मल्हार अध्याय 4 यात्रा सबके लिए

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) कल्पना कीजिए कि कुछ मित्रों का समूह एक यात्रा पर जा रहा है। आप एक मार्गदर्शक या टूरिस्ट गाइड हैं। आप इन सबकी यात्रा को सुविधाजनक बनाने के लिए किन-किन बातों का ध्यान रखेंगे? उपर्युक्त चित्र में सबकी अलग-अलग आवश्यकताएँ हो सकती हैं। इन्हें ध्यान में रखते हुए सोचिए कि वहाँ पहुँचने, घूमने, भोजन आदि में आप कैसे सहायता करेंगे?
उत्तर

पुस्तक में दिया गया चित्र ध्यान से देखिए — उसमें एक जैसे लोग नहीं हैं। उसमें छड़ी लिए एक दृष्टिबाधित व्यक्ति, कान की मशीन लगाए एक बुजुर्ग, पहियेदार कुर्सी पर बैठी एक लड़की, गोद में शिशु लिए एक महिला, छोटे बच्चे, चश्मा लगाए बुजुर्ग और अलग-अलग पहनावे के स्त्री-पुरुष — सब एक ही समूह में हैं। अच्छा गाइड वही है जिसकी योजना इन सबके लिए एक साथ काम करे।

चरणकिन बातों का ध्यान रखूँगा
यात्रा से पहलेसबसे पहले हर व्यक्ति से पूछूँगा कि उसे किस बात में सहायता चाहिए — अनुमान नहीं लगाऊँगा। दवाइयाँ, चश्मा, कान की मशीन, बैटरी, छाता, पानी — इनकी सूची पहले ही भेज दूँगा। पूरे मार्ग की जानकारी लिखकर भी दूँगा और बोलकर भी बताऊँगा, ताकि दृष्टिबाधित और श्रवणबाधित — दोनों तक बात पहुँचे।
वहाँ पहुँचने मेंऐसी बस/गाड़ी चुनूँगा जिसमें चढ़ने के लिए रैंप हो या नीची सीढ़ी। पहियेदार कुर्सी और शिशु वाली माता के लिए दरवाजे के पास की सीट पहले से रखूँगा। रास्ते में हर दो घंटे पर विश्राम, जहाँ शौचालय सुलभ हो।
घूमने मेंपहले से पता कर लूँगा कि कहाँ सीढ़ियाँ हैं और कहाँ ढलान वाला रास्ता। समूह की चाल सबसे धीमे चलने वाले के हिसाब से रखूँगा, सबसे तेज के नहीं। जो दिखाई नहीं देता उसे शब्दों में बताऊँगा; जो सुनाई नहीं देता उसे लिखकर या संकेत से बताऊँगा। बीच-बीच में छाया में बैठने की जगह तय रखूँगा।
भोजन मेंपहले पूछूँगा — किसी को कोई चीज से एलर्जी है? कोई शाकाहारी/निराहारी है? बच्चों और बुजुर्गों के लिए हल्का भोजन। भोजनालय ऐसा चुनूँगा जहाँ पहियेदार कुर्सी अंदर तक जा सके और शौचालय पास हो। पानी सबके पास हमेशा रहे।
सुरक्षासबके पास एक परची — जिस पर समूह का नाम, मेरा नंबर और लौटने का समय हो। भीड़ में बिछड़ जाने पर मिलने का एक स्थान पहले ही तय। प्राथमिक चिकित्सा पेटी साथ। और हर आधे घंटे में एक बार गिनती।
सबसे बड़ा नियम: सहायता ऐसी हो जो साथी को स्वतंत्र बनाए, दयनीय नहीं। किसी की पहियेदार कुर्सी बिना पूछे मत खींचिए, दृष्टिबाधित साथी का हाथ पकड़कर मत ले जाइए — अपना हाथ पकड़ने दीजिए। और बात हमेशा उसी व्यक्ति से कीजिए, उसके साथ आए व्यक्ति से नहीं।
प्र2.
(ख) अपने किसी मित्र के साथ बिना बोले संवाद कीजिए— संकेतों से। अब सोचिए कि यात्रा में श्रवणबाधित व्यक्ति के लिए क्या-क्या आवश्यक होगा?
उत्तर

पहले गतिविधि: मित्र के साथ पाँच मिनट बिना बोले बात कीजिए — केवल हाथ, चेहरे और संकेतों से। कोशिश कीजिए कि आप ये बातें कह सकें — “भूख लगी है”, “बस उधर है”, “थोड़ा रुको”, “मुझे समझ नहीं आया”, “धन्यवाद”। फिर सोचिए कि किस बात में सबसे अधिक कठिनाई हुई।

