(क) शब्द से जुड़े शब्द — नीचे दिए गए रिक्त स्थानों में ‘स्वदेश’ से जुड़े शब्द अपने समूह में चर्चा करके लिखिए। फिर मित्रों से मिलाकर अपनी सूची बढ़ाइए —
उत्तर
पुस्तक में ‘स्वदेश’ के चारों ओर नौ ख़ाली खाने बने हैं। उन्हें इस तरह भरा जा सकता है —
‘स्वदेश’ से जुड़े नौ शब्द — जैसे पुस्तक के शब्द-जाल में भरे जाने हैं।
सूची और बढ़ाइए — देशवासी, नागरिक, स्वाभिमान, स्वतंत्रता, राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत, राष्ट्रभाषा, राष्ट्रीय ध्वज, सीमा, सैनिक, संविधान, स्वदेश-प्रेम, देशहित, जननी-जन्मभूमि।
शब्द चुनने का ढंग: तीन दिशाओं में सोचिए — (1) पर्याय: वतन, राष्ट्र, मातृभूमि, जन्मभूमि; (2) ‘स्व’ से बने शब्द: स्वदेशी, स्वराज, स्वतंत्रता, स्वाभिमान; (3) देश की पहचानें: तिरंगा, राष्ट्रगान, मातृभाषा, संविधान। इसी तरह किसी भी शब्द का जाल आसानी से भरा जा सकता है।
प्र2.
(ख) विराम चिह्नों को समझें — “जो चल न सका संसार-संग” “बहती जिसमें रस-धार नहीं” “पाया जिसमें दाना-पानी” “हैं माता-पिता बंधु जिसमें” “हम हैं जिसके राजा-रानी” “जिससे न जाति-उद्धार हुआ” — कविता में आई हुई उपर्युक्त पंक्तियों को ध्यानपूर्वक पढ़िए। इनमें कुछ शब्दों के बीच एक चिह्न (-) लगा है। इसे योजक चिह्न कहते हैं। योजक चिह्न दो शब्दों में परस्पर संबंध स्पष्ट करने तथा उन्हें जोड़कर लिखने के लिए प्रयोग किए जाते हैं। कविता में संदर्भ के अनुसार योजक चिह्नों के स्थान पर का, की, के और में से कौन-से शब्द जोड़ेंगे जिससे अर्थ स्पष्ट हो सके। लिखिए। (संकेत— ‘जो चल न सका संसार के संग’)
उत्तर
कविता की पंक्ति
योजक वाला जोड़ा
अर्थ स्पष्ट करने वाला रूप
“जो चल न सका संसार-संग”
संसार-संग
जो चल न सका संसार के संग
“बहती जिसमें रस-धार नहीं”
रस-धार
बहती जिसमें रस की धार नहीं
“जिससे न जाति-उद्धार हुआ”
जाति-उद्धार
जिससे न जाति का उद्धार हुआ
“पाया जिसमें दाना-पानी”
दाना-पानी
पाया जिसमें दाना और पानी
“हैं माता-पिता बंधु जिसमें”
माता-पिता
हैं माता और पिता, बंधु जिसमें
“हम हैं जिसके राजा-रानी”
राजा-रानी
हम हैं जिसके राजा और रानी
यहाँ सबसे ज़रूरी बात: छहों जोड़े एक जैसे नहीं हैं। पहले तीन में दूसरा शब्द मुख्य है और पहला उसका संबंधी — इसलिए वहाँ का / की / के लगता है (रस की धार, जाति का उद्धार, संसार के संग)। पिछले तीन में दोनों शब्द बराबर के हैं — दाना भी, पानी भी; माता भी, पिता भी। ऐसे जोड़ों में का/की/के नहीं, ‘और’ लगेगा। पहले तरह के समास को तत्पुरुष और दूसरी तरह के को द्वंद्व कहते हैं।
Check it yourself: पुस्तक ने चार शब्द दिए हैं — का, की, के, में। इनमें से ‘में’ इन छह पंक्तियों में कहीं नहीं लगता। यह जाँचने का अच्छा तरीक़ा है कि आप शब्द केवल भरने के लिए नहीं, अर्थ देखकर चुन रहे हैं या नहीं।
प्र3.
