कुतूहल अध्याय 9 आइए, और अधिक सीखें

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
रिक्त बक्सों को उपयुक्त भागों से भर कर आहार नाल के द्वारा भोजन की यात्रा को पूरा कीजिए। भोजन → मुख → ______ → आमाशय → ______ → ______ → गुदा
उत्तर

तीनों रिक्त बक्से क्रमशः भोजन नली (ग्रासनली), क्षुद्रांत्र और बृहदांत्र हैं।

भोजन → मुख → भोजन नली (ग्रासनली) → आमाशय → क्षुद्रांत्रबृहदांत्र → गुदा
भोजन मुख भोजन नली (ग्रासनली) आमाशय क्षुद्रांत्र बृहदांत्र गुदा बहि:क्षेपण नारंगी बक्से वही तीन भाग हैं जिन्हें भरना था।
आहार नाल में भोजन की पूरी यात्रा।
बक्साभागवहाँ क्या होता है
पहला रिक्तभोजन नली (ग्रासनली)भित्तियों के लहरदार संकुचन और शिथिलन से भोजन आमाशय में धकेला जाता है
दूसरा रिक्तक्षुद्रांत्रपित्तरस, अग्न्याशयी रस और इसका अपना पाचक रस पाचन पूर्ण करते हैं; पोषक रक्त में अवशोषित होते हैं
तीसरा रिक्तबृहदांत्रजल और कुछ लवण अवशोषित होते हैं; मल बनता है और मलाशय में संचित होता है
संकेत: यकृत और अग्न्याशय किसी बक्से में नहीं आएँगे। भोजन उनसे होकर नहीं जाता — वे केवल अपने रस क्षुद्रांत्र में डालते हैं, इसीलिए उन्हें आहार नाल के संबद्ध भाग कहा जाता है।
प्र2.
साहिल ने परखनली 'क' में रोटी के कुछ टुकड़े डाले। नेहा ने परखनली 'ख' में रोटी के टुकड़ों को चबा कर डाला और संतुष्टि ने परखनली 'ग' में उबले हुए आलू मसल कर डाले। उन सभी ने क्रमश: परखनली 'क', 'ख' और 'ग' में आयोडीन विलयन की कुछ बूँदें डालीं। उनके क्या अवलोकन होंगे? कारण बताइए।
उत्तर

आयोडीन वहीं नीला-काला होता है जहाँ मंड उपस्थित हो; जहाँ मंड न हो वहाँ वह अपने ही भूरे-नारंगी रंग में बना रहता है।

परखनलीउसमें क्या हैअवलोकनकारण
क — साहिलरोटी के सादे टुकड़े (चबाए हुए नहीं)नीला-काला रंगरोटी में मंड प्रचुर मात्रा में है और उस पर लार की कोई क्रिया नहीं हुई, अतः सारा मंड ज्यों-का-त्यों है
ख — नेहाचबाई हुई रोटीरंग में कोई परिवर्तन नहीं, अथवा बहुत हल्का नीला-कालाचबाते समय लार के पाचक रस ने मंड को सरल शर्कराओं में विघटित कर दिया, अतः आयोडीन के लिए मंड बचा ही नहीं या बहुत कम बचा
ग — संतुष्टिउबले और मसले हुए आलूनीला-काला रंगआलू में भी मंड प्रचुर होता है; उसे केवल उबाला और मसला गया है, लार नहीं मिलाई गई, अतः उसका मंड अछूता है
ऐसा क्यों होता है: 'क' और 'ग' में एक ही महत्त्वपूर्ण बात समान है — ऐसा मंड जिस पर लार की कोई क्रिया नहीं हुई। इसीलिए एक गेहूँ का और दूसरा आलू का होने पर भी दोनों का परिणाम एक ही रहता है। केवल 'ख' भिन्न है और वहाँ केवल लार का अंतर है। यही एक तुलना सिद्ध करती है कि मंड का पाचन लार करती है
स्वयं जाँचिए: यदि नेहा की परखनली 'ख' अब भी गहरी हो जाए तो उसने पर्याप्त देर तक नहीं चबाया। पूरे एक मिनट चबाने पर अंतर स्पष्ट हो जाता है।
प्र3.
श्वास लेने में डायाफ्राम की क्या भूमिका है? (i) वायु को निस्यंदित करना (ii) ध्वनि उत्पन्न करना (iii) अंत:श्वसन और उच्छवसन में सहायता करना (iv) ऑक्सीजन अवशोषित करना
उत्तर

