनाः काव्यानां शास्त्राणां च अनुशीलनेन समयस्य सदुपयोगं कुर्वन्ति, जबकि मूर्ख सोकर, लड़कर या व्यसन में पड़कर अमूल्य समय गँवा देते हैं। इसलिए हमें पढ़ने-लिखने और विद्याभ्यास में समय लगाना चाहिए — वयं नित्यं विद्याभ्यासेन पठनेन लेखनेन वा समयस्य सदुपयोगं कुर्मः ।
विभक्ति देखिए: धीमताम् और मूर्खाणाम् — षष्ठी बहुवचन (…का/के)। व्यसनेन, निद्रया, कलहेन, विनोदेन — तृतीया एकवचन (साधन/करण), अर्थात् ‘…के द्वारा’।
अन्त्याक्षरी: श्लोक ‘वा’ पर समाप्त → व्यञ्जन व् → अगला श्लोक ‘विद्या विवादाय…’।
प्र3.
विद्या विवादाय धनं मदाय, शक्तिः परेषां परिपीडनाय । खलस्य साधोर्विपरीतमेतत्, ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय ॥३॥ — अस्य श्लोकस्य अन्वयं अर्थं भावं च लिखन्तु ।
उत्तर

पदच्छेदः — विद्या, विवादाय, धनम्, मदाय, शक्तिः, परेषाम्, परिपीडनाय, खलस्य, साधोः, विपरीतम्, एतत्, ज्ञानाय, दानाय, च, रक्षणाय ।

अन्वयः — खलस्य विद्या विवादाय, धनं मदाय, शक्तिः परेषां परिपीडनाय (च भवति) । (परं) साधोः एतद्-विपरीतं — (विद्या) ज्ञानाय, (धनं) दानाय, (शक्तिः) रक्षणाय च (भवति) ।

अर्थः — दुष्ट व्यक्ति की विद्या विवाद के लिए, धन घमण्ड के लिए और शक्ति दूसरों को कष्ट देने के लिए होती है। सज्जन का इससे उल्टा होता है — उसकी विद्या ज्ञान के लिए, धन दान के लिए और शक्ति (दुर्बलों की) रक्षा के लिए होती है।

भावः — विद्या, धन और शक्ति — ये तीनों अपने-आप में न अच्छे हैं न बुरे; उनका फल पात्र के स्वभाव पर निर्भर करता है। वही विद्या दुर्जन के हाथ में तर्क-कुतर्क का हथियार बन जाती है और सज्जन के हाथ में ज्ञान बाँटने का साधन। इसीलिए विद्या के साथ सुशीलता का होना अनिवार्य है।
चतुर्थी विभक्ति: विवादाय, मदाय, परिपीडनाय, ज्ञानाय, दानाय, रक्षणाय — ये सब चतुर्थी एकवचन हैं और ‘…के लिए’ (प्रयोजन) का अर्थ देते हैं। यही रूप अभ्यास-प्रश्न ५ की मञ्जूषा में भरने हैं।
सन्धि: साधोर्विपरीतमेतत् = साधोः + विपरीतम् + एतत् (विसर्ग-सन्धि + स्वर-सन्धि)।
अन्त्याक्षरी: ‘रक्षणाय’ → य् → अगला श्लोक ‘येषां न विद्या…’।
प्र4.
येषां न विद्या न तपो न दानं, ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः । ते मर्त्यलोके भुवि भारभूताः, मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ॥४॥ — अस्य श्लोकस्य अन्वयं अर्थं भावं च लिखन्तु ।
उत्तर

पदच्छेदः — येषाम्, न, विद्या, न, तपः, न, दानम्, ज्ञानम्, न, शीलम्, न, गुणः, न, धर्मः, ते, मर्त्य-लोके, भुवि, भार-भूताः, मनुष्य-रूपेण, मृगाः, चरन्ति ।

