प्र1.
(क) क्षणशः कणशः साधयेत् / (ख) सर्वश्रेष्ठम् आभूषणम् / (ग) रत्नं न अन्विष्यति, तत् / (घ) आद्यं धर्मसाधनम् / (ङ) हितकारकं मनोहारि च वचः / (च) पूजास्थानम् — दक्षिणस्तम्भः : शरीरम्, गुणाः, दुर्लभम्, शीलम्, विद्याम् अर्थं च, मृग्यते
उत्तर
पुस्तक में (क) का मेल उदाहरण के रूप में पहले से जोड़ा गया है — क्षणशः कणशः साधयेत् → विद्याम् अर्थं च। शेष इस प्रकार जुड़ेंगे —
| क्रमः | वामस्तम्भः | मेलनम् (दक्षिणस्तम्भः) | आधारभूता सूक्तिः |
|---|---|---|---|
| (क) | क्षणशः कणशः साधयेत् | विद्याम् अर्थं च | क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत् ॥४॥ (उदाहरणम्) |
| (ख) | सर्वश्रेष्ठम् आभूषणम् | शीलम् | शीलं परं भूषणम् ॥९॥ |
| (ग) | रत्नं न अन्विष्यति, तत् | मृग्यते | न रत्नमन्विष्यति, मृग्यते हि तत् ॥२॥ |
| (घ) | आद्यं धर्मसाधनम् | शरीरम् | शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम् ॥३॥ |
| (ङ) | हितकारकं मनोहारि च वचः | दुर्लभम् | हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः ॥१०॥ |
| (च) | पूजास्थानम् | गुणाः | गुणाः पूजास्थानं गुणिषु न च लिङ्गं न च वयः ॥६॥ |
पूर्ण वाक्यों के रूप में —
- सर्वश्रेष्ठम् आभूषणं शीलम् (अस्ति) । [सर्वश्रेष्ठ आभूषण शील है।]
- रत्नं न अन्विष्यति, तत् मृग्यते । [रत्न नहीं ढूँढ़ता, वह ढूँढ़ा जाता है।]
- आद्यं धर्मसाधनं शरीरम् (अस्ति) । [धर्म का पहला साधन शरीर है।]
- हितकारकं मनोहारि च वचः दुर्लभम् (अस्ति) । [हितकारी और मनोहर वचन दुर्लभ है।]
- गुणिषु पूजास्थानं गुणाः (सन्ति) । [गुणवानों में आदर का स्थान गुण हैं।]
मिलान की युक्ति: दायें स्तम्भ के जिस पद का लिङ्ग-वचन बायें पद से मेल खाए, वही जोड़ा सही होता है — जैसे ‘पूजास्थानम्’ के सामने ‘गुणाः’ (बहुवचन) आया, क्योंकि सूक्ति में भी गुण ही पूजास्थान बताए गए हैं।