सही उत्तर है — (iii) अंत:श्वसन और उच्छवसन में सहायता करना

वायु अंदर खींची जाती है डायाफ्राम नीचे की ओर जाता है (क) अंत:श्वसन वायु बाहर धकेली जाती है डायाफ्राम ऊपर की ओर जाता है (ख) उच्छवसन
पुस्तक का चित्र 9.10 — डायाफ्राम वक्ष के भीतर का स्थान बदलता है और वायु उसी के अनुसार आती-जाती है।
अंत:श्वसनउच्छवसन
पसलियाँऊपर तथा बाहर की ओर गति करती हैंनीचे तथा अंदर की ओर गति करती हैं
डायाफ्रामनीचे की ओर गति करता हैऊपर की ओर गति करता है
वक्ष-गुहा का स्थानबढ़ जाता हैघट जाता है
वायुफेफड़ों में प्रवेश करती हैफेफड़ों से बाहर धकेली जाती है
शेष विकल्प क्यों गलत हैं: (i) वायु का निस्यंदन नासाद्वार के सूक्ष्म रोम और श्लेष्मा करते हैं, डायाफ्राम नहीं; (ii) ध्वनि श्वासनली में स्थित स्वर-यंत्र से उत्पन्न होती है; (iv) ऑक्सीजन का रक्त में अवशोषण कूपिकाओं में होता है। डायाफ्राम फेफड़ों के नीचे स्थित एक गुंबदाकार पेशी है — यहाँ उसका एकमात्र कार्य वक्ष-गुहा का आकार बदलना है।
प्र4.
निम्नलिखित का मिलान कीजिए — भाग का नाम: (i) नासाद्वार (ii) नासा पथ (iii) श्वासनली (iv) कूपिकाएँ (v) पसली पिंजर; प्रकार्य: (क) बाहर से हवा प्रवेश करती है। (ख) गैसों का विनिमय होता है। (ग) फेफड़ों को सुरक्षा प्रदान करते हैं। (घ) सूक्ष्म रोम और श्लेष्मा हमारे द्वारा ग्रहण की गई वायु में से धूल और गंदगी को रोकने में सहायक हैं। (ङ) इस भाग से होकर वायु हमारे फेफड़ों तक पहुँचती है।
उत्तर
भाग का नामप्रकार्यक्यों
(i) नासाद्वार(क) बाहर से हवा प्रवेश करती है।नासारंध्रों की यही जोड़ी है जहाँ से श्वसन तंत्र आरंभ होता है
(ii) नासा पथ(घ) सूक्ष्म रोम और श्लेष्मा वायु में से धूल और गंदगी रोकते हैं।आगे बढ़ने से पहले यहीं वायु स्वच्छ की जाती है
(iii) श्वासनली(ङ) इस भाग से होकर वायु हमारे फेफड़ों तक पहुँचती है।यह वायु को नीचे ले जाती है और दो शाखाओं में बँटकर दोनों फेफड़ों में जाती है
(iv) कूपिकाएँ(ख) गैसों का विनिमय होता है।पतली भित्तियों वाले गुब्बारे जैसे कोश, जिनके चारों ओर रक्त से भरी महीन नलिकाएँ होती हैं
(v) पसली पिंजर(ग) फेफड़ों को सुरक्षा प्रदान करते हैं।वक्ष के चारों ओर की अस्थियों की पिंजरनुमा रचना जो कोमल फेफड़ों की रक्षा करती है
नासाद्वार दायाँ फेफड़ा पसली पिंजर श्वासनली कूपिकाएँ बायाँ फेफड़ा डायाफ्राम वायु का पथ: नासाद्वार → नासा पथ → श्वासनली → कूपिकाएँ
मानव श्वसन तंत्र (पुस्तक का चित्र 9.8) — प्रश्न में दिए गए सभी भाग नामांकित हैं।
संकेत: वायु की यात्रा का क्रम याद रखिए — नासाद्वार, नासा पथ, श्वासनली, उसकी दो शाखाएँ, महीन शाखाएँ, कूपिकाएँ। पाँच में से चार मिलान इसी क्रम से बन जाते हैं; पसली पिंजर ही एकमात्र ऐसा भाग है जिसमें वायु जाती ही नहीं, अतः उसे बचा हुआ विकल्प "फेफड़ों को सुरक्षा" मिल जाता है।
प्र5.
अनिल ने अपनी सहपाठी सान्वी से कहा कि श्वसन और श्वास लेना एक ही प्रक्रिया है। अनिल को यह समझाने के लिए कि यह कथन सही नहीं है, सान्वी उससे क्या प्रश्न पूछ सकती है?
उत्तर

