प्र1.
क्या आपने नदी के तल पर अथवा झीलों में महीन रेत को एकत्रित होते हुए देखा है?
उत्तर
हाँ। यह महीन रेत तब बनती है जब चट्टान, मृदा, कंकड़ और तलछट टूटकर वायु एवं बहते जल जैसी प्राकृतिक शक्तियों द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान पर चले जाते हैं। इस प्रक्रिया को अपरदन कहते हैं।
बड़ी चट्टान → कंकड़ एवं मृदा में टूटना (अपक्षय)
वायु एवं बहते जल द्वारा इनका बहकर जाना (अपरदन)
झील अथवा महासागर में जल/वायु की गति घटी → पदार्थ नीचे बैठ गया
तलछट हजारों वर्षों में कठोर होकर → नई चट्टानें
वायु एवं बहते जल द्वारा इनका बहकर जाना (अपरदन)
झील अथवा महासागर में जल/वायु की गति घटी → पदार्थ नीचे बैठ गया
तलछट हजारों वर्षों में कठोर होकर → नई चट्टानें
ऐसा क्यों होता है: तीव्र गति से बहता जल और वायु अपने साथ ढीला पदार्थ ले जा सकते हैं। जहाँ उनकी गति घटती है — जैसे नदी के झील अथवा सागर में मिलने पर — वहाँ वे उस भार को सँभाल नहीं पाते और पदार्थ तली में बैठ जाता है। मार्ग में कंकड़ आपस में और नदी-तल से टकराते रहते हैं, इसीलिए नदी के कंकड़ चिकने एवं गोल दिखाई देते हैं।
संकेत: भूस्खलन के दौरान होने वाला अपरदन एक भौतिक परिवर्तन है — चट्टान केवल टूटती और स्थानांतरित होती है, कोई नया पदार्थ नहीं बनता। इनमें से अधिकतर परिवर्तन हजारों वर्षों में होते हैं और उत्क्रमित नहीं किए जा सकते।