अन्वयः — येषां (जनानां) विद्या न, तपः न, दानं न, ज्ञानं न, शीलं न, गुणः न, धर्मः (अपि) न (अस्ति), ते मर्त्यलोके भुवि भारभूताः मृगाः मनुष्यरूपेण चरन्ति ।

अर्थः — जिनके पास न विद्या है, न तप, न दान, न ज्ञान, न चरित्र, न गुण और न धर्म — वे इस मृत्युलोक में पृथ्वी पर भार-स्वरूप हैं; वे मनुष्य के रूप में पशु ही विचरते हैं।

भावः — मनुष्य को मनुष्य बनाने वाली वस्तु शरीर नहीं, बल्कि विद्या, तप, दान, ज्ञान, शील, गुण और धर्म — ये सात गुण हैं। जो इन्हें नहीं अपनाता, वह देखने में मनुष्य होते हुए भी आचरण में पशु के समान है और पृथ्वी पर केवल भार है। श्लोक कठोर शब्दों में यही चेतावनी देता है कि जन्म से नहीं, गुणों से मनुष्यता आती है।
सन्धि-विच्छेद: मृगाश्चरन्ति = मृगाः + चरन्ति (विसर्ग-सन्धि — ‘च’ से पहले विसर्ग का ‘श्’ हो गया)। न तपो न दानम् = तपः + न (विसर्ग → ओ)।
अलङ्कारः: ‘मनुष्यरूपेण मृगाः’ में रूपक जैसा प्रयोग है — बिना ‘इव’ के सीधे मनुष्य को मृग कह दिया गया।
अन्त्याक्षरी: ‘चरन्ति’ → त् → अगला श्लोक ‘दा वृत्तिश्च…’।
प्र5.
तदा वृत्तिश्च कीर्तिश्च लक्ष्मीर्वाणी यशस्विनी । तत्त्वज्ञानं परा शान्तिर्यदा विद्या भवेत्तव ॥५॥ — अस्य श्लोकस्य अन्वयं अर्थं भावं च लिखन्तु ।
उत्तर

पदच्छेदः — तदा, वृत्तिः, च, कीर्तिः, च, लक्ष्मीः, वाणी, यशस्विनी, तत्त्वज्ञानम्, परा, शान्तिः, यदा, विद्या, भवेत्, तव ।

अन्वयः — यदा तव विद्या भवेत्, तदा (तव) वृत्तिः, कीर्तिः, लक्ष्मीः, यशस्विनी वाणी, तत्त्वज्ञानं, परा शान्तिः च (भवेत्) ।

अर्थः — जब तुम्हारे पास विद्या होगी, तभी तुम्हें आजीविका, कीर्ति, सम्पत्ति, यशस्विनी वाणी, तत्त्वज्ञान और परम शान्ति — ये सब प्राप्त होंगे।

भावः — विद्या केवल एक वस्तु नहीं देती, बल्कि छह वस्तुएँ एक साथ देती है — रोज़गार, नाम, धन, प्रभावशाली वाणी, वास्तविक ज्ञान और मन की शान्ति। ध्यान दीजिए कि श्लोक में शर्त पहले है और फल बाद में — यदा विद्या भवेत्, तदा…। अर्थात् इन सबकी जड़ विद्या ही है, इसलिए निरन्तर विद्यार्जन करना चाहिए।
व्याकरण: भवेत् विधिलिङ् लकार (प्रथमपुरुष एकवचन) है — ‘हो/होना चाहिए’। वृत्तिश्च कीर्तिश्च = वृत्तिः + च, कीर्तिः + च (विसर्ग-सन्धि)। लक्ष्मीर्वाणी = लक्ष्मीः + वाणी; शान्तिर्यदा = शान्तिः + यदा; भवेत्तव = भवेत् + तव ।
अन्त्याक्षरी: ‘भवेत्तव’ → व् → अगला श्लोक ‘विद्या नाम नरस्य…’।
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