∠1 = ∠2, और यही वह छूटी हुई कड़ी है — तर्क ठीक वही है जो निगमन 2 में था।
माना ABCD के चारों कोण 90° के हैं और BD मिलाया गया है। ∠1 = ∠ADB, ∠2 = ∠CBD तथा ∠3 = ∠DBA लीजिए।
∠B = 90° है, अत: ∠3 + ∠2 = 90°
∆ABD में: ∠3 + ∠1 + 90° = 180°, अत: ∠3 + ∠1 = 90°
अत: ∠1 = ∠2 = 90° – ∠3
अब ∆BAD तथा ∆DCB की तुलना कीजिए —
∠A = ∠C = 90°
∠1 = ∠2 (अभी सिद्ध किया)
BD = DB (उभयनिष्ठ भुजा)
⇒ AAS नियम से ∆BAD ≅ ∆DCB
⇒ AD = CB तथा DC = BA
अत: जिस चतुर्भुज के सभी कोण 90° हों, उसकी सम्मुख भुजाएँ स्वत: ही समान होती हैं — वह आयत है।
ऐसा क्यों होता है: विकर्ण BD प्रत्येक समकोण को दो भागों में बाँटता है। B के कोने में से जितना भाग लिया जाता है, उतना ही D पर बच जाता है, क्योंकि दोनों योग (कोने का तथा त्रिभुज का) एक ही 90° तक जाते हैं। एक ही विकर्ण साझा करते हुए जिन दो त्रिभुजों के कोण-युग्म मेल खाते हों, वे एक-दूसरे की प्रतिकृति ही होंगे।