मल्हार अध्याय 1 सोच-विचार के लिए

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
कविता को पुन: ध्यान से पढ़िए, पता लगाइए और लिखिए। (क) “हम हैं जिसके राजा-रानी” पंक्ति में राजा-रानी किसे और क्यों कहा गया है?
उत्तर

राजा-रानी कहा गया है — देश के नागरिकों को, यानी हम सब भारतवासियों को।

क्यों — इससे पहले की पंक्तियों में कवि देश को एक घर और परिवार की तरह चित्रित करता है — “जिसकी मिट्टी में उगे बढ़े, पाया जिसमें दाना-पानी। हैं माता-पिता बंधु जिसमें”। जब देश हमारा अपना घर है, तो उस घर में हम किराएदार या मेहमान नहीं हैं — हम उसके स्वामी हैं। यही बात कवि ‘राजा-रानी’ शब्द से कहता है।

इस शब्द-चुनाव में तीन बातें एक साथ आ जाती हैं:
  • अधिकार — देश पर हमारा उतना ही हक़ है जितना राजा का अपने राज्य पर। यह बात उस समय कही जा रही थी जब देश पर किसी और का शासन था; इसलिए यह पंक्ति एक चुनौती भी है।
  • गौरव — कवि नागरिक को छोटा नहीं, सबसे ऊँचा पद देता है। इससे पढ़ने वाले के भीतर स्वाभिमान जागता है।
  • ज़िम्मेदारी — राजा-रानी केवल भोगते नहीं, अपने राज्य की रक्षा भी करते हैं। कवि याद दिला रहा है कि देश की देखभाल किसी और का नहीं, हमारा काम है।
ध्यान दीजिए: ‘राजा-रानी’ एक रूपक है। कवि सचमुच किसी को राजा नहीं बना रहा — वह नागरिक और देश के रिश्ते को स्वामी और अपने घर के रिश्ते की तरह दिखा रहा है।
प्र2.
(ख) ‘संसार-संग’ चलने से आप क्या समझते हैं? जो व्यक्ति ‘संसार-संग’ नहीं चलता, संसार उसका क्यों नहीं हो पाता है?
उत्तर

‘संसार-संग’ चलना यानी दुनिया के साथ क़दम मिलाकर चलना। इसके तीन अर्थ निकलते हैं —

  • समय के साथ चलना — नई जानकारी, नई विद्या, नए तौर-तरीक़े सीखते रहना; पुरानी बातों से चिपके न रह जाना।
  • लोगों के साथ चलना — दूसरों के सुख-दुख में शामिल होना, मिलकर काम करना, अकेले-अकेले न रहना।
  • समाज के काम में हाथ बँटाना — केवल अपना हित न देखना।

संसार उसका क्यों नहीं हो पाता — क्योंकि संबंध एकतरफ़ा नहीं बनते। संसार उसी को अपना मानता है जो पहले संसार को अपना माने। जो व्यक्ति सबसे कटकर, केवल अपने लिए जीता है, वह धीरे-धीरे सबकी स्मृति से बाहर हो जाता है — न कोई उसे पुकारता है, न किसी काम में उसे गिनता है। जीते-जी वह अकेला पड़ जाता है।

कविता के भीतर का सूत्र: कवि की पूरी कविता इसी नियम पर टिकी है — जो देता है, उसी को मिलता है। देश ने हमें मिट्टी, दाना-पानी, माता-पिता और ज्ञान दिया; अब लौटाने की बारी हमारी है। जो लौटाता नहीं, उसका दावा भी नहीं बनता। इसीलिए अगली ही पंक्तियों में कवि कहता है — जिससे जाति का उद्धार न हुआ, उसका अपना उद्धार भी नहीं होगा।
प्र3.
(ग) “उस पर है नहीं पसीजा जो/क्या है वह भू का भार नहीं।” पंक्ति से आप क्या समझते हैं? बताइए।
उत्तर

अर्थ — जिस व्यक्ति का हृदय अपने देश के लिए द्रवित नहीं होता, जो देश की दशा देखकर पिघलता ही नहीं, वह धरती पर बोझ के सिवा और कुछ नहीं है।

‘उस पर’ किस पर? — इससे पहले की चार-चार पंक्तियों में कवि देश की देन गिनाता चला आया है: मिट्टी, दाना-पानी, माता-पिता और बंधु, खुले हुए खजाने, लासानी नव रत्न, वह ज्ञान-संपदा जिस पर दुनिया दीवानी है। ‘उस पर’ यानी इस पूरे देश पर, इतना सब पाने के बाद भी

‘भू का भार’ का बल कहाँ है: कवि यह नहीं कहता कि ऐसा व्यक्ति बुरा है। वह इससे कड़ी बात कहता है — ऐसा व्यक्ति व्यर्थ है। पेड़ छाया देता है, नदी पानी देती है, किसान अन्न देता है — धरती पर हर चीज़ कुछ न कुछ लौटाती है। जो कुछ नहीं लौटाता, वह केवल जगह घेरता है। मुहावरे की तरह बरता गया यह प्रयोग बहुत तीखा है।
शिल्प: कवि ने इसे प्रश्न बनाकर पूछा है — “क्या है वह भू का भार नहीं।” सीधा कथन होता तो आरोप लगता; प्रश्न बनने से पाठक स्वयं अपने बारे में उत्तर देने लगता है। यह प्रश्न-शैली इस कविता की बड़ी विशेषता है।
प्र4.
(घ) कविता में देश-प्रेम के लिए बहुत-सी बातें आई हैं। आप ‘देश-प्रेम’ से क्या समझते हैं? बताइए।
उत्तर

