कक्षा ८ हिंदी अध्याय 1 स्वदेश के लिए एनसीईआरटी समाधान
अद्यतन 2026-09-19
इस अध्याय के बारे में
स्वदेश एक कविता है, गद्य पाठ नहीं। इसके रचयिता गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ (1883–1972) हैं, जिनका जन्म उत्तर प्रदेश के उन्नाव जनपद में हुआ। उन्होंने ब्रजभाषा में कविता लिखना आरंभ किया और बाद में खड़ी बोली के श्रेष्ठ कवियों में अपना स्थान बनाया। सरकारी नौकरी के कारण उन्हें ‘सनेही’ के अतिरिक्त दूसरा उपनाम ‘त्रिशूल’ रखना पड़ा — यह बात उन्होंने स्वयं कही है। त्रिशूल तरंग , राष्ट्रीय मंत्र और कृषक क्रंदन उनकी उल्लेखनीय रचनाएँ हैं। राष्ट्र-प्रेम के साथ-साथ उन्होंने किसान, मजदूर और सामाजिक कुरीतियों पर भी लिखा। कविता की टेक (ध्रुवपंक्ति) है — “वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।” यही पंक्ति कविता के आरंभ, बीच और अंत में लौटती है और हर बार भाव को गहरा करती जाती है। कवि पहले शर्तें गिनाता है — जो जीवित जोश न जगा सका, जो संसार-संग न चल सका, जिसने साहस छोड़ दिया, जिससे जाति का उद्धार न
त्वरित पुनरावृत्ति
| शब्द | अर्थ | कविता की पंक्ति | अपने वाक्य में प्रयोग |
|---|---|---|---|
| स्वदेश | अपना देश, जन्मभूमि | “जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।” | स्वदेश के लिए काम करना ही सच्ची सेवा है। |
| सार | तत्व, मूल बात, महत्त्व | “उस जीवन में कुछ सार नहीं।” | बिना उद्देश्य के जीवन में कोई सार नहीं रहता। |
| संसार-संग | संसार के साथ, दुनिया के साथ कदम मिलाकर | “जो चल न सका संसार-संग,” | जो संसार के संग नहीं चलता, वह पीछे छूट जाता है। |
| जाति | यहाँ — अपना समाज, जन-समूह, राष्ट्र (उस युग के कवि इसी अर्थ में इसे बरतते थे) | “जिससे न जाति-उद्धार हुआ,” | भारतेंदु युग के लेखक जाति के उत्थान की बात करते थे। |
| उद्धार | ऊपर उठाना, संकट से निकालना | “होगा उसका उद्धार नहीं॥” | शिक्षा ही किसी समाज के उद्धार का रास्ता है। |
| रस-धार | रस की धारा — यहाँ कोमल भावों का प्रवाह | “बहती जिसमें रस-धार नहीं।” | उसके गीतों में रस की धार बहती है। |
| लासानी | बेमिसाल, जिसके जोड़ का दूसरा न हो (उर्दू ‘ला-सानी’) | “नव रत्न दिये हैं लासानी।” | ताजमहल की सुंदरता लासानी है। |
| नव रत्न | नौ रत्न — यहाँ देश की अनमोल विभूतियाँ, विद्वान और कलाकार | “नव रत्न दिये हैं लासानी।” | अकबर के दरबार के नव रत्न प्रसिद्ध हैं। |
| पसीजना | द्रवित होना, दया या भाव से पिघल जाना | “उस पर है नहीं पसीजा जो,” | भिखारी की दशा देखकर उसका मन पसीज गया। |
| भू का भार | धरती पर बोझ — व्यर्थ जीवन जीने वाला (मुहावरे जैसा प्रयोग) | “क्या है वह भू का भार नहीं।” | जो किसी के काम न आए, वह भू का भार ही है। |
| निस्संशय | बिना किसी संदेह के, निश्चित रूप से | “निश्चित है निस्संशय निश्चित,” | परिश्रम का फल निस्संशय मिलता है। |
| काल-दीप | काल (समय/मृत्यु) रूपी दीपक — एक रूपक | “है काल-दीप जलता हरदम,” | काल-दीप जलता रहता है, समय किसी के लिए नहीं रुकता। |
| परवाना | पतंगा, जो दीपक पर जल मरता है; मिट जाने वाला प्रेमी | “जल जाना है परवानों को॥” | देशभक्त परवानों की तरह अपना सब कुछ न्योछावर कर देते हैं। |
| आह्वान गीत | पुकारने वाला, ललकारने वाला गीत जो कुछ करने के लिए प्रेरित करे | “यह रचना एक आह्वान गीत है” | ‘झंडा ऊँचा रहे हमारा’ एक आह्वान गीत है। |
| तुक | पंक्तियों के अंतिम शब्दों की एक-सी ध्वनि | “‘दाना-पानी’ और ‘राजा-रानी’ … अंतिम ध्वनि एक-सी है” | बाल कविताओं में तुक मिलाने से मज़ा बढ़ जाता है। |
| योजक चिह्न | दो शब्दों को जोड़ने वाला (-) चिह्न | “संसार-संग”, “रस-धार”, “राजा-रानी” | ‘माता-पिता’ में योजक चिह्न लगा है। |
अभ्यास
- मेरी समझ से
- मिलकर करें मिलान
- पंक्तियों पर चर्चा
- सोच-विचार के लिए
- अनुमान और कल्पना से
- कविता की रचना
- आपकी कविता
- भाषा की बात
- कविता का शीर्षक
- आपकी बात
- हमारे अस्त्र-शस्त्र
- अपनी भाषा अपने गीत
- तिरंगा झंडा
- झरोखे से
- साझी समझ
- खोजबीन के लिए