कुतूहल अध्याय 7 पाठ्य प्रश्न

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
क्या ऐसे घरों का निर्माण करना संभव है जो बाहरी गरमी और सरदी से अधिक प्रभावित न हों?
उत्तर

हाँ, संभव है। बहुत गरम अथवा बहुत ठंडे जलवायु वाले स्थानों में बनाए गए घर ऊष्मा-स्थानांतरण की अवधारणा का उपयोग करके स्वयं को ठंडा या गरम रखते हैं — मुख्यतः भीतर और बाहर के बीच ऊष्मा का कोई कुचालक रखकर।

  • बाहरी दीवारों में खोखली ईंटें: खोखले भाग में फँसी वायु कुचालक होती है, अतः घर सर्दियों में गरम और गर्मियों में ठंडे रहते हैं।
  • लकड़ी की दो परतों के बीच गोबर और मृदा: जैसा उत्तराखंड के उत्तरकाशी स्थित मोरी विकासखंड में किया जाता है। लकड़ी और मृदा कुचालक हैं, अतः वे ऊष्मा की हानि रोककर भारी हिमपात में भी घर को गरम रखते हैं।
  • मोटी मिट्टी की दीवारें और छप्पर की छतें भारत के गरम-शुष्क भागों में, तथा सूर्य की ऊष्मा को परावर्तित करने वाली हल्के रंग की बाहरी दीवारें।
यह कैसे काम करता है: ऊष्मा सदैव अधिक गरम ओर से ठंडी ओर बहती है। यदि उनके बीच की दीवार कुचालक हो तो यह प्रवाह लगभग रुक जाता है — गर्मियों में ऊष्मा भीतर नहीं आ पाती और सर्दियों में बाहर नहीं जा पाती।
प्र2.
धुआँ ऊपर क्यों उठता है?
उत्तर

क्योंकि धुआँ अपने आस-पास की वायु से अधिक गरम और हल्का होता है।

लकड़ी जलती है → गरम गैसें और सूक्ष्म ठोस कण निकलते हैं (यही मिश्रण धुआँ है)
धुआँ आस-पास की वायु से अधिक गरम होता है
गरम गैस फैलती है → अधिक स्थान घेरती है → हल्की हो जाती है
⇒ धुआँ ऊपर उठ जाता है
ऐसा क्यों होता है: गरम होने पर गैस फैल जाती है। उतनी ही मात्रा अब अधिक स्थान घेरती है, अतः वह आस-पास की ठंडी वायु से हल्की हो जाती है और ठंडी, भारी वायु उसे ऊपर धकेल देती है। ठंडी वायु किनारों से आकर उसका स्थान ले लेती है — गरम पदार्थ के इसी गमन को संवहन कहते हैं।
यह करके देखिए: शांत कमरे में अगरबत्ती जलाकर धुएँ की पतली लकीर देखिए। वह पहले सीधी ऊपर चढ़ती है और ठंडी होकर कमरे की वायु में मिलते ही मुड़ जाती है।
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