कुतूहल अध्याय 9 अन्वेषणात्मक परियोजनाएँ

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
मुख की स्वच्छता को बनाए रखने की उत्तम विधियाँ क्या हैं? इस संबंध में पुस्तकों या समाचार पत्रों से अथवा अपने से बड़े व्यक्तियों से वार्तालाप करके जानकारी एकत्रित कीजिए। इस पर एक रिपोर्ट तैयार कीजिए।
उत्तर

परियोजना कैसे करें: तीन प्रकार के स्रोतों से जानकारी एकत्रित कीजिए — कोई विज्ञान या स्वास्थ्य की पुस्तक, कोई समाचार पत्र/पत्रिका का लेख, और घर के बुजुर्गों से बातचीत। हर बिंदु के साथ उसका स्रोत लिखिए। फिर रिपोर्ट को शीर्षकों में बाँटिए — मुख की स्वच्छता क्यों आवश्यक है → प्रतिदिन क्या करें → किससे बचें → हमारे बुजुर्ग क्या करते थे → निष्कर्ष। दो पृष्ठ और दाँत साफ करने की विधि का एक छोटा नामांकित चित्र पर्याप्त है।

अच्छी रिपोर्ट में होना चाहिए: कम से कम छह विशिष्ट विधियाँ, हर एक का एक कारण, कम से कम एक बात किसी बुजुर्ग से ली हुई, तथा हर तथ्य का स्रोत स्पष्ट रूप से लिखा हुआ।

नमूना उत्तर:

उत्तम विधियह क्यों लाभप्रद है
दिन में दो बार दाँत साफ करना — प्रातः तथा सोने से पहलेभोजन की उस चिपचिपी परत को हटा देता है जिसमें कीटाणु पनपकर दंतक्षय करते हैं
दिन में दो बार जीभ साफ करनाजीभ पर जमी परत ही मुख की दुर्गंध का मुख्य कारण है
हर भोजन के बाद जल से कुल्ला करनादाँतों के बीच फँसे भोजन-कण सड़ने से पहले ही धुल जाते हैं
टॉफी, चॉकलेट और मीठे पेय कम करना, विशेषकर रात मेंदाँतों पर बची शर्करा ही दंतक्षय करने वाले कीटाणुओं का भोजन है
कुरकुरे फल-सब्जियाँ खाना — अमरूद, गाजर, खीरा, सेबइन्हें चबाने से दाँत स्वयं साफ होते हैं और लार का स्राव बढ़ता है
दाँतों से बोतल का ढक्कन या कड़ी सुपारी न तोड़नादाँतों में दरार पड़ने और टूटने से बचाव
हर तीन महीने में टूथब्रश बदलनामुड़े और घिसे हुए ब्रश कोनों की सफाई नहीं कर पाते
वर्ष में एक बार दाँतों की जाँच करवानाछोटा गड्ढा सरलता से भरा जा सकता है; उपेक्षा करने पर वही कष्टदायक और महँगा हो जाता है

मेरी दादी से: "विवाह होने तक मैं प्रतिदिन प्रातः नीम की दातुन करती थी, ताँबे की जिभ्भी से जीभ साफ करती थी और हर भोजन के बाद कुल्ला करती थी। मीठा हम बहुत कम खाते थे और हमारे घर में किसी का दाँत खराब नहीं हुआ।"

संकेत: रिपोर्ट के अंत में अपनी ओर से एक पंक्ति अवश्य लिखिए — इस परियोजना के बाद आपने अपनी दिनचर्या में क्या बदलने का निश्चय किया।
प्र2.
पाचन तंत्र को स्वस्थ बनाए रखने के विभिन्न उपाय खोजिए। पाचन तंत्र को उत्तम बनाए रखने में सहायता करने वाली कुछ खाने की वस्तुओं का सुझाव दीजिए। एक रिपोर्ट बनाइए और कक्षा में इसे प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर

परियोजना कैसे करें: बिंदु स्वयं इसी अध्याय से लीजिए (रेशे, किण्वित भोजन, चरक संहिता वाला बॉक्स), साथ ही किसी चिकित्सक या बुजुर्ग से तथा किसी स्वास्थ्य-लेख से। फिर दो सूचियाँ बनाइए — आदतें और खाद्य पदार्थ — और उन्हें एक चार्ट पेपर के साथ पाँच मिनट की कक्षा-प्रस्तुति में बदल दीजिए।

अच्छी रिपोर्ट में होना चाहिए: केवल भोजन नहीं, आदतें भी; प्रत्येक का एक कारण; कम से कम दो स्थानीय भारतीय उदाहरण; और एक बात जिससे बचना चाहिए।

नमूना उत्तर — आदतें:

  • उपयुक्त समय पर भोजन कीजिए और भोजन छोड़िए मत — आधुनिक पोषण-विज्ञान और चरक संहिता दोनों इस पर बल देते हैं।
  • भोजन को अच्छी तरह चबाइए और धीरे-धीरे खाइए। पाचन मुख में आरंभ होता है; जल्दबाजी में निगले गए भोजन पर लार को क्रिया करने का समय ही नहीं मिलता।
  • भूख से अधिक भोजन न कीजिए। अधिक भरा आमाशय भोजन का ठीक से मंथन नहीं कर पाता।
  • पर्याप्त जल पीजिए। मल को मृदु रखने के लिए बृहदांत्र को जल चाहिए।
  • भोजन से पहले हाथ धोइए और ताजा बना भोजन खाइए, जिससे कीटाणु शरीर में न जाएँ।
  • शारीरिक रूप से सक्रिय रहिए — पैदल चलना, साइकिल चलाना और खेलना आँतों को गतिशील रखते हैं।
  • भारी भोजन के तुरंत बाद लेटिए मत; इसके स्थान पर थोड़ा टहलिए।

नमूना उत्तर — खाद्य पदार्थ:

खाद्य पदार्थयह कैसे सहायक है
फल और सब्जियाँ — पपीता, अमरूद, केला, पालक, गाजररेशे और जल से समृद्ध; मल-त्याग सरल बनाते हैं
साबुत अनाज और कदन्न — ज्वार, बाजरा, रागी, चोकर युक्त गेहूँ, भूरा चावलरेशे से भरपूर; कदन्न प्राकृतिक रूप से ग्लूटेन रहित भी होते हैं
किण्वित भोजन — दही, छाछ, श्रीखंड, कांजी, अचार, गुंद्रुक, पोइता भातबृहदांत्र के लाभदायक जीवाणुओं की सहायता करते हैं जो रेशों को विघटित कर आवश्यक पोषक बनाते हैं
दालें और फलियाँरेशों के साथ-साथ प्रोटीन भी देती हैं
उचित मात्रा में मसाले — अदरक, काली मिर्च, जीराचरक संहिता में पाचन बढ़ाने के लिए इनके विवेकपूर्ण उपयोग का उल्लेख है
पर्याप्त सादा जलकठोर मल और कब्ज से बचाव करता है
संकेत: किससे बचें — अधिक तला भोजन, पैकेटबंद नाश्ता और ठंडे पेय। इनमें रेशे नाममात्र के होते हैं और ये पाचन को धीमा कर देते हैं।
प्र3.
रंगीन चिकनी मिट्टी का प्रयोग करके पाचन तंत्र का त्रिआयामी (3D) प्रतिरूप बनाइए और काले कागज की पर्चियों का प्रयोग करके पाचन तंत्र के सभी भागों को नामांकित कीजिए।
उत्तर

प्रतिरूप कैसे बनाएँ: आधार के लिए एक मोटा गत्ता लीजिए और उस पर हल्की रेखा से मानव आकृति बनाइए। प्रत्येक अंग के लिए रंगीन चिकनी मिट्टी को उपयुक्त आकार में गढ़कर उसके स्थान पर दबाइए। फिर काले कागज की पर्चियों पर सफेद स्याही से नाम लिखकर उन्हें धागे की रेखा के साथ प्रत्येक अंग के पास लगाइए।

