कुतूहल अध्याय 11 अन्वेषणात्मक परियोजनाएँ

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
जहाँ आप रहते हैं, क्या वहाँ आपने कभी कोई जुगनू देखा है? यदि नहीं, तो अपने बड़े-बुजुर्गों से पूछिए कि क्या उस क्षेत्र में कभी जुगनू दिखाई पड़ते थे। यदि हाँ, तो उन कारणों का पता लगाइए जिनके कारण अब वे दिखाई देने बंद हो गए हैं। इसके विषय में एक कहानी बनाइए।
उत्तर

परियोजना कैसे कीजिए: अपने परिवार अथवा मोहल्ले के दो-तीन बुजुर्गों से बात कीजिए। पूछिए कि वे जुगनू कहाँ और किन महीनों में देखते थे, क्या उनकी संख्या घटी है, और उस स्थान पर तब से क्या बदला — नई स्ट्रीट लाइट, मकान, पेड़ों की कटाई, कीटनाशकों का प्रयोग। उत्तर नोट कीजिए और फिर उन्हें एक छोटी कहानी में पिरो दीजिए।

जुगनुओं के लुप्त होने के सामान्यत: मिलने वाले कारण —

  • प्रकाश-प्रदूषण — तेज स्ट्रीट लाइट और विज्ञापन-पट्टों के प्रकाश में जुगनू की अपनी चमक दब जाती है, जिससे नर-मादा एक-दूसरे को ढूँढ़ नहीं पाते।
  • वनावरण एवं घास के मैदानों का घटना — जिन नम खेतों, झाड़ियों और पत्तों की तह में इनके डिंभक पलते हैं, वे मकानों और सड़कों के लिए साफ कर दिए गए।
  • कीटनाशकों का प्रयोग — इनसे जुगनू भी मरते हैं और वे घोंघे व छोटे कीट भी, जो इनके डिंभकों का भोजन हैं।
  • अत्यधिक पर्यटन तथा शोर और आस-पास के तालाबों व नालों का सूख जाना।
नमूना उत्तर (छोटी कहानी): ‘‘दादी बताती हैं कि जब वे दस वर्ष की थीं, तब घर के पीछे वाले अमरूद के बगीचे में सावन की रातें सैकड़ों नन्हे हरे दीपकों से जगमगा उठती थीं। बच्चे उन्हें जुगनू कहते, काँच की शीशी में भरते और सोने से पहले उड़ा देते। आज उसी बगीचे की जगह एक ऊँचा बिजली का खंभा खड़ा है। रात कभी पूरी तरह अँधेरी होती ही नहीं, और जुगनू वर्षों से नहीं लौटे। दादी कहती हैं — जुगनू हमें छोड़कर नहीं गए, हमने उनका अँधेरा छीन लिया।’’ कहानी के अंत में एक कार्य लिखिए जो आपका परिवार करेगा, जैसे रात में बाहर की बत्ती बुझा देना।
प्र2.
क्रियाकलाप 11.4 को दोहराइए परंतु इस बार टॉर्च के प्रकाश उत्सर्जक सिरे को रंगीन पारदर्शी कागज से ढक दीजिए और छाया का रंग देखिए। यह क्रिया विभिन्न रंगों के पारदर्शी कागजों का उपयोग करके दोहराइए।
उत्तर

आप क्या प्रेक्षित करेंगे —

टॉर्च पर लगे कागज का रंगपर्दे के प्रकाशित भाग का रंगछाया का रंग
लाललालकाली
हराहराकाली
नीलानीलाकाली
पीलापीलाकाली

निष्कर्ष: रंगीन कागज प्रकाश का रंग बदलता है और इसी से छाया के चारों ओर प्रकाशित भाग का रंग बदल जाता है। छाया प्रत्येक स्थिति में काली ही रहती है — उसकी आकृति और आमाप भी नहीं बदलते। छाया का अपना कोई रंग नहीं होता, क्योंकि वह तो केवल वह स्थान है जहाँ प्रकाश पहुँचा ही नहीं।

यह कीजिए: थोड़ी दूरी पर दो टॉर्च रखिए — एक पर लाल और दूसरे पर हरा कागज। प्रत्येक अपनी अलग छाया बनाएगी और प्रत्येक छाया दूसरी टॉर्च के प्रकाश से प्रकाशित हो जाएगी — अत: काली के स्थान पर एक लालिमा लिए और एक हरापन लिए क्षेत्र दिखाई देंगे। कक्षा में दिखाने योग्य सुंदर परिणाम।
प्र3.
एक समतल दर्पण किसी वस्तु का केवल एक प्रतिबिंब बनाता है। किंतु यदि दो या दो से अधिक समतल दर्पण एक दूसरे से कोई कोण बनाते हुए या एक दूसरे के समांतर रखे हों तो क्या होगा? चित्र 11.21 में दर्शाए अनुसार दो दर्पण रख कर पता लगाइए कि इनसे कितने प्रतिबिंब बनते हैं।
उत्तर

