राजा-रानी कहा गया है — देश के नागरिकों को, यानी हम सब भारतवासियों को।
क्यों — इससे पहले की पंक्तियों में कवि देश को एक घर और परिवार की तरह चित्रित करता है — “जिसकी मिट्टी में उगे बढ़े, पाया जिसमें दाना-पानी। हैं माता-पिता बंधु जिसमें”। जब देश हमारा अपना घर है, तो उस घर में हम किराएदार या मेहमान नहीं हैं — हम उसके स्वामी हैं। यही बात कवि ‘राजा-रानी’ शब्द से कहता है।
- अधिकार — देश पर हमारा उतना ही हक़ है जितना राजा का अपने राज्य पर। यह बात उस समय कही जा रही थी जब देश पर किसी और का शासन था; इसलिए यह पंक्ति एक चुनौती भी है।
- गौरव — कवि नागरिक को छोटा नहीं, सबसे ऊँचा पद देता है। इससे पढ़ने वाले के भीतर स्वाभिमान जागता है।
- ज़िम्मेदारी — राजा-रानी केवल भोगते नहीं, अपने राज्य की रक्षा भी करते हैं। कवि याद दिला रहा है कि देश की देखभाल किसी और का नहीं, हमारा काम है।