प्र1.
किसी दर्पण में मैं अपना चेहरा भी देख सकती हूँ। क्या यह भी प्रकाश के परावर्तन के कारण होता है?
उत्तर
हाँ। दर्पण में अपना चेहरा दिखाई देना भी ठीक वैसा ही प्रभाव है जैसा दीवार पर बना चमकीला चकता — यह प्रकाश का परावर्तन ही है।
दीपक अथवा सूर्य का प्रकाश आपके चेहरे पर पड़ता है। आपका चेहरा इस प्रकाश को चारों दिशाओं में भेजता है; उसका कुछ भाग दर्पण तक पहुँचता है और दर्पण उसे परावर्तित करके आपकी आँखों तक लौटा देता है। हमारा मस्तिष्क इस प्रकाश को दर्पण के पीछे से आता हुआ समझता है, इसलिए वहाँ एक चेहरा दिखाई देता है — यही आपका प्रतिबिंब है।
ऐसा क्यों होता है: समतल दर्पण की सतह अत्यंत चिकनी होती है, अत: चेहरे के एक बिंदु से आने वाली सभी किरणें व्यवस्थित रूप से परावर्तित होकर दर्पण के पीछे एक ही बिंदु से आती प्रतीत होती हैं। दीवार खुरदरी होती है और किरणों को चारों ओर बिखेर देती है, इसलिए उस पर प्रतिबिंब नहीं बनता — यही कारण है कि दीवार में अपना चेहरा नहीं दिखता।