कुतूहल अध्याय 3 क्रियाकलाप 3.5

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
किसी भी रंग का एक एल.ई.डी. लीजिए (चित्र 3.6) और उसका निरीक्षण कीजिए। क्या आप इसके भीतर कोई तंतु देखते हैं?
उत्तर

नहीं। तापदीप्त लैंपों के विपरीत एल.ई.डी. में तंतु नहीं होते (चित्र 3.6)।

रंगीन गुंबद के भीतर केवल एक छोटी कटोरी दिखाई देती है जिसमें एक कण-सा पदार्थ लगा होता है और वह दोनों तारों से जुड़ा रहता है। धारा प्रवाहित होने पर वही पदार्थ सीधे प्रकाश देने लगता है — किसी वस्तु को पहले लाल-गर्म होने की आवश्यकता नहीं पड़ती।

क्या आप जानते हैं? एल.ई.डी. का अर्थ है प्रकाश उत्सर्जक डायोड (लाइट एमिटिंग डायोड)। चूँकि इसमें तंतु को गर्म करने में ऊर्जा व्यर्थ नहीं होती, अतः यह उतनी ही चमक कहीं कम विद्युत में देता है और अधिक समय तक चलता है। इसीलिए आजकल अधिकांश टॉर्च, सड़क-बत्तियाँ तथा घरेलू बल्ब एल.ई.डी. वाले होते हैं।
प्र2.
एल.ई.डी. से जुड़े दो तारों को ध्यान से देखिए। क्या आप इनमें से एक को दूसरे से अधिक लंबा पाते हैं?
उत्तर

हाँ। एल.ई.डी. से निकलने वाले दो तारों में से एक स्पष्ट रूप से दूसरे से लंबा होता है, और लंबाई का यह अंतर ही टर्मिनलों की पहचान का संकेत है।

एल.ई.डी. का तारकौन-सा टर्मिनलकिससे जोड़ना चाहिए
लंबा तारधनात्मक (+) टर्मिनलबैटरी का धन टर्मिनल
छोटा तारऋणात्मक (–) टर्मिनलबैटरी का ऋण टर्मिनल
ऐसा क्यों होता है: एल.ई.डी. में धारा केवल एक ही दिशा में प्रवाहित हो सकती है। इसलिए निर्माता एक तार को लंबा छोड़ देते हैं ताकि बिना किसी छपे चिह्न के भी दिशा पहचानी जा सके। उलटा जोड़ने पर एल.ई.डी. मंद नहीं जलती — वह बिलकुल भी दीप्त नहीं होती।
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