(ग) शब्द-मित्र — “है जान एक दिन जाने को” “है काल-दीप जलता हरदम” उपर्युक्त पंक्तियों पर ध्यान दीजिए। इन दोनों पंक्तियों में ‘है’ शब्द पहले आया है जिसके कारण कविता में लयात्मकता आ गई है। यदि ‘है’ का प्रयोग पंक्ति के अंत में किया जाए तो यह गद्य जैसी लगने लगेगी, जैसे— ‘जान एक दिन जाने को है।’ ‘काल-दीप हरदम जलता है।’ • अब आप कविता में से ऐसी पंक्तियों को चुनिए जिनमें ‘है’ शब्द का प्रयोग पहले हुआ है। चुनी हुई पंक्तियों में शब्दों के स्थान बदलकर पुनः लिखिए।
उत्तर
कविता में ‘है / हैं’ आगे रखकर लिखी गई पंक्तियाँ और उनका सीधा (गद्य जैसा) रूप —
कविता की पंक्ति (‘है’ पहले)
शब्दों के स्थान बदलकर
“हैं माता-पिता बंधु जिसमें,”
जिसमें माता-पिता और बंधु हैं।
“हम हैं जिसके राजा-रानी॥”
हम जिसके राजा-रानी हैं।
“जिस पर है दुनिया दीवानी॥”
जिस पर दुनिया दीवानी है।
“उस पर है नहीं पसीजा जो,”
जो उस पर पसीजा नहीं है।
“क्या है वह भू का भार नहीं।”
क्या वह भू का भार नहीं है?
“निश्चित है निस्संशय निश्चित,”
निस्संशय यह निश्चित है।
“जल जाना है परवानों को॥”
परवानों को जल जाना है।
“सब कुछ है अपने हाथों में,”
सब कुछ अपने हाथों में है।
अंतर पर ध्यान दीजिए: दाहिने स्तंभ के वाक्य ग़लत नहीं हैं — पर उन्हें पढ़ते ही लगता है कि हम कविता नहीं, कोई सूचना पढ़ रहे हैं। कारण यह है कि हिंदी में साधारण वाक्य क्रिया पर समाप्त होता है; जब हर पंक्ति उसी ढंग से समाप्त हो, तो ध्वनि एकसार हो जाती है और लय मर जाती है। कवि ‘है’ को आगे लाकर पंक्ति का अंत किसी भारी शब्द के लिए खाली छोड़ देता है — दीवानी, हरदम, राजा-रानी — और वही शब्द तुक बनाता है।
प्र4.