सान्वी ऐसे प्रश्न पूछे जिनके सच्चे उत्तर देते ही अनिल को स्वयं मानना पड़े कि ये दोनों शब्द दो भिन्न बातों के लिए हैं।

  1. "यदि श्वास लेना और श्वसन एक ही हैं तो हमारे शरीर में ऊर्जा कहाँ से आती है? क्या केवल वायु अंदर-बाहर करने से ऊर्जा निर्मुक्त हो जाती है?"
  2. "श्वसन का शब्द समीकरण लिखो। अब श्वास लेने का समीकरण लिखो। ग्लूकोस + ऑक्सीजन → कार्बन डाइऑक्साइड + जल + ऊर्जा — यह एक के लिए लिखा जा सकता है और दूसरे के लिए क्यों नहीं?"
  3. "श्वास लेना नाक, श्वासनली और फेफड़ों में होता है। श्वसन शरीर के किस भाग में होता है?"
  4. "केंचुए के फेफड़े नहीं होते और मछली नाक से श्वास नहीं लेती, फिर भी दोनों जीवित और सक्रिय हैं। यदि दोनों शब्द एक ही होते तो इसकी व्याख्या कैसे करोगे?"
  5. "क्या भौतिक परिवर्तन और रासायनिक परिवर्तन एक ही होते हैं? श्वास लेना शारीरिक प्रक्रिया है और श्वसन रासायनिक। दो भिन्न प्रकार की प्रक्रियाएँ एक कैसे हो सकती हैं?"
  6. "आधे मिनट के लिए साँस रोक लो — क्या उस समय तुम्हारे शरीर में श्वसन भी रुक जाता है?"
श्वास लेनाश्वसन
वायु को अंदर लेना और बाहर निकालनाऑक्सीजन से ग्लूकोस का विघटन कर ऊर्जा निर्मुक्त करना
शारीरिक (भौतिक) प्रक्रियारासायनिक प्रक्रिया
श्वसन तंत्र में होती हैशरीर के अंदर, सभी भागों में होती है
ऊर्जा निर्मुक्त नहीं होतीऊर्जा निर्मुक्त होती है
केवल ऑक्सीजन पहुँचाता और कार्बन डाइऑक्साइड हटाता हैउसी ऑक्सीजन का उपयोग करके उपयोगी कार्य करता है
ऐसा क्यों होता है: श्वास लेना पहुँचाना है और श्वसन उपयोग करना। दोनों की तुलना ऐसी है जैसे दूधवाले का घर तक दूध लाना और परिवार का उसे पीना — एक के बाद दूसरा आवश्यक, परंतु दोनों एक घटना नहीं।
प्र6.
निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सत्य है और क्यों? अनु—हम वायु को अंत:श्वसित करते हैं। शानू—हम ऑक्सीजन को अंत:श्वसित करते हैं। तनु—हम ऑक्सीजन से समृद्ध वायु को अंत:श्वसित करते हैं।
उत्तर

तनु का कथन सत्य है — "हम ऑक्सीजन से समृद्ध वायु को अंत:श्वसित करते हैं।"

