मल्हार अध्याय 1 स्वदेश के लिए एनसीईआरटी समाधान
अद्यतन 2026-09-05
इस अध्याय के बारे में
स्वदेश एक कविता है, गद्य पाठ नहीं। इसके रचयिता गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ (1883–1972) हैं, जिनका जन्म उत्तर प्रदेश के उन्नाव जनपद में हुआ। उन्होंने ब्रजभाषा में कविता लिखना आरंभ किया और बाद में खड़ी बोली के श्रेष्ठ कवियों में अपना स्थान बनाया। सरकारी नौकरी के कारण उन्हें ‘सनेही’ के अतिरिक्त दूसरा उपनाम ‘त्रिशूल’ रखना पड़ा — यह बात उन्होंने स्वयं कही है। त्रिशूल तरंग , राष्ट्रीय मंत्र और कृषक क्रंदन उनकी उल्लेखनीय रचनाएँ हैं। राष्ट्र-प्रेम के साथ-साथ उन्होंने किसान, मजदूर और सामाजिक कुरीतियों पर भी लिखा। कविता की टेक (ध्रुवपंक्ति) है — “वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।” यही पंक्ति कविता के आरंभ, बीच और अंत में लौटती है और हर बार भाव को गहरा करती जाती है। कवि पहले शर्तें गिनाता है — जो जीवित जोश न जगा सका, जो संसार-संग न चल सका, जिसने साहस छोड़ दिया, जिससे जाति का उद्धार न
अभ्यास
- मेरी समझ से
- मिलकर करें मिलान
- पंक्तियों पर चर्चा
- सोच-विचार के लिए
- अनुमान और कल्पना से
- कविता की रचना
- आपकी कविता
- भाषा की बात
- कविता का शीर्षक
- आपकी बात
- हमारे अस्त्र-शस्त्र
- अपनी भाषा अपने गीत
- तिरंगा झंडा
- झरोखे से
- साझी समझ
- खोजबीन के लिए