मल्हार अध्याय 1 झरोखे से

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
आपने देश-प्रेम से संबंधित ‘स्वदेश’ कविता पढ़ी। अब आप स्वदेशी कपड़े ‘खादी’ से संबंधित सोहनलाल द्विवेदी की कविता ‘खादी गीत’ का एक अंश पढ़िए। — “खादी के धागे-धागे में / अपनेपन का अभिमान भरा, / माता का इसमें मान भरा, / अन्यायी का अपमान भरा; // खादी के रेशे-रेशे में / अपने भाई का प्यार भरा, / माँ-बहनों का सत्कार भरा, / बच्चों का मधुर दुलार भरा; // खादी की रजत चंद्रिका जब, / आकर तन पर मुसकाती है, / तब नवजीवन की नई ज्योति / अंतस्तल में जग जाती है;”
उत्तर

भावार्थ — कवि सोहनलाल द्विवेदी कहते हैं कि खादी केवल कपड़ा नहीं है। उसके एक-एक धागे में अपनेपन का गौरव बुना हुआ है, उसमें भारत माता का मान है और अन्याय करने वाले (विदेशी शासन) का अपमान है। उसके एक-एक रेशे में भाई का प्रेम, माँ-बहनों का सत्कार और बच्चों का दुलार भरा है। और जब चाँदनी जैसी उजली खादी शरीर पर आकर मुस्कराती है, तब भीतर, हृदय की गहराई में एक नए जीवन की नई ज्योति जग उठती है।

खादी इतनी बड़ी बात क्यों थी: अंग्रेज़ी शासन में भारत का कच्चा कपास विदेश जाता था और वहाँ की मिलों का बना कपड़ा यहाँ बिकता था — इससे यहाँ के बुनकर बेकार हो गए। गांधीजी ने चरखा और खादी को इसका उत्तर बनाया। खादी पहनने का अर्थ था — विदेशी कपड़े का बहिष्कार और अपने ही देश के हाथों को काम। इसीलिए कवि इस साधारण मोटे कपड़े में मान, प्रेम और नई ज्योति देख पाता है।

शिल्प की बातें —

  • पुनरुक्ति — ‘धागे-धागे’, ‘रेशे-रेशे’; इससे लगता है कि कपड़े का कोई एक हिस्सा नहीं, पूरा का पूरा भाव से भरा है।
  • अनुप्रास और तुक — अभिमान भरा, मान भरा, अपमान भरा; प्यार भरा, सत्कार भरा, दुलार भरा। ‘भरा’ हर पंक्ति के अंत में लौटता है — यह टेक जैसा काम करता है।
  • रूपक — ‘खादी की रजत चंद्रिका’, यानी खादी को चाँदी जैसी उजली चाँदनी कहा गया।
  • मानवीकरण — खादी ‘मुसकाती है’ — निर्जीव कपड़े को जीवित व्यक्ति की तरह दिखाया गया।
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