अंत:श्वसित वायु नाइट्रोजन तथा अन्य गैसें 21% O₂ उच्छवसित वायु नाइट्रोजन तथा अन्य गैसें 16–17% O₂ 0.04% कार्बन डाइऑक्साइड (अंत:श्वसित) 4–5% कार्बन डाइऑक्साइड (उच्छवसित) वायु एक मिश्रण है — ऑक्सीजन उसका पाँचवाँ भाग ही है।
पुस्तक का चित्र 9.13 स्तंभों के रूप में — अंत:श्वसित वायु ऑक्सीजन से समृद्ध है, परंतु वह ऑक्सीजन नहीं है।
कथननिर्णयकारण
अनु — हम वायु को अंत:श्वसित करते हैं।सत्य, परंतु अधूराहम वायु ही अंदर लेते हैं, किंतु यह कथन उस ऑक्सीजन की बात नहीं करता जिसके कारण वायु हमारे लिए उपयोगी है
शानू — हम ऑक्सीजन को अंत:श्वसित करते हैं।असत्यहम कभी शुद्ध ऑक्सीजन अंदर नहीं लेते। वायु एक मिश्रण है जिसका लगभग 21% ही ऑक्सीजन है, और उसका भी पूरा उपयोग नहीं होता — उच्छवसित वायु में अब भी 16–17% ऑक्सीजन रहती है
तनु — हम ऑक्सीजन से समृद्ध वायु को अंत:श्वसित करते हैं।सहीयह दोनों आवश्यक बातें कहता है — हम जो लेते हैं वह वायु है, और वह वायु उच्छवसित वायु की तुलना में ऑक्सीजन से समृद्ध है
ऐसा क्यों होता है: फेफड़े अपने चारों ओर जो भी मिश्रण होता है उसी को अंदर ले लेते हैं। कूपिकाओं में उस मिश्रण से ऑक्सीजन ले ली जाती है और उसमें कार्बन डाइऑक्साइड जोड़ दी जाती है, अतः बाहर आने वाली वायु में ऑक्सीजन कम और कार्बन डाइऑक्साइड कहीं अधिक होती है — फिर भी वह वायु ही है, कोई एक गैस नहीं।
प्र7.
जब हम श्वास के साथ धूल भरी वायु को अंदर लेते हैं तो प्राय: हम छींकते हैं। इसके संभावित कारण क्या हो सकते हैं?
उत्तर

छींकना शरीर का धूल को पुनः बाहर फेंकने का तरीका है। संभावित कारण —

  1. छन्ने पर बोझ बढ़ जाना। नासाद्वार के सूक्ष्म रोम और श्लेष्मा सीमित मात्रा में ही धूल रोक सकते हैं। वायु बहुत धूल भरी हो तो उनसे अधिक कण आगे निकल जाते हैं।
  2. आस्तर में उत्तेजना। नासा पथ के कोमल आस्तर पर बैठे धूल-कण उसे उत्तेजित करते हैं और यही उत्तेजना छींक को जन्म देती है।
  3. छींक एक सुरक्षात्मक प्रतिवर्ती क्रिया है। हम इसे सोचकर नहीं करते। वायु का एक अचानक और तीव्र झोंका नाक तथा मुख से बाहर निकलता है और धूल के कणों को अपने साथ बाहर ले जाता है।
  4. यह फेफड़ों की रक्षा करती है। यदि धूल और नीचे चली जाए तो वह श्वासनली और कोमल कूपिकाओं तक पहुँच जाएगी जहाँ से उसे हटाना सरल नहीं। छींक धूल को प्रवेश-द्वार के पास ही रोक देती है।
  5. अधिक श्लेष्मा का स्राव भी होने लगता है जिससे और अधिक धूल फँसकर बाहर आ जाती है — इसीलिए धूल भरे स्थान पर नाक बहने लगती है।
ऐसा क्यों होता है: संपूर्ण श्वसन तंत्र की रचना एक ही वस्तु की रक्षा के लिए हुई है — कूपिकाओं की पतली और नम भित्तियाँ। नाक के रोम, श्लेष्मा, खाँसी और छींक — ये सब उसी सुरक्षा की क्रमशः परतें हैं।
संकेत: छींकते समय नाक और मुँह को रूमाल अथवा मुड़ी हुई कोहनी से अवश्य ढकिए। छींक के साथ निकलने वाली सूक्ष्म बूँदें पास खड़े व्यक्तियों तक संक्रमण पहुँचा सकती हैं। धूल भरे स्थान पर चेहरे को कपड़े या मास्क से ढकिए।
प्र8.
कक्षा 7 की छात्राएँ परिधि और अनुषा ने अपने प्रातःकालीन व्यायाम के लिए दौड़ना आरंभ किया। अपनी दौड़ पूरी करने के बाद उन्होंने प्रति मिनट ली जाने वाली श्वासों की गिनती की। अनुषा परिधि की अपेक्षा अधिक तेजी से श्वास ले रही थी। परिधि की अपेक्षा अनुषा द्वारा अधिक तेजी से श्वास लेने के कम से कम दो संभावित कारण बताइए।
उत्तर