अच्छे प्रतिरूप में होना चाहिए — आहार नाल के सभी भाग सही क्रम में, दोनों संबद्ध भाग (यकृत और अग्न्याशय) क्षुद्रांत्र में अपना रस डालते हुए, तथा सही सापेक्ष माप — क्षुद्रांत्र स्पष्ट रूप से सबसे लंबी और बृहदांत्र स्पष्ट रूप से सबसे चौड़ी।

बनाने योग्य भागमिट्टी का आकार और रंगकाली पर्ची पर नामांकन
मुखछोटा खुला अंडाकार, गुलाबीमुख — दाँत चबाते हैं; लार मंड का पाचन आरंभ करती है
ग्रासनलीलंबी पतली रस्सी, हल्का गुलाबी, सीधी नीचेभोजन नली (ग्रासनली) — भोजन को आमाशय तक धकेलती है
आमाशयJ आकार की थैली, गहरा गुलाबी या लालआमाशय — भोजन का मंथन; पाचक रस, अम्ल और श्लेष्मा
यकृतबड़ा चपटा फन्ना, गहरा भूरा, ऊपर दाईं ओरयकृत — पित्तरस का स्राव
अग्न्याशयपतला पत्ती जैसा आकार, क्रीम रंग, आमाशय के नीचेअग्न्याशय — अग्न्याशयी रस का स्राव
क्षुद्रांत्रबहुत लंबी पतली रस्सी, नारंगी, बीच में कसकर कुंडलितक्षुद्रांत्र — लगभग 6 मीटर; पाचन पूर्ण और पोषकों का अवशोषण
बृहदांत्रमोटी और छोटी नली, बैंगनी, कुंडली के चारों ओर मेहराब जैसीबृहदांत्र — लगभग 1.5 मीटर; जल और लवणों का अवशोषण
मलाशयनिचले सिरे पर छोटा सीधा टुकड़ामलाशय — मल का संचय
गुदासबसे नीचे एक छोटा छिद्रगुदा — बहि:क्षेपण
संकेत: क्षुद्रांत्र को कई छोटे टुकड़ों में नहीं, एक ही लंबी रस्सी के रूप में बेलिए। प्रतिरूप का पूरा उद्देश्य ही यह दिखाना है कि वह एक नली कितनी आश्चर्यजनक रूप से लंबी है।
प्र4.
वायु गुणवत्ता और ए.क्यू.आई. क्या हैं? विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करने वाले व्यक्तियों के, किसानों के, कारखानों में काम करने वाले श्रमिकों के तथा ठेले वालों के श्वसन तंत्र पर वायु गुणवत्ता के प्रभाव का पता लगाइए।
उत्तर

वायु गुणवत्ता बताती है कि वायु कितनी स्वच्छ अथवा प्रदूषित है। ए.क्यू.आई. का अर्थ है वायु गुणवत्ता सूचकांक (Air Quality Index) — केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा भारतीय शहरों के लिए प्रतिदिन प्रकाशित एक ऐसी संख्या जो मुख्य प्रदूषकों (महीन धूल PM2.5 तथा PM10, सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और ओज़ोन) की मात्रा को एक सरल अंक और रंग में बदल देती है।

ए.क्यू.आई. मानश्रेणीश्वास लेने पर प्रभाव
0–50अच्छीवायु से लगभग कोई जोखिम नहीं
51–100संतोषजनककुछ संवेदनशील व्यक्तियों को हल्की श्वास-असुविधा
101–200मध्यमदमा तथा फेफड़े-हृदय रोगियों को असुविधा
201–300खराबलंबे समय रहने पर अधिकांश लोगों को श्वास-असुविधा
301–400बहुत खराबदीर्घ अवधि तक रहने पर श्वसन रोग
401–500गंभीरस्वस्थ व्यक्तियों पर भी प्रभाव; पहले से रोगग्रस्त लोगों पर गंभीर असर

परियोजना कैसे करें: एक सप्ताह तक प्रतिदिन समाचार पत्र या 'समीर' ऐप से अपने नगर का ए.क्यू.आई. लिखिए और उसका स्तंभ-आलेख बनाइए। फिर दो-तीन कामकाजी व्यक्तियों से बात कीजिए और उनके अपने शब्दों में लिखिए कि वे अपनी श्वास के विषय में क्या अनुभव करते हैं।

