पदच्छेदः — येषाम्, न, विद्या, न, तपः, न, दानम्, ज्ञानम्, न, शीलम्, न, गुणः, न, धर्मः, ते, मर्त्य-लोके, भुवि, भार-भूताः, मनुष्य-रूपेण, मृगाः, चरन्ति ।
अन्वयः — येषां (जनानां) विद्या न, तपः न, दानं न, ज्ञानं न, शीलं न, गुणः न, धर्मः (अपि) न (अस्ति), ते मर्त्यलोके भुवि भारभूताः मृगाः मनुष्यरूपेण चरन्ति ।
अर्थः — जिनके पास न विद्या है, न तप, न दान, न ज्ञान, न चरित्र, न गुण और न धर्म — वे इस मृत्युलोक में पृथ्वी पर भार-स्वरूप हैं; वे मनुष्य के रूप में पशु ही विचरते हैं।
भावः — मनुष्य को मनुष्य बनाने वाली वस्तु शरीर नहीं, बल्कि विद्या, तप, दान, ज्ञान, शील, गुण और धर्म — ये सात गुण हैं। जो इन्हें नहीं अपनाता, वह देखने में मनुष्य होते हुए भी आचरण में पशु के समान है और पृथ्वी पर केवल भार है। श्लोक कठोर शब्दों में यही चेतावनी देता है कि जन्म से नहीं, गुणों से मनुष्यता आती है।
सन्धि-विच्छेद: मृगाश्चरन्ति = मृगाः + चरन्ति (विसर्ग-सन्धि — ‘च’ से पहले विसर्ग का ‘श्’ हो गया)। न तपो न दानम् = तपः + न (विसर्ग → ओ)।
अलङ्कारः: ‘मनुष्यरूपेण मृगाः’ में रूपक जैसा प्रयोग है — बिना ‘इव’ के सीधे मनुष्य को मृग कह दिया गया।
अन्त्याक्षरी: ‘चरन्ति’ → त् → अगला श्लोक ‘तदा वृत्तिश्च…’।