कुतूहल अध्याय 11 क्रियाकलाप 11.7: आइए, प्रयोग करें

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
चित्र 11.10 में दर्शाए अनुसार दर्पण के सामने उस पेन को रखिए। आप दर्पण में क्या देखते हैं?
उत्तर

दर्पण में एक दूसरा पेन दिखाई देता है, जो दर्पण के पीछे रखा प्रतीत होता है और बिल्कुल असली पेन जैसा ही दिखता है।

मेज पर रखा पेन वस्तु है; दर्पण के पीछे दिखाई देने वाला पेन दर्पण द्वारा बना उसका प्रतिबिंब है।

ऐसा क्यों होता है: पेन के प्रत्येक बिंदु से चला प्रकाश दर्पण पर पड़कर परावर्तित होता है और आपकी आँख तक पहुँचता है। परावर्तित किरणें आँख तक ऐसे पहुँचती हैं मानो वे दर्पण के पीछे किसी बिंदु से चली हों। वहाँ वास्तव में कोई पेन नहीं होता — परंतु आँख यह अंतर नहीं कर पाती और हमें प्रतिबिंब दिखाई देता है।
प्र2.
अब दर्पण के सामने पेन को भिन्न-भिन्न स्थितियों में रखिए और प्रत्येक स्थिति में दर्पण में बने प्रतिबिंबों के आमापों की तुलना कीजिए। क्या वस्तु तथा इसके प्रतिबिंब दोनों के आमाप समान हैं?
उत्तर

हाँ। प्रत्येक स्थिति में प्रतिबिंब का आमाप ठीक पेन के आमाप के बराबर होता है।

प्रतिबिंब का आमाप = वस्तु का आमाप

पेन को दर्पण के पास लाइए या दूर ले जाइए — प्रतिबिंब वस्तु की तुलना में कभी न बड़ा होता है, न छोटा।

स्वयं जाँचिए: 15 cm का पैमाना दर्पण के सामने रखिए। उसका प्रतिबिंब भी 15 cm लंबा ही दिखेगा। इसी कारण तैयार होने के लिए समतल दर्पण उपयुक्त रहता है, चम्मच की पीठ जैसा वक्र दर्पण नहीं।
प्र3.
पुनः पेन को दर्पण के सामने भिन्न-भिन्न स्थितियों में रखिए और ध्यान से देखिए कि क्या प्रत्येक स्थिति में प्रतिबिंब सीधा बनता है? क्या पेन की नोक प्रत्येक स्थिति में ऊपर की ओर इंगित करती हुई दिखाई देती है?
उत्तर

हाँ। प्रत्येक स्थिति में प्रतिबिंब सीधा बनता है और पेन की नोक ऊपर की ओर ही इंगित करती दिखाई देती है — प्रतिबिंब कभी उल्टा नहीं बनता।

जिस प्रतिबिंब के ऊपरी व निचले सिरे वस्तु के सिरों के समान ही हों, उसे सीधा प्रतिबिंब कहते हैं। किसी समतल दर्पण द्वारा बना प्रतिबिंब सीधा होता है।

संकेत: ‘सीधा’ का अर्थ ‘अपरिवर्तित’ नहीं है। दर्पण का प्रतिबिंब सीधा तो होता है, परंतु बाएँ-दाएँ पलटा हुआ होता है — यही पार्श्व उत्क्रमण है, जिसे आप क्रियाकलाप 11.8 में देखेंगे।
प्र4.
अब दर्पण के पीछे पर्दे को ऊर्ध्वाधर दिशा में रखिए। इसे सभी ओर घुमाइए। क्या आपको पर्दे पर प्रतिबिंब मिल पाता है? अब दर्पण के सामने पर्दे को रखकर इसे दोहराइए।
उत्तर

नहीं। प्रतिबिंब पर्दे पर प्राप्त नहीं होता — न दर्पण के पीछे और न ही दर्पण के सामने। पर्दे को कहीं भी घुमाइए, उस पर कुछ नहीं बनता।

ऐसा क्यों होता है: परावर्तित किरणें दर्पण के पीछे वास्तव में मिलती नहीं हैं; वे केवल वहाँ से आती हुई प्रतीत होती हैं। जहाँ प्रतिबिंब बनता दिखता है वहाँ वास्तव में कोई प्रकाश पहुँचता ही नहीं, इसलिए पर्दे पर पकड़ने के लिए कुछ होता ही नहीं। ऐसे प्रतिबिंब को आभासी प्रतिबिंब कहते हैं — समतल दर्पण द्वारा बने प्रतिबिंब को पर्दे पर प्राप्त नहीं किया जा सकता।
तुलना कीजिए: अनुभाग 11.7 का सूचीछिद्र कैमरा इसका ठीक उल्टा उदाहरण है — वहाँ किरणें वास्तव में अनुरेखण पत्र पर मिलती हैं, अत: वह प्रतिबिंब पर्दे पर प्राप्त किया जा सकता है।
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