मल्हार अध्याय 1 अपनी भाषा अपने गीत

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) कक्षा में सभी विद्यार्थी अपनी-अपनी भाषा में देश-प्रेम से संबंधित कविताओं और गीतों का संकलन करें।
उत्तर

यह कक्षा की परियोजना है। इसे इस तरह कीजिए —

  1. हर विद्यार्थी अपनी मातृभाषा या घर में बोली जाने वाली बोली में एक देश-प्रेम का गीत चुने। घर के बड़ों, दादी-नानी या पड़ोस के लोगों से पूछिए — प्रायः उन्हें ऐसे गीत याद होते हैं जो किताबों में नहीं मिलते।
  2. हर गीत के लिए एक पृष्ठ बनाइए, जिसमें हो — गीत का नाम, रचयिता, भाषा, कुछ पंक्तियाँ और हिंदी में उनका भाव
  3. सब पृष्ठ मिलाकर कक्षा का एक संकलन बनाइए और उसे कोई नाम दीजिए, जैसे ‘हमारी भाषाएँ, हमारा देश’।
भाषारचनारचयिता
हिंदीझंडा ऊँचा रहे हमाराश्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’
हिंदीझाँसी की रानीसुभद्राकुमारी चौहान
उर्दूसारे जहाँ से अच्छा (तराना-ए-हिंदी)मुहम्मद इक़बाल
उर्दूसरफ़रोशी की तमन्नाबिस्मिल अज़ीमाबादी
बांग्लावंदे मातरम्बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय
बांग्लाजन गण मनरवींद्रनाथ ठाकुर
मराठीने मजसी ने परत मातृभूमीलाविनायक दामोदर सावरकर
तमिलभारत समुदायम्सुब्रह्मण्य भारती
पंजाबीमेरा रंग दे बसंती चोलालोकप्रचलित (भगत सिंह से जुड़ा)
Tip: संकलन में हर गीत के नीचे एक पंक्ति यह भी लिखिए कि वह गीत कब और किस अवसर पर गाया जाता था। इससे पता चलेगा कि अलग-अलग भाषाओं के लोग एक ही भावना को अपने-अपने ढंग से कह रहे थे।
प्र2.
(ख) किसी एक गीत की कक्षा में संगीतात्मक प्रस्तुति भी करें।
उत्तर

प्रस्तुति की तैयारी इस क्रम में कीजिए —

  1. गीत चुनिए — ऐसा गीत लीजिए जिसकी तुक और लय साफ़ हो, ताकि पूरा समूह एक साथ गा सके। ‘स्वदेश’ स्वयं इसके लिए बहुत उपयुक्त है, क्योंकि इसकी टेक तीन बार लौटती है।
  2. ताल तय कीजिए — तालियों से भी काम चल जाएगा। चाहें तो ढोलक, मंजीरा, खंजरी या डेस्क पर हल्की थाप का प्रयोग कीजिए।
  3. टेक और अंतरा बाँटिए — टेक (“वह हृदय नहीं है पत्थर है…”) पूरी कक्षा मिलकर गाए और बीच की पंक्तियाँ दो-तीन विद्यार्थी बारी-बारी से। सामूहिक टेक ही आह्वान गीत का प्राण है।
  4. उच्चारण साफ़ रखिए — गाते समय ‘निस्संशय’, ‘लासानी’ जैसे शब्द जल्दबाज़ी में न निगलें।
  5. अंत में भाव बताइए — गाने के बाद दो वाक्य में बताइए कि गीत किस अवसर के लिए लिखा गया था। इससे सुनने वालों को गीत और गहरा लगेगा।
क्यों गाकर देखना ज़रूरी है: यह कविता पढ़ने के लिए नहीं, गाने के लिए बनी है। जब आप इसे स्वर में गाएँगे तो स्वयं समझ जाएँगे कि कवि ने ‘है’ को पंक्ति के आरंभ में क्यों रखा और तुक को इतना कसकर क्यों बाँधा — गाते समय वही जगहें सबसे आसान लगेंगी।
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