दो दर्पण मिलकर अनेक प्रतिबिंब बनाते हैं, क्योंकि प्रत्येक दर्पण दूसरे दर्पण द्वारा बने प्रतिबिंबों का भी प्रतिबिंब बनाता है — अर्थात परावर्तनों के परावर्तन। प्रतिबिंबों की संख्या दर्पणों के बीच के कोण पर निर्भर करती है।

प्रतिबिंबों की संख्या = (360° ÷ दर्पणों के बीच का कोण) − 1
दोनों दर्पणों के बीच का कोणदिखाई देने वाले प्रतिबिंबों की संख्या
180° (एक ही सीध में)1
120°2
90° (जैसा चित्र 11.21 में है)3
60°5
45°7
आमने-सामने समांतरप्रतिबिंबों की बहुत लंबी, प्राय: अंतहीन दिखती पंक्ति

चित्र 11.21 के अनुसार 90° पर जुड़े दो दर्पणों के बीच एक बोतल का ढक्कन रखकर गिनिए — ढक्कन के साथ आपको तीन प्रतिबिंब दिखाई देंगे। दर्पणों को 60° पर लाने पर यह संख्या बढ़कर पाँच हो जाती है।

ऐसा क्यों होता है: पहला दर्पण ढक्कन का प्रतिबिंब बनाता है। यह प्रतिबिंब दूसरे दर्पण के लिए वस्तु का कार्य करता है और दूसरा दर्पण उसका भी प्रतिबिंब बना देता है, और यह क्रम आगे चलता जाता है। प्रत्येक परावर्तन नए प्रतिबिंब जोड़ता जाता है। समांतर दर्पणों में यह क्रम कभी समाप्त नहीं होता — प्रतिबिंब केवल क्रमश: मंद पड़ते जाते हैं, क्योंकि प्रत्येक परावर्तन पर कुछ प्रकाश खो जाता है।
क्या आप जानते हैं? अनुभाग 11.8.2 का बहुमूर्तिदर्शी तीन दर्पणों को 60° पर जोड़कर बनाया जाता है, इसीलिए उसमें इतने सुंदर सममित प्रतिरूप बनते हैं।
प्र4.
आपको एक छोटा समतल दर्पण दिया गया है। क्या इस दर्पण में इसके आमाप से बड़ी वस्तु जैसे कि किसी विशाल वृक्ष का प्रतिबिंब बन सकता है? विचार कीजिए और पूर्वानुमान लगाइए। इसके पश्चात क्रियाकलाप कीजिए।
उत्तर

पूर्वानुमान एवं परिणाम — हाँ, बन सकता है। दर्पण का छोटा टुकड़ा बाहर ले जाइए, उसे हाथ फैलाकर पकड़िए और आँख को इधर-उधर हिलाइए — उसमें पूरा वृक्ष, थोड़ा-थोड़ा करके तथा उपयुक्त स्थिति में एक साथ भी दिखाई दे जाता है।

ऐसा क्यों होता है: प्रतिबिंब का आमाप दर्पण के आमाप पर निर्भर नहीं करता। वृक्ष के प्रत्येक भाग से चला प्रकाश छोटे दर्पण पर पड़कर परावर्तित होता है; दर्पण अपने पीछे वृक्ष का पूरा प्रतिबिंब, वृक्ष के ही आमाप का, बना देता है। आपकी आँख तक केवल वे ही किरणें पहुँच पाती हैं जो उस छोटे टुकड़े से होकर आती हैं — अत: दर्पण उस प्रतिबिंब को देखने की एक छोटी खिड़की जैसा कार्य करता है। आँख या दर्पण हिलाने पर आप उस खिड़की से दूसरा भाग देख लेते हैं।
स्वयं जाँचिए: छोटे दर्पण को आँख के बिल्कुल पास लाकर देखिए — केवल आँख दिखाई देती है। अब हाथ फैलाकर वही दर्पण देखिए — उसमें पूरा चेहरा आ जाता है। दर्पण जितना दूर, दृश्य उतना चौड़ा।
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