प्र1.
इस कविता में सपने को मनुष्य की तरह हँसते, मुसकराते, गाते हुए बताया गया है। ध्यान से देखें तो इस कविता में इस प्रकार की अन्य विशेषताएँ भी दिखाई देंगी। उन्हें लिखिए और कक्षा में उन पर चर्चा कीजिए।
उत्तर
प्रश्न में जिस विशेषता की ओर संकेत है, वह मानवीकरण है — सपने को मनुष्य की तरह दिखाना। कविता में इसके अलावा भी कई रचना-विशेषताएँ हैं:
| विशेषता | कविता में कहाँ | वह क्या असर पैदा करती है |
|---|---|---|
| मानवीकरण | “चलना सीखें”, “रूठना-मचलना सीखें”, “हँसें/मुसकराएँ/गाएँ”, “उँगली जलाएँ”, “अपने पाँवों पर खड़े हों” | सपना एक जीता-जागता बच्चा बन जाता है — गोद से उतरता, चलना सीखता, ज़िद करता और अंत में अपने पैरों पर खड़ा होता हुआ। पूरी कविता में यही एक रूपक चलता रहता है। |
| उपमा | “चाँद-तारों-सी अप्राप्य सच्चाइयों” | ‘सी’ वाचक शब्द से लक्ष्य की दूरी और चमक — दोनों एक साथ दिख जाती हैं। |
| प्रतीक | “दीये की रोशनी” | दीया यहाँ सचमुच का दीया नहीं — वह ज्ञान, अवसर और लक्ष्य का प्रतीक है। |
| आवृत्ति (पुनरुक्ति) | “जा, / तेरे स्वप्न बड़े हों” — आरंभ में और अंत में | कविता एक वृत्त बन जाती है; आशीर्वाद दोहराकर पक्का किया जाता है, जैसे बड़े लोग विदा करते समय करते हैं। |
| युग्म शब्द | “रूठना-मचलना”, “चाँद-तारों”, “हँसें/मुसकराएँ/गाएँ” | जोड़े में आए शब्द भाव को बढ़ा देते हैं और पंक्ति में लय पैदा करते हैं। |
| मुक्त छंद और छोटी पंक्तियाँ | “हँसें”, “मुसकराएँ”, “गाएँ” — तीन अलग-अलग पंक्तियाँ | एक-एक शब्द की पंक्ति पढ़ने पर ठहराव लाती है, जिससे हर क्रिया अलग से सुनाई देती है। कोई निश्चित तुक या मात्रा-गणना नहीं है। |
| संबोधन शैली | “जा,” … “तेरे” | ‘तू’ के प्रयोग से कविता उपदेश नहीं, अपनापन बन जाती है — जैसे कोई बड़ा सिर पर हाथ रखकर कह रहा हो। |
सबसे बड़ी विशेषता: पूरी कविता में क्रियाएँ ही क्रियाएँ हैं और संज्ञा केवल एक — ‘स्वप्न’। इसीलिए कविता स्थिर नहीं लगती, चलती हुई लगती है — जैसे सपना सचमुच हमारे सामने बड़ा हो रहा हो।