• अब नीचे दी गई पंक्तियों में ‘है, हैं’ शब्द का प्रयोग पहले करके पंक्तियों को पुनः लिखिए और देखिए कि इससे पंक्तियों के सौंदर्य में क्या परिवर्तन आया है। अपने साथियों से चर्चा कीजिए। “जिस पर ज्ञानी भी मरते हैं, जिस पर है दुनिया दीवानी॥”
उत्तर
‘हैं’ आगे रखकर —
जिस पर हैं ज्ञानी भी मरते, जिस पर है दुनिया दीवानी॥
सौंदर्य में क्या परिवर्तन आया —
दोनों पंक्तियाँ एक ही साँचे की हो गईं — “जिस पर हैं…” और “जिस पर है…”। पहले केवल दूसरी पंक्ति में ‘है’ आगे था, अब दोनों में। इस समानांतर बनावट से जोड़ी बहुत कसी हुई लगती है और गाने में जुड़वाँ जैसी सुनाई देती है।
बल बदल गया — मूल पंक्ति में ज़ोर ‘मरते हैं’ पर था, यानी क्रिया पर। बदले हुए रूप में ज़ोर ‘जिस पर’ पर आ गया — यानी उस देश पर, जिसकी प्रशंसा कवि कर रहा है। कविता का ध्यान भी वहीं ले जाना चाहिए।
प्रवाह बढ़ा — दोनों पंक्तियाँ अब बिना रुके एक साँस में पढ़ी जा सकती हैं, क्योंकि दोनों का आरंभ एक-सा है।
पर एक हानि भी है — ‘मरते’ अब पंक्ति के अंत में आ गया, और वह ‘दीवानी’ से तुक नहीं मिलाता। मूल रूप में ‘हैं’ अंत में था, जो अगली पंक्ति के भारी शब्द को रास्ता देकर हट जाता था। इसीलिए कवि ने पहली पंक्ति में ‘हैं’ पीछे और दूसरी में आगे रखा — दोनों तरह का स्वाद एक ही जोड़ी में।
चर्चा के लिए: अपने समूह में दोनों रूप ज़ोर से पढ़कर देखिए। जहाँ कविता में एक-सी बनावट बार-बार आए, वहाँ गाने में सुविधा होती है; जहाँ बनावट थोड़ी बदले, वहाँ कविता ऊबाऊ होने से बच जाती है। अच्छा कवि दोनों का संतुलन रखता है।
प्र5.
(घ) समानार्थी शब्द — कविता से चुनकर कुछ शब्द निम्न तालिका में दिए गए हैं। दिए गए शब्दों से इनके समानार्थी शब्द ढूँढ़कर तालिका में दिए गए रिक्त स्थानों में लिखिए। (तालिका के शब्द — भू, दीप, हृदय, तलवार, दुनिया, पत्थर; दिए गए शब्द — दिल, पाहन, प्रदीप, धरा, जग, असि, पृथ्वी, संसार, कृपाण, जी, दीपक, पाषाण)
उत्तर
बारह शब्द दिए गए हैं और छह खानों के नीचे दो-दो रिक्त स्थान हैं — इसलिए हर शब्द के ठीक दो समानार्थी बैठेंगे।
कविता का शब्द
समानार्थी 1
समानार्थी 2
पहचानने का सूत्र
भू
धरा
पृथ्वी
तीनों का अर्थ ‘धरती’ — “क्या है वह भू का भार नहीं”
दीप
प्रदीप
दीपक
तीनों में ‘दीप’ ही मूल है — “है काल-दीप जलता हरदम”
हृदय
दिल
जी
‘दिल’ उर्दू से, ‘जी’ बोलचाल का — “वह हृदय नहीं है पत्थर है”
तलवार
असि
कृपाण
दोनों धारदार शस्त्र के नाम — “क्या तोप नहीं तलवार नहीं”
दुनिया
जग
संसार
तीनों ‘विश्व’ के लिए — “जिस पर है दुनिया दीवानी”
पत्थर
पाहन
पाषाण
‘पाहन’ ब्रज-अवधी का, ‘पाषाण’ संस्कृत का — “वह हृदय नहीं है पत्थर है”
बचे हुए शब्द कैसे छाँटें: पहले वे जोड़े मिलाइए जो साफ़ हैं — दीप/प्रदीप/दीपक एक ही मूल से बने हैं, इसलिए सबसे पहले पकड़ में आते हैं। फिर ‘असि’ और ‘कृपाण’ — दोनों शस्त्र-नाम हैं, और कविता में शस्त्र केवल तलवार है। अंत में जो बचे — ‘पाहन’ और ‘पाषाण’ — वे अपने-आप पत्थर के खाने में चले जाते हैं। कठिन शब्द अंत में छाँटिए, आसान पहले — यही तरीक़ा हर मिलान-प्रश्न में काम आता है।
Did you know? ‘जी’ आज हम आदर के लिए बरतते हैं (रामजी, पिताजी), पर उसका मूल अर्थ ‘जीव / मन / हृदय’ ही है — इसीलिए हम कहते हैं “मेरा जी नहीं लगता” या “जी भर आया”।
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