कुतूहल अध्याय 9 क्रियाकलाप 9.3: आइए, खोज करें

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
क्या आपको चूने के पानी के रंग में कोई परिवर्तन दिखाई देता है?
उत्तर

हाँ — परंतु दोनों में से केवल एक ही परखनली में।

परखनलीचूने के पानी में प्रवाहित वायुप्रेक्षित परिवर्तन
पिचकारी अथवा सिरिंज से प्रवाहित परिवेश की वायु — वही जिसे हम अंत:श्वसित करते हैंचूने का पानी स्वच्छ बना रहता है — कोई परिवर्तन नहीं
स्ट्रॉ से मुँह द्वारा फूँकी गई उच्छवसित वायुचूने का पानी दूधिया हो जाता है
संकेत: दोनों परखनलियों में ताजा बनाया गया चूने का पानी समान मात्रा में लीजिए। खुले में रखा पुराना चूने का पानी वायु की कार्बन डाइऑक्साइड से पहले ही अभिक्रिया कर चुका होता है और क्रियाकलाप से पहले ही धुँधला दिख सकता है।
प्र2.
परखनली 'ख' में चूने का पानी दूधिया हो गया परंतु परखनली 'क' में चूने का पानी दूधिया नहीं हुआ? यह क्या इंगित करता है?
उत्तर

यह इंगित करता है कि उच्छवसित वायु में अंत:श्वसित वायु की तुलना में अधिक कार्बन डाइऑक्साइड होती है।

चूने का पानी केवल कार्बन डाइऑक्साइड के साथ अभिक्रिया करके दूधिया होता है
परखनली 'ख' (उच्छवसित वायु) → दूधिया → अधिक कार्बन डाइऑक्साइड
परखनली 'क' (अंत:श्वसित वायु) → स्वच्छ → बहुत कम कार्बन डाइऑक्साइड
उच्छवसित वायु में कार्बन डाइऑक्साइड अधिक होती है
ऐसा क्यों होता है: कार्बन डाइऑक्साइड श्वसन का अपशिष्ट उत्पाद है। ग्लूकोस के विघटन के समय यह शरीर के सभी भागों में बनती है, रक्त इसे कूपिकाओं तक ले जाता है और वहाँ से यह उच्छवसित वायु में निर्मुक्त हो जाती है। अतः बाहर आने वाली वायु में उसकी मात्रा अंदर जाने वाली वायु से अधिक होनी ही चाहिए।
स्वयं जाँचिए: परखनली 'क' नियंत्रण (कंट्रोल) है। उसके बिना कोई कह सकता था कि चूने का पानी स्वयं ही दूधिया हो जाता है। ठीक उन्हीं परिस्थितियों में 'क' स्वच्छ बनी रहती है, इसलिए 'ख' का दूधिया होना केवल उच्छवसित वायु के कारण ही हो सकता है।
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