प्रायः यह अनुभव होता है — साधारण बातें संकेतों से आसानी से कह दी जाती हैं, पर जैसे ही कोई नई जानकारी देनी हो (जैसे “गाड़ी दस मिनट देर से आएगी”), संकेत कम पड़ जाते हैं। ठीक यही कठिनाई यात्रा में श्रवणबाधित व्यक्ति के सामने आती है।

यात्रा में उनके लिए क्या-क्या आवश्यक होगा

  • लिखित सूचना — गाड़ी का समय, प्लेटफार्म, कार्यक्रम, चेतावनी: सब लिखकर या मोबाइल पर टाइप करके दिखाना। रेलवे स्टेशनों पर लगे प्रदर्शन-पट (डिस्प्ले बोर्ड) इसीलिए महत्वपूर्ण हैं।
  • आमने-सामने और रोशनी में बात — ताकि वे होंठ, चेहरा और भाव पढ़ सकें। पीठ पीछे से या मुँह ढककर बोलने से कुछ काम नहीं बनता। धीरे और साफ बोलिए, चिल्लाइए मत।
  • सांकेतिक भाषा — यदि समूह में कोई भारतीय सांकेतिक भाषा जानता हो तो सबसे अच्छा। न हो तो कुछ तय संकेत पहले से बना लीजिए — रुकना, चलना, खतरा, भोजन, शौचालय, मिलने का स्थान।
  • दृश्य संकेत — नक्शे, चित्र, तीर के निशान, रंगीन बैज। समूह का ध्यान खींचने के लिए हाथ हिलाना या हल्का-सा कंधे पर स्पर्श (पीछे से अचानक नहीं)।
  • उपकरण का ध्यान — कान की मशीन की अतिरिक्त बैटरी, उसे भीगने से बचाना, और मोबाइल में कंपन (वाइब्रेशन) चालू रखना।
  • व्यवहार — उनकी उपस्थिति में उनके बारे में किसी और से बात मत कीजिए। और यह मत मानिए कि सुनाई न देने का अर्थ समझ न आना है।
Did you know? भारत में भारतीय सांकेतिक भाषा (Indian Sign Language) के लिए एक अलग शोध एवं प्रशिक्षण केंद्र है। समाचारों में जो व्यक्ति कोने के छोटे खाने में हाथों से संकेत करता दिखता है, वह यही भाषा बोल रहा होता है।
प्र3.
(ग) यात्रा करते हुए ऐतिहासिक धरोहरों या भवनों की सुरक्षा के लिए आप किन किन बातों का ध्यान रखेंगे?
उत्तर

धरोहर एक बार टूट जाए तो दोबारा नहीं बनती — यही उसे साधारण इमारत से अलग करता है। इसलिए नियम कड़े होते हैं।

क्या नहीं करना हैक्यों
दीवारों पर नाम लिखना या खुरचनापत्थर पर लिखा निशान सैकड़ों वर्ष रहता है और मूल नक्काशी को स्थायी रूप से नष्ट कर देता है। यह कानूनन अपराध भी है।
मूर्तियों, नक्काशी या भित्तिचित्रों को छूनाहाथ का पसीना और तेल पत्थर तथा रंग को धीरे-धीरे खा जाता है। हजारों हाथ मिलकर वही करते हैं जो सदियों की बारिश नहीं कर पाई।
कहीं भी कचरा, पॉलीथिन या बचा खाना फेंकनाइससे परिसर गंदा होता है, आवारा पशु और कीट आते हैं और नमी से दीवारें खराब होती हैं।
दीवारों-रेलिंग पर चढ़ना, बाड़ पार करनापुरानी संरचना कमजोर हो चुकी होती है — खतरा इमारत को भी है और आपको भी।
मना होने पर भी फ्लैश या तिपाई से चित्र लेनातेज प्रकाश पुराने रंगों और भित्तिचित्रों को फीका करता है। इसीलिए कई जगह ‘नो फ्लैश’ लिखा होता है।
पत्थर, ईंट या कोई अवशेष ‘निशानी’ के रूप में ले जानाहर आगंतुक एक टुकड़ा ले जाए तो कुछ वर्षों में स्मारक ही नहीं बचेगा।

और क्या-क्या कीजिए — निर्धारित रास्ते पर ही चलिए; सूचना-पट पढ़िए और उनका पालन कीजिए; शोर मत कीजिए; गाइड या पुरातत्व विभाग के कर्मचारी की बात मानिए; कहीं टूट-फूट या नुकसान दिखे तो उसकी सूचना दीजिए; और जो दूसरे लोग नियम तोड़ रहे हों उन्हें विनम्रता से टोक दीजिए।

सोचिए: भारतेंदु जी ने 1871 में जो हरिद्वार देखा था, उसका बड़ा हिस्सा आज भी है — इसीलिए हम उनका वर्णन पढ़कर मिला सकते हैं। धरोहर की रक्षा का अर्थ यही है — आने वाली पीढ़ी को भी वही मिलावा जो हमें मिला
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