गणित प्रकाश अध्याय 3 पाठ्य प्रश्न

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
निम्नलिखित गुणनफल ज्ञात कीजिए। (i) ∩ × मेंढक-शिशु (ii) कुंडली × कमल (iii) कमल × कमल (iv) अँगुली × बैठा मनुष्य
उत्तर

हर बार 10 की घातें जोड़ दीजिए।

गुणनफल10 की घातों मेंउत्तर
(i)∩ × मेंढक-शिशु101 × 105 = 101+5106 — बैठा मनुष्य
(ii)कुंडली × कमल102 × 103 = 102+3105 — मेंढक-शिशु
(iii)कमल × कमल103 × 103 = 103+3106 — बैठा मनुष्य
(iv)अँगुली × बैठा मनुष्य104 × 106 = 104+61010

अत: किन्हीं दो सांकेतिक संख्याओं का गुणनफल एक अन्य सांकेतिक संख्या ही होता है।

ऐसा क्यों होता है: भाग (iv) पर रुककर सोचिए। 1010 सांकेतिक संख्या तो है, परंतु मिस्र के प्रतीकों की सूची 107 (सूर्य) पर समाप्त हो जाती है। अत: यह उत्तर संख्या के रूप में विद्यमान है परंतु मिस्र संख्यांकों में लिखा नहीं जा सकता। यही वह कमी है जो पृष्ठ 69 पर बताई गई है — जिस पद्धति में प्रत्येक सांकेतिक संख्या का अपना प्रतीक हो, उसे प्रतीकों की अंतहीन आपूर्ति चाहिए।
संकेत: 1010 अर्थात एक हजार करोड़, या 1 के आगे दस शून्य। हमारी पद्धति में यह तनिक भी कठिन नहीं — वही दस अंक इसे भी संभाल लेते हैं।
प्र2.
क्या यह गुणधर्म हमारे द्वारा बनाई गई आधार-5 पद्धति में भी लागू होता है? क्या यह किसी भी आधार वाली संख्या पद्धति पर लागू होता है?
उत्तर

आधार-5 पद्धति में हाँ, और प्रत्येक आधार-n पद्धति में भी हाँ

आधार 5 में:   ⬡ × □ = 25 × 5 = 125 = ○   (52 × 51 = 53)
               ○ × □ = 125 × 5 = 625 = ∿   (53 × 51 = 54)
               ⬡ × ⬡ = 25 × 25 = 625 = ∿   (52 × 52 = 54)
सामान्यत:   na × nb = na+b
ऐसा क्यों होता है: na में n गुणनखंड के रूप में a बार आता है और nb में b बार। दोनों को गुणा कीजिए तो n कुल a + b बार आ जाता है — अर्थात na+b, जो पुन: n की घात है और इसलिए पुन: एक सांकेतिक संख्या। इस तर्क में 10 या 5 का कहीं प्रयोग नहीं हुआ; यह केवल गुणनखंड गिनने की बात है, अत: यह प्रत्येक आधार पर लागू होता है।
स्वयं जाँचिए: अब रोमन पद्धति के V × L = CCL से तुलना कीजिए। रोमन सांकेतिक संख्याएँ 1, 5, 10, 50, 100, 500, 1000 हैं — अनुपात 5, 2, 5, 2, 5, 2 हैं, अत: वे किसी एक संख्या की घातें नहीं हैं और यह गुणधर्म विफल हो जाता है। यही एक विफलता रोमन गुणन की सारी कठिनाई का कारण है।
प्र3.
मिस्र की पद्धति में किसी संख्या और ∩ (10) के गुणनफल के विषय में हम क्या निष्कर्ष निकाल सकते हैं?
उत्तर

संख्यांक का प्रत्येक प्रतीक अगले प्रतीक से बदल जाता है, और प्रत्येक प्रकार की संख्या वैसी ही बनी रहती है

पुस्तक दो उदाहरणों से यह दिखाती है।

(i) कुंडली कुंडली × ∩
कुंडली कुंडली = कुंडली + कुंडली, अत:
(कुंडली + कुंडली) × ∩ = (कुंडली × ∩) + (कुंडली × ∩)  (वितरण गुणधर्म)
= कमल + कमल = कमल कमल
संख्याओं में: (100 + 100) × 10 = 1000 + 1000 = 2000 ✓
(ii) कुंडली ∩∩ | × ∩
कुंडली ∩∩ | = कुंडली + ∩∩ + |, अत:
(कुंडली + ∩∩ + |) × ∩ = (कुंडली × ∩) + (∩∩ × ∩) + (| × ∩)
= कमल + कुंडली कुंडली + ∩
= कमल कुंडली कुंडली ∩
संख्याओं में: 121 × 10 = 1210
ऐसा क्यों होता है: वितरण गुणधर्म से प्रत्येक भाग अलग-अलग गुणा हो जाता है, और प्रत्येक भाग एक सांकेतिक संख्या है, अत: वह प्रतीक-सूची में केवल एक स्थान आगे खिसक जाता है। गिनतियाँ अछूती रहती हैं — दो कुंडली दो कमल बन जाती हैं, दो ∩ दो कुंडली। हिंदू संख्यांकों में यही कथन इस प्रकार है: “10 से गुणा करने के लिए अंत में एक 0 लगा दीजिए।” 121 से 1210 बनता है और अंक 1, 2, 1 तनिक भी नहीं बदले, केवल एक स्थान बाईं ओर खिसक गए।
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