भावार्थ: जा — और मेरी शुभकामना यह है कि तेरे सपने छोटे न रहें, बड़े हों। कवि किसी को धन, सुख या सुरक्षा का आशीर्वाद नहीं दे रहा; वह बड़े सपने का आशीर्वाद दे रहा है, क्योंकि आगे जो कुछ भी होगा वह सपने के आकार से ही तय होगा।
शिल्प कैसे काम करता है:
- पहला शब्द “जा” अकेला, एक पूरी पंक्ति के बराबर खड़ा है। इससे विदाई का क्षण बन जाता है — कोई घर की देहरी से बाहर भेजा जा रहा है। यदि इसे अगली पंक्ति के साथ जोड़ दिया जाता तो यह ठहराव और यह अर्थ दोनों खो जाते।
- ‘बड़े हों’ विधि/इच्छावाचक रूप है — यह आदेश नहीं, कामना है। इसी से कविता आशीर्वाद बनती है, उपदेश नहीं।
- यही दो पंक्तियाँ कविता के अंत में फिर आती हैं। इस आवृत्ति से कविता एक घेरा बन जाती है और बात मन पर टिक जाती है।