नमूना निष्कर्ष:

  • किसान — जुताई और मड़ाई के समय की धूल, पराली जलाने का धुआँ तथा कीटनाशकों का छिड़काव। अनेक किसान कटाई और पराली जलाने के सप्ताहों में खाँसी, छींक, आँखों से पानी और साँस फूलने की शिकायत करते हैं।
  • कारखानों के श्रमिक — पत्थर कटाई, सीमेंट, सूती मिल या घिसाई की महीन धूल तथा रासायनिक धुआँ। लंबे समय के संपर्क से फेफड़े क्षतिग्रस्त होते हैं और स्थायी फेफड़ा-रोग तक हो सकता है; इसीलिए अच्छे कारखाने मास्क और निकास-पंखे उपलब्ध कराते हैं।
  • ठेले वाले और यातायात पुलिस — पूरे दिन वाहनों के पास रहकर धुआँ और सड़क की धूल साँस में लेते हैं। ये प्रायः गले में जलन, बार-बार जुकाम और शीत ऋतु में सिरदर्द की शिकायत करते हैं, क्योंकि तब धुआँ भूमि के पास ही ठहर जाता है।
संकेत: अंत में व्यावहारिक सुझाव दीजिए — उपयुक्त मास्क (पतला कपड़ा नहीं), सड़कों के किनारे वृक्षारोपण, पत्ते या पराली न जलाना, धूल भरी सड़कों पर छिड़काव, तथा बीच-बीच में स्वच्छ वायु में विश्राम। अध्याय की यह बात स्मरण रखिए कि नाक धूल का केवल एक भाग ही रोक पाती है, शेष फेफड़ों तक पहुँच जाता है।
प्र5.
समावृत्ति प्राणायाम (बॉक्स ब्रीदिंग) तकनीक के विषय में पढ़ने का प्रयास कीजिए (चित्र 9.17)। इसके क्या लाभ हैं?
उत्तर

समावृत्ति प्राणायाम (बॉक्स ब्रीदिंग) एक सरल और धीमी श्वास-क्रिया है जिसके चार समान चरण होते हैं — इसीलिए पुस्तक ने इसे एक वर्ग (बॉक्स) के रूप में दर्शाया है (चित्र 9.17)। वर्ग की प्रत्येक भुजा के लिए चार की गिनती कीजिए —

श्वास अंदर लेना 4 गिनती श्वास रोकना — 4 गिनती श्वास बाहर छोड़ना 4 गिनती श्वास रोकना — 4 गिनती इस वर्ग को 4 से 6 बार दोहराइए।
समावृत्ति प्राणायाम — चार समान चरण, प्रत्येक चार गिनती का, धीरे-धीरे नाक से।

इसके लाभ:

  • मन शीघ्र शांत होता है — परीक्षा, मंच-प्रदर्शन या खेल से पहले की घबराहट और तेज धड़कन को यह शांत कर देता है।
  • एकाग्रता बढ़ती है, क्योंकि गिनती मन को एक ही सरल बात पर टिका देती है।
  • श्वास उथली और तेज के स्थान पर गहरी और नियमित हो जाती है, जिससे अधिक वायु फेफड़ों के निचले भागों तक पहुँचती है।
  • नियमित अभ्यास से डायाफ्राम और श्वसन पेशियाँ सशक्त होती हैं।
  • नींद में सहायक — सोने से पहले कुछ मिनट करने पर नींद अच्छी आती है।
  • किसी सामग्री की आवश्यकता नहीं — न कोई उपकरण, न विशेष स्थान; इसे कक्षा में बैठे-बैठे भी किया जा सकता है।
संकेत: नाक से श्वास लीजिए, कमर सीधी रखिए और कभी जोर न लगाइए। यदि चार गिनती लंबी लगे तो तीन से आरंभ कीजिए। यह उसी परंपरा का अंग है जिसे भारत में शताब्दियों से प्राणायाम के रूप में श्वसन-स्वास्थ्य, विश्रांति और एकाग्रता के लिए अपनाया जाता रहा है।
प्र6.
पक्षियों और स्तनधारियों दोनों में श्वास लेने हेतु फेफड़े होते हैं किंतु पक्षी ऊँचाई पर उड़ सकते हैं जहाँ ऑक्सीजन का स्तर कम होता है। उनको इन स्थितियों में जीवित रखने के लिए उनका श्वसन तंत्र किस प्रकार अनुकूलित होता है?
उत्तर

