प्र1.
अरे भारति ! बहिः वृष्टिः अस्ति, कथं क्रीडामः ?
उत्तर
भारती उत्तरं ददाति — वृष्टिः अस्तु नाम । इच्छा अस्ति चेत् क्रीडामः । बहिर्गमनस्य आवश्यकता एव नास्ति । एषा नूतना क्रीडा अस्ति भोः ! ‘अन्त्याक्षरी क्रीडा’ इति ।
[वर्षा हो रही है तो होने दो। यदि इच्छा है तो खेलेंगे। बाहर जाने की आवश्यकता ही नहीं है। यह एक नया खेल है — ‘अन्त्याक्षरी क्रीडा’।]
वाक्य कैसे बना: अस्तु नाम का अर्थ है ‘हो जाने दो / कोई बात नहीं’। इच्छा अस्ति चेत् — ‘चेत्’ का अर्थ ‘यदि’ है और वह वाक्य के आरम्भ में नहीं, बीच में आता है। बहिर्गमनस्य = बहिर्गमनम् + षष्ठी एकवचन, अर्थात् ‘बाहर जाने की’।
ध्यान दें: बहिः + गमनम् = बहिर्गमनम् — विसर्ग-सन्धि (विसर्ग के बाद ग् आने पर विसर्ग ‘र्’ हो जाता है)।