निम्नलिखित में से कोई भी दो कारण उपयुक्त उत्तर हैं।

  1. अनुषा अधिक तेज दौड़ी हो या अधिक दूरी तय की हो। अधिक परिश्रम का अर्थ है पेशियों को अधिक ऊर्जा चाहिए, अतः अधिक ग्लूकोस विघटित करना पड़ा, अतः अधिक ऑक्सीजन चाहिए और अधिक कार्बन डाइऑक्साइड बाहर निकालनी पड़ी — और इसका एकमात्र उपाय है तेज श्वास लेना।
  2. अनुषा को दौड़ने का अभ्यास परिधि जितना न हो। नियमित व्यायाम करने वाले की श्वसन पेशियाँ अधिक सशक्त होती हैं और वह प्रत्येक श्वास में अधिक वायु लेता है, अतः उसे उसी काम के लिए कम श्वासों की आवश्यकता होती है।
  3. दोनों के शरीर भिन्न हैं। वक्ष का आकार, फेफड़ों की धारिता और शरीर का भार व्यक्ति-व्यक्ति में भिन्न होते हैं। फेफड़ों की धारिता कम होने पर प्रति श्वास कम वायु मिलती है, अतः प्रति मिनट श्वासों की संख्या बढ़ जाती है।
  4. अनुषा ने रुकने के तुरंत बाद गिनती की हो। दौड़ने के बाद श्वास-दर धीरे-धीरे घटती है, अतः तुरंत गिनने पर संख्या अधिक आती है और तीन मिनट बाद गिनने पर कम।
  5. अनुषा ने बस्ता उठा रखा हो, चढ़ाई पर या रेत पर दौड़ी हो, जिससे उतनी ही दूरी उसके लिए अधिक परिश्रम की रही हो।
  6. अनुषा का स्वास्थ्य ठीक न रहा हो — जुकाम या बंद नाक से प्रत्येक श्वास उथली रह जाती है, अतः अधिक श्वासें लेनी पड़ती हैं।
पेशियों का अधिक कार्य → अधिक ग्लूकोस विघटित करना
→ अधिक ऑक्सीजन की आवश्यकता और अधिक कार्बन डाइऑक्साइड निकालना
श्वास-दर बढ़ जाना
स्वयं जाँचिए: शांत बैठकर एक मिनट की श्वासें गिनिए, फिर दो मिनट रस्सी कूदकर दुबारा गिनिए। दोनों संख्याएँ लिखिए और सप्ताह भर यही दोहराइए — जैसे-जैसे आपका अभ्यास बढ़ेगा, विश्राम की श्वास-दर धीरे-धीरे घटती दिखाई देगी।
प्र9.
यदु ने अपने एक विचार के परीक्षण के लिए एक प्रयोग किया। उसने दो परखनलियाँ 'क' और 'ख' लीं। परखनलियों को पानी से आधा भरकर और उनमें एक चुटकी चावल का आटा मिला कर उन्हें अच्छी तरह हिलाया। परखनली 'ख' में उसने कुछ बूँदें लार की मिलाईं। दोनों परखनलियों को उसने 35–40 मिनट के लिए यथावत रहने दिया। उसके बाद उसने दोनों परखनलियों में आयोडीन विलयन डाला। प्रयोग के परिणाम चित्र 9.15 में दर्शाए गए हैं। आपके विचार से वह क्या परीक्षण करना चाहता है?
उत्तर

यदु यह परीक्षण करना चाहता है कि क्या लार मंड का विघटन करती है — अर्थात् क्या लार में उपस्थित पाचक रस चावल के आटे के मंड को ऐसे रूप में बदल देता है जो अब मंड नहीं रहता।

चित्र 9.15 में दोनों परखनलियाँ बिलकुल भिन्न दिखाई देती हैं —

परखनलीउसमें क्या हैआयोडीन डालने के बाद रंग (चित्र 9.15)इसका अर्थ
चावल का आटा + जलगहरा नीला-कालामंड अब भी उपस्थित है — उस पर कुछ भी क्रिया नहीं हुई
चावल का आटा + जल + लार की कुछ बूँदेंआयोडीन का अपना भूरा-नारंगी रंग ही बना रहता हैमंड विघटित हो चुका है; आयोडीन के लिए क्रिया करने को कुछ बचा ही नहीं

'क' और 'ख' में केवल एक बात भिन्न है — लार। अतः रंग का अंतर लार की ही क्रिया का परिणाम हो सकता है।

यह अभिकल्पना अच्छी क्यों है: परखनली 'क' नियंत्रण (कंट्रोल) है। उसके बिना यदु कुछ भी सिद्ध नहीं कर सकता था, क्योंकि कोई कह सकता था कि चावल के आटे में मंड था ही नहीं। साथ ही उसने शेष सब कुछ समान रखा — उतना ही आटा, उतना ही जल, वैसा ही हिलाना, वही 35–40 मिनट और वही आयोडीन — जिससे लार ही एकमात्र चर (वेरिएबल) रह जाए।
क्या आप जानते हैं? यह प्रयोग एक बात और दिखाता है — लार मुख के बाहर, परखनली में भी काम करती रहती है। पाचन उस रस की रासायनिक क्रिया है, कोई ऐसा जादू नहीं जिसके लिए शरीर आवश्यक हो।
प्र10.
रक्षिता ने दो स्वच्छ परखनलियाँ 'क' और 'ख' लेकर एक परीक्षण अभिकल्पित किया। उसने दोनों परखनलियों को चित्र में दर्शाए अनुसार चूने के पानी से भर दिया। परखनली 'क' में अंत:श्वसित वायु को नली द्वारा चूषित करके प्रवाहित किया गया। परखनली 'ख' में नली के द्वारा उच्छवसित वायु को फूँक कर प्रवाहित किया गया। (चित्र 9.16) आपके विचार से वह क्या जाँचना चाहती है? वह कैसे अपने निष्कर्षों की पुष्टि कर सकती है?
उत्तर

रक्षिता यह जाँचना चाहती है कि क्या उच्छवसित वायु में अंत:श्वसित वायु की तुलना में अधिक कार्बन डाइऑक्साइड होती है

चूने का पानी केवल कार्बन डाइऑक्साइड से दूधिया होता है
परखनली 'क' (अंत:श्वसित वायु) → स्वच्छ बनी रहती है
परखनली 'ख' (उच्छवसित वायु) → दूधिया हो जाती है
∴ उच्छवसित वायु में अधिक कार्बन डाइऑक्साइड है

वह अपने निष्कर्षों की पुष्टि इस प्रकार कर सकती है —

  • दोनों परखनलियों की साथ-साथ तुलना कीजिए। 'क' नियंत्रण है। दोनों में ताजा बना चूने का पानी समान मात्रा में हो और वायु समान समय तक प्रवाहित की जाए। यदि केवल 'ख' दूधिया हो तो अंतर का कारण उच्छवसित वायु ही है।
  • प्रयोग को दो-तीन बार दोहराइए और दो-तीन सहपाठियों से नई परखनलियों में फूँकवाइए। जो परिणाम हर बार आए, वही विश्वसनीय है।
  • अधिक देर तक फूँकिए। जितनी अधिक उच्छवसित वायु प्रवाहित होगी, 'ख' का दूधियापन उतना ही बढ़ता जाएगा — इससे सिद्ध होता है कि प्रभाव कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा के साथ बढ़ता है।
  • उल्टी दिशा से जाँचिए। किसी ज्ञात स्रोत से कार्बन डाइऑक्साइड ताजा चूने के पानी में प्रवाहित कीजिए; वह भी दूधिया हो जाता है। इससे पुष्टि होती है कि दूधिया होना वास्तव में कार्बन डाइऑक्साइड की ही जाँच है।
  • हर बार ताजा चूने का पानी प्रयोग कीजिए। खुले में रखा चूने का पानी वायु की कार्बन डाइऑक्साइड से पहले ही अभिक्रिया कर चुका होता है और परीक्षण से पहले ही धुँधला हो सकता है।
ऐसा क्यों होता है: कार्बन डाइऑक्साइड श्वसन का अपशिष्ट उत्पाद है। ग्लूकोस के विघटन के समय यह शरीर भर में बनती है, रक्त इसे कूपिकाओं तक ले जाता है और वहाँ से यह उच्छवसित वायु में निर्मुक्त हो जाती है। अतः बाहर आने वाली वायु में उसकी मात्रा कहीं अधिक — लगभग 4–5% — होती है जबकि अंदर जाने वाली वायु में लगभग 0.04%
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