उड़ना अत्यंत परिश्रम का कार्य है और अधिक ऊँचाई की वायु विरल होती है — वहाँ एक श्वास में कहीं कम ऑक्सीजन आती है। पक्षी का श्वसन तंत्र कम वायु से अधिक ऑक्सीजन निकालने के लिए अनुकूलित है।

  • वायु कोश। फेफड़ों के अतिरिक्त पक्षी के शरीर में पतली भित्ति वाले वायु कोश फैले होते हैं। ये धौंकनी की भाँति वायु का संग्रह और संचालन करते हैं, जिससे दो श्वासों के बीच फेफड़े कभी खाली नहीं रहते।
  • फेफड़ों में वायु एक ही दिशा में बहती है। स्तनधारी में वायु उन्हीं बंद कोशों में जाती और लौटती है, अतः प्रत्येक ताजी श्वास बासी वायु से मिल जाती है। पक्षी में वायु निरंतर आगे बढ़ती रहती है, इसलिए फेफड़े को श्वास लेते समय भी और छोड़ते समय भी ताजी वायु मिलती रहती है।
  • उच्छवसन के समय भी ऑक्सीजन ग्रहण होती रहती है। इसी एकदिश प्रवाह के कारण पक्षी श्वास-चक्र का आधा भाग व्यर्थ नहीं जाने देता।
  • अत्यंत महीन और सघन वायु नलिकाएँ फेफड़ों में रक्त के संपर्क का बड़ा क्षेत्रफल देती हैं, जिससे ऑक्सीजन शीघ्र रक्त में पहुँच जाती है।
  • ऑक्सीजन को दृढ़ता से पकड़ने वाला रक्त तथा तीव्र और शक्तिशाली हृदय ऑक्सीजन को शीघ्र उड़ान-पेशियों तक पहुँचाते हैं।
  • उड़ान के समय बहुत तेज श्वास-दर से बड़ी मात्रा में वायु तंत्र से होकर गुजरती है।

परिणाम: अध्याय में लिखा है कि "कुछ जंतु श्वसन के दौरान ऑक्सीजन के अधिक भाग का उपयोग कर सकते हैं"। पक्षी ऐसे ही जंतु हैं — वे प्रत्येक श्वास से हमारी अपेक्षा ऑक्सीजन का बड़ा भाग ग्रहण कर लेते हैं। इसी कारण पट्ट-शीर्ष हंस (बार-हेडेड गूज़) हिमालय के ऊपर उन ऊँचाइयों पर उड़ जाते हैं जहाँ मनुष्य को ऑक्सीजन सिलिंडर की आवश्यकता पड़ती है।

ऐसा क्यों होता है: उड़ान की पेशियाँ चलने वाली पेशियों से कहीं अधिक परिश्रम करती हैं, अतः उन्हें बहुत अधिक ऊर्जा चाहिए और ऊर्जा ऑक्सीजन से ग्लूकोस के विघटन पर ही मिलती है। जिस जंतु को कम ऑक्सीजन वाले स्थान पर अधिक ऑक्सीजन चाहिए, वह केवल अपनी आपूर्ति-प्रणाली सुधारकर ही जीवित रह सकता है — पक्षी का श्वसन तंत्र ठीक यही करता है।
अन्वेषण कैसे करें: पट्ट-शीर्ष हंस और रुपेल गिद्ध के विषय में पढ़िए और एक सरल तुलना-चार्ट बनाइए — स्तनधारी फेफड़ा: वायु उन्हीं कोशों में आती-जाती है; पक्षी का फेफड़ा: वायु एक ही दिशा में बहती है, दोनों ओर वायु कोश
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