देश-प्रेम का अर्थ है — अपने देश के प्रति लगाव, जो केवल भावना तक न रुके, बल्कि रोज़ के काम और व्यवहार में दिखाई दे। नारे लगाना या त्योहार के दिन झंडा लगा लेना देश-प्रेम की शुरुआत हो सकती है, पूरा रूप नहीं।

कविता में देश-प्रेम किन बातों से बना है —

कविता की पंक्तिदेश-प्रेम का वह रूप
“जो जीवित जोश जगा न सका”दूसरों में उत्साह भरना, निराशा न फैलाना
“जो चल न सका संसार-संग”समाज के साथ मिलकर चलना
“जिसने साहस को छोड़ दिया”कठिन काम से पीछे न हटना
“जिससे न जाति-उद्धार हुआ”अपने समाज को ऊपर उठाना
“जो भरा नहीं है भावों से”संवेदनशील बने रहना
“सब कुछ है अपने हाथों में”बहाने छोड़कर स्वयं काम में लगना
नमूना उत्तर: “मेरे लिए देश-प्रेम का मतलब है — जो काम मेरे हिस्से आया है उसे ईमानदारी से करना। विद्यार्थी हूँ, तो मन लगाकर पढ़ना। पानी और बिजली बरबाद न करना, क्योंकि वे भी देश की संपत्ति हैं। सार्वजनिक जगहों — बस, रेल, पार्क, स्मारक — को गंदा या ख़राब न करना। अपनी भाषा बोलने में शरमाना नहीं, और किसी दूसरी भाषा या प्रदेश के व्यक्ति को छोटा न समझना। देश केवल नक़्शा नहीं है, उसमें रहने वाले लोग भी देश हैं; इसलिए लोगों के साथ अच्छा व्यवहार भी देश-प्रेम ही है।”
प्र5.
(ङ) यह रचना एक आह्वान गीत है जो हमें देश-प्रेम के लिए प्रेरित और उत्साहित करती है। इस रचना की अन्य विशेषताएँ ढूँढ़िए और लिखिए।
उत्तर

‘आह्वान गीत’ यानी पुकारने और ललकारने वाला गीत। यह कविता उसी काम के लिए गढ़ी गई है, और उसका असर बढ़ाने के लिए कवि ने ये उपाय किए हैं —

  1. टेक (ध्रुवपंक्ति) की आवृत्ति — “वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं” तीन बार लौटती है। हर बार वह किसी नए तर्क के बाद आती है, इसलिए हर बार अधिक भारी लगती है। यही पंक्ति गीत को सामूहिक रूप से गाने लायक़ बनाती है।
  2. सरल खड़ी बोली और छोटे शब्द — हृदय, पत्थर, जोश, साहस, तोप, तलवार। कठिन शब्द (लासानी, निस्संशय) गिने-चुने हैं। जुलूस या सभा में गाया जाने वाला गीत सरल ही होना चाहिए।
  3. ‘नहीं’ की बार-बार आवृत्ति — कवि सीधे उपदेश नहीं देता कि ‘देश से प्रेम करो’। वह उलटी ओर से चलता है — “जिसमें… नहीं”, “वह… नहीं”। इस निषेध से एक चुनौती का स्वर पैदा होता है, और पढ़ने वाला घबराकर सोचता है कि कहीं वह भी उन्हीं में तो नहीं।
  4. ओज गुण / वीर भाव — जोश, साहस, पार, उद्धार, तोप, तलवार, परवाने — शब्दों का चुनाव ही उत्साह भरता है।
  5. प्रश्न-शैली — “क्या है वह भू का भार नहीं।”, “क्या तोप नहीं तलवार नहीं।” प्रश्न पाठक को उत्तर देने पर मजबूर करता है, इसलिए वह सुनकर चुप नहीं रह पाता।
  6. तुक और लय — नहीं/नहीं की समान तुक, और दूसरे भाग में पानी–रानी–लासानी–दीवानी की मधुर तुक। सब पंक्तियाँ लगभग बराबर लंबाई की हैं, इसलिए गाने में कहीं ठोकर नहीं लगती।
  7. पदक्रम बदलना — “है जान एक दिन जाने को”, “है काल-दीप जलता हरदम” — ‘है’ को आगे लाकर कवि ने गद्य जैसी सपाटता तोड़ी है।
  8. युग्म शब्दों की भरमार — दाना-पानी, माता-पिता, राजा-रानी, संसार-संग, रस-धार, जाति-उद्धार, काल-दीप। ये जोड़े बोलने में एक झटका-सा देते हैं, जिससे लय बनी रहती है।
  9. सूक्ति जैसी पंक्तियाँ — “सब कुछ है अपने हाथों में” जैसी पंक्तियाँ अलग करके भी पूरी बात कह देती हैं और आसानी से याद रह जाती हैं।
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