रूपयौवनसम्पन्नाः विशालकुलसम्भवाः अपि विद्याहीनाः जनाः निर्गन्धाः किंशुकाः इव न शोभन्ते ।
[रूप और यौवन से सम्पन्न तथा बड़े कुल में जन्मे होने पर भी विद्याहीन लोग गन्धरहित पलाश-पुष्पों के समान शोभा नहीं पाते।]
दीपकम् अध्याय 6 वयम् अभ्यासं कुर्मः
अद्यतन2026-09-05
प्र1.
निर्गन्धाः किंशुकाः इव के न शोभन्ते ?
उत्तर
संक्षिप्त उत्तर भी मान्य: विद्याहीनाः (जनाः) निर्गन्धाः किंशुकाः इव न शोभन्ते । पूर्णवाक्य में उत्तर देते समय प्रश्न के शब्द ज्यों-के-त्यों रखकर केवल ‘के’ के स्थान पर उत्तर-पद विद्याहीनाः रख दीजिए।
ध्यान दें: ‘के’ प्रथमा बहुवचन (पुंलिङ्ग) है, अतः उत्तर भी प्रथमा बहुवचन में — विद्याहीनाः, न कि ‘विद्याहीनः’।
प्र2.
मूर्खाणां कालः कथं गच्छति ?
उत्तर
मूर्खाणां कालः व्यसनेन निद्रया कलहेन वा गच्छति ।
[मूर्खों का समय व्यसन से, नींद से अथवा झगड़े से बीतता है।]
तीनों साधन तृतीया में: व्यसनेन, निद्रया, कलहेन — तीनों तृतीया एकवचन हैं, क्योंकि ये बताते हैं कि समय किस के द्वारा बीतता है। ‘वा’ का अर्थ ‘अथवा’ है।
तुलना कीजिए: इसी श्लोक का पूर्वार्ध कहता है — धीमतां कालः काव्यशास्त्रविनोदेन गच्छति । एक ही श्लोक में मूर्ख और बुद्धिमान का अन्तर स्पष्ट कर दिया गया है।
प्र3.
दुर्जनः विद्यायाः धनस्य शक्तेः च उपयोगं कथं करोति ?
उत्तर
दुर्जनः विद्यायाः उपयोगं विवादाय, धनस्य उपयोगं मदाय, शक्तेः उपयोगं च परेषां परिपीडनाय करोति ।
[दुर्जन विद्या का उपयोग झगड़े के लिए, धन का उपयोग घमण्ड के लिए और शक्ति का उपयोग दूसरों को कष्ट देने के लिए करता है।]
| वस्तु | दुर्जनस्य उपयोगः | सज्जनस्य उपयोगः |
|---|---|---|
| विद्या | विवादाय | ज्ञानाय |
| धनम् | मदाय | दानाय |
| शक्तिः | परिपीडनाय | रक्षणाय |
श्लोक का आधार: श्लोक ३ — विद्या विवादाय धनं मदाय, शक्तिः परेषां परिपीडनाय । खलस्य साधोर्विपरीतमेतत्… ‘खल’ और ‘दुर्जन’ पर्यायवाची हैं।
प्र4.
कीदृशाः मनुष्याः भुवि भारभूताः भवन्ति ?
उत्तर
येषां न विद्या, न तपः, न दानम्, न ज्ञानम्, न शीलम्, न गुणः, न धर्मः — तादृशाः मनुष्याः भुवि भारभूताः भवन्ति ।
[जिनके पास न विद्या है, न तप, न दान, न ज्ञान, न चरित्र, न गुण और न धर्म — ऐसे मनुष्य पृथ्वी पर भार-स्वरूप होते हैं।]
श्लोक ४ की सात कमियाँ: विद्या, तप, दान, ज्ञान, शील, गुण और धर्म — इन सातों से रहित व्यक्ति ही भारभूतः कहा गया है; वह मनुष्यरूपेण मृगः — मनुष्य के रूप में पशु — है।
शब्दार्थ: भुवि = भूमौ (पृथ्वी पर, सप्तमी एकवचन); भारभूताः = भारकराः (भार-स्वरूप)।
प्र5.
शनैः शनैः कानि साधनीयानि ?
उत्तर
पन्थाः, कन्था, पर्वतलङ्घनम्, विद्या, वित्तम् — एतानि पञ्च शनैः शनैः साधनीयानि ।
[रास्ता, गुदड़ी, पर्वत लाँघना, विद्या और धन — ये पाँच काम धीरे-धीरे ही सिद्ध करने चाहिए।]
श्लोक ७ का आधार: शनैः पन्थाः शनैः कन्था शनैः पर्वतलङ्घनम् । शनैर्विद्या शनैर्वित्तं पञ्चैतानि शनैः शनैः ॥ ‘पञ्चैतानि’ = पञ्च + एतानि, अतः उत्तर में पाँचों नाम गिनाना आवश्यक है।
अर्थ याद रखें: पन्थाः = मार्ग, कन्था = पुराने वस्त्रों से बनी गुदड़ी, वित्तम् = धन।