मल्हार अध्याय 4 हरिद्वार के लिए एनसीईआरटी समाधान
अद्यतन 2026-09-05
इस अध्याय के बारे में
हरिद्वार कोई कहानी या निबंध नहीं, एक पत्र है। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने इसे कविवचन सुधा पत्रिका के संपादक के नाम लिखा और उसी में यह 14 अक्टूबर 1871 ई. को छपा। पत्र का आरंभ संबोधन से होता है — “श्रीमान कविवचन सुधा संपादक महामहिम मित्रवरेषु!” — और अंत हस्ताक्षर से — “आपका मित्र / यात्री / — भारतेंदु हरिश्चंद्र”। इसलिए यह एक साथ पत्र भी है और यात्रा-वृत्तांत भी। लेखक हरिद्वार को पहले आँख से दिखाते हैं — तीन ओर हरे पर्वत, पर्वतों पर फैली वल्ली (लताएँ), एक पैर पर खड़े तपस्वी-से बड़े वृक्ष, रंग-बिरंगे निडर पक्षी, बरसात के बाद की हरियाली, दो धाराओं में बँटी गंगा, नील धारा, चण्डिका देवी की मूर्ति वाला चुटीला पर्वत और हरि की पैड़ी का पक्का घाट। फिर वे हरिद्वार को मन से दिखाते हैं। यहाँ “केवल गंगा जी ही देवता हैं, दूसरा देवता नहीं”; पंडे “एक पैसे को लाख करके मान लेते हैं”; “इच्छा क्रोध की खानि जो मनुष्
अभ्यास
- मेरी समझ से
- मिलकर करें मिलान
- मिलकर करें चयन
- पंक्तियों पर चर्चा
- सोच-विचार के लिए
- अनुमान और कल्पना से
- लिखें संवाद
- ‘है’ और ‘हैं’ का उपयोग
- भावों की पहचान
- काल की पहचान
- पत्र की रचना
- पत्र
- शब्द से जुड़े शब्द
- लेखन के अनोखे तरीके
- आपकी बात
- प्रकृति का सौंदर्य और संरक्षण
- स्वास्थ्य और योग
- सज्जन वृक्ष
- अपने शब्द
- यात्रा के व्यय की गणना
- यात्रा सबके लिए
- आज की पहेली
- झरोखे से
- खोजबीन के लिए