कक्षा ८ हिंदी अध्याय 4 हरिद्वार के लिए एनसीईआरटी समाधान
अद्यतन 2026-09-19
इस अध्याय के बारे में
हरिद्वार कोई कहानी या निबंध नहीं, एक पत्र है। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने इसे कविवचन सुधा पत्रिका के संपादक के नाम लिखा और उसी में यह 14 अक्टूबर 1871 ई. को छपा। पत्र का आरंभ संबोधन से होता है — “श्रीमान कविवचन सुधा संपादक महामहिम मित्रवरेषु!” — और अंत हस्ताक्षर से — “आपका मित्र / यात्री / — भारतेंदु हरिश्चंद्र”। इसलिए यह एