मल्हार अध्याय 1 अनुमान और कल्पना से

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
अपने समूह में मिलकर चर्चा कीजिए और लिखिए। (क) “जिसने कि खजाने खोले हैं” अनुमान करके बताइए कि इस पंक्ति में किस प्रकार के खजाने की बात की गई होगी?
उत्तर

अनुमान लगाने का सूत्र अगली पंक्तियों में ही मिल जाता है — “नव रत्न दिये हैं लासानी। जिस पर ज्ञानी भी मरते हैं, जिस पर है दुनिया दीवानी।” जब पास ही ‘नव रत्न’ और ‘ज्ञानी’ आए हों, तो खजाने का अर्थ केवल सोना-चाँदी नहीं हो सकता।

खजाने का प्रकारउसमें क्या-क्यापंक्ति से जुड़ाव
ज्ञान का खजानावेद-उपनिषद, गणित का शून्य और दशमलव, आयुर्वेद, योग, खगोल-शास्त्र, नालंदा-तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय“जिस पर ज्ञानी भी मरते हैं” — विद्वान इसी पर मुग्ध होते हैं
प्रतिभाओं का खजानाकवि, वैज्ञानिक, कलाकार, वीर — देश की अनमोल विभूतियाँ“नव रत्न दिये हैं लासानी” — लासानी यानी बेमिसाल
प्राकृतिक खजानाउपजाऊ मिट्टी, नदियाँ, वन, खनिज, समुद्र, हिमालय“जिसकी मिट्टी में उगे बढ़े, पाया जिसमें दाना-पानी”
कला-संस्कृति का खजानासंगीत, नृत्य, स्थापत्य, अनेक भाषाएँ और लोककलाएँ“जिस पर है दुनिया दीवानी” — विश्व इन्हीं पर मोहित है
‘खजाने खोले हैं’ में ‘खोलना’ शब्द क्यों: खजाना बंद रखा जाता है, उस पर पहरा होता है। कवि कहता है कि इस देश ने अपना खजाना खोल दिया — यानी अपना ज्ञान और अपनी संपदा दुनिया से छिपाई नहीं, बाँट दी। इसी उदारता के कारण दुनिया इस पर दीवानी है।
प्र2.
(ख) “जिसकी मिट्टी में उगे बढ़े” पंक्ति में ‘उगे-बढ़े’ किसके लिए और क्यों कहा गया होगा?
उत्तर

‘उगे-बढ़े’ कहा गया है — हम मनुष्यों के लिए, यानी देश के नागरिकों के लिए। अगली पंक्ति इसे पक्का कर देती है — “पाया जिसमें दाना-पानी। हैं माता-पिता बंधु जिसमें”।

क्यों — ‘उगना’ शब्द साधारणतः पेड़-पौधों के लिए बरता जाता है; मनुष्य के लिए हम ‘जन्म लेना’ या ‘पलना-बढ़ना’ कहते हैं। कवि ने जानबूझकर पौधे वाला शब्द चुना है, क्योंकि इससे एक साथ तीन बातें आ जाती हैं —

  • जड़ का रिश्ता — पौधा अपनी मिट्टी में जमा होता है। वैसे ही मनुष्य की जड़ें अपनी जन्मभूमि में हैं।
  • पोषण का रिश्ता — पौधा मिट्टी से ही खुराक लेता है। हमें भी अन्न, जल, वायु इसी देश से मिले — “पाया जिसमें दाना-पानी”।
  • चेतावनी — पौधे को मिट्टी से उखाड़ दीजिए, वह सूख जाएगा। इसी तरह जो अपनी भूमि और अपने लोगों से कट जाता है, वह भीतर से सूखने लगता है।
अलंकार: यह रूपक है — मनुष्य पर पौधे का आरोप और देश पर मिट्टी का। एक ही शब्द ‘उगे’ से देश और नागरिक का संबंध वैसा सजीव बन जाता है जैसा मिट्टी और पेड़ का होता है। यही कारण है कि आगे कवि देश को ‘माता-पिता बंधु’ वाला घर कह पाता है।
प्र3.
(ग) “वह हृदय नहीं है पत्थर है” पंक्ति में ‘हृदय’ के लिए ‘पत्थर’ शब्द का प्रयोग क्यों किया गया होगा?
उत्तर

क्योंकि पत्थर हृदय का ठीक उलटा है — और कवि जो बात कहना चाहता है, वह उलटा दिखाने से सबसे साफ़ हो जाती है।

पत्थर का गुणहृदय से उलटकविता में कहाँ
कोई अनुभूति नहीं होतीहृदय अनुभव करता है, दुख-सुख समझता है“जो भरा नहीं है भावों से”
पिघलता नहीं, पसीजता नहींहृदय दूसरों का दुख देखकर द्रवित हो जाता है“उस पर है नहीं पसीजा जो”
उसमें कुछ बहता नहींहृदय में भावों की रस-धार बहती है“बहती जिसमें रस-धार नहीं”
कड़ा और निर्जीवहृदय कोमल और जीवंत होता है“जो जीवित जोश जगा न सका”
और एक बात: पत्थर छाती में भी रखा जा सकता है — पर वह वहाँ किसी काम का नहीं होता। कवि यही कहना चाहता है कि ऐसे व्यक्ति के सीने में कुछ है तो सही, पर वह हृदय का काम नहीं करता। यह रूपक अलंकार है, और साथ ही एक निर्णय भी — कवि सीधे कह देता है कि उसे हृदय मानने से ही इनकार है।
Tip: हिंदी में ‘पत्थर-दिल’ और ‘दिल पसीजना’ दोनों मुहावरे चलते हैं। कवि इन्हीं परिचित मुहावरों को उठाकर कविता का आधार बना देता है, इसीलिए पंक्ति पहली ही बार में समझ आ जाती है और याद भी रह जाती है।
प्र4.
(घ) कल्पना कीजिए कि पत्थर आपको अपनी कथा बता रहा है। वो आपसे क्या-क्या बातें करेगा और आप उसे क्या-क्या कहेंगे? (संकेत— पत्थर— जब मैं नदी में था तो नदी की धारा मुझे बदलती भी थी।…)
उत्तर

यह कल्पना का काम है, इसलिए इसका कोई एक उत्तर नहीं। पर अच्छा उत्तर वही होगा जो कविता से जुड़ा रहे — यानी बातचीत घूम-फिरकर इस बात पर आए कि पत्थर कठोर क्यों है और क्या वह कभी पिघल सकता है।

लिखने का तरीक़ा —

  • संवाद के रूप में लिखिए: पत्थर—मैं—
  • पत्थर से उसका सफ़र कहलवाइए — पहाड़ से टूटना, नदी में लुढ़कना, घिसते-घिसते चिकना होना, किनारे आ लगना।
  • अंत में उस मोड़ पर पहुँचिए जहाँ पत्थर और मनुष्य की तुलना बनती है।
नमूना उत्तर:
पत्थर— कभी मैं भी इस पहाड़ का हिस्सा था। एक दिन पानी ने मुझे तोड़कर नीचे गिरा दिया।
मैं— दुख नहीं हुआ तुम्हें?
पत्थर— बहुत। पर फिर नदी मिली। जब मैं नदी में था तो नदी की धारा मुझे बदलती भी थी — मेरे नुकीले कोने घिसकर गोल हो गए। जो चोट लगती थी, वही मुझे सुंदर बनाती गई।
मैं— तो तुम कठोर क्यों कहलाते हो?
पत्थर— यह लोगों का बनाया नाम है। मुझे देखो — मैं मंदिर की मूर्ति भी बना हूँ और घर की नींव भी। सड़क में बिछा हूँ तो तुम्हारे पाँव सँभालता हूँ।
मैं— फिर कवि ने पत्थर-हृदय को बुरा क्यों कहा?
पत्थर— इसलिए कि मैं किसी का दुख देखकर पिघल नहीं सकता। मेरी यही मजबूरी है। पर तुम मनुष्य हो — तुम्हारे पास वह हृदय है जो पिघल सकता है। उसे मेरे जैसा मत बना लेना।
मैं— यह बात याद रखूँगा, मित्र। तुम अपनी जगह उपयोगी हो; पर मुझे तुम्हारी तरह नहीं होना।
प्र5.
(ङ) देश-प्रेम की भावना देश की सुरक्षा से ही नहीं, बल्कि संरक्षण से भी जुड़ी होती है। अनुमान करके बताइए कि देश के किन-किन संसाधनों या वस्तुओं आदि को संरक्षण की आवश्यकता है और क्यों?
उत्तर

सुरक्षा का अर्थ है बाहर के ख़तरे से बचाना; संरक्षण का अर्थ है जो हमारे पास है उसे सँभालकर रखना और नष्ट न होने देना। दूसरा काम सीमा पर नहीं, हमारे अपने रोज़ के व्यवहार में होता है।

किसका संरक्षणक्यों ज़रूरीहम क्या कर सकते हैं
जलपृथ्वी का बहुत थोड़ा पानी ही पीने योग्य है; भूजल का स्तर लगातार गिर रहा हैनल बंद रखना, वर्षा-जल संग्रह, टपकते नल की मरम्मत
वन और वन्य जीववन वर्षा लाते हैं, मिट्टी थामते हैं, प्राणवायु देते हैं; एक बार लुप्त हुई प्रजाति लौटती नहींपेड़ लगाना, जंगल में कूड़ा न छोड़ना, वन्य जीवों की वस्तुएँ न ख़रीदना
मिट्टीएक इंच उपजाऊ मिट्टी बनने में सैकड़ों वर्ष लगते हैं; कटाव से खेती चौपट हो जाती हैमेड़बंदी, अधिक रसायन का प्रयोग न करना, खाली ज़मीन पर घास
खनिज और ईंधनकोयला, पेट्रोल, खनिज सीमित हैं — एक बार निकाल लिए तो दुबारा नहीं बनतेबिजली बचाना, पैदल-साइकिल-बस का प्रयोग, पुनर्चक्रण
ऐतिहासिक इमारतें और धरोहरये देश की ‘नव रत्न’ जैसी संपदा हैं; दीवार पर नाम लिखने से जो बिगड़ता है, वह ठीक नहीं होतास्मारकों पर कुछ न लिखना, गंदगी न फैलाना
भाषाएँ और लोककलाएँबहुत-सी बोलियाँ बोलने वाले घटते जा रहे हैं; भाषा मरने पर उसका पूरा ज्ञान-भंडार मर जाता हैअपनी बोली में बात करना, लोकगीत-कहानियाँ लिखकर सँभालना
देशी बीज और नस्लेंस्थानीय बीज और पशु-नस्लें यहाँ की जलवायु के लिए बनी हैं; ये सूखे और रोग सहती हैंबीज-बैंक, देशी अनाजों (बाजरा, रागी) को भोजन में जगह
कविता से जोड़िए: कवि ने देश की देन गिनाई है — मिट्टी, दाना-पानी, खजाने, नव रत्न। संरक्षण का अर्थ है इन्हीं देनों को अगली पीढ़ी के लिए बचाकर रखना। जो इन्हें बरबाद करता है, वह भी अपने ढंग से “भू का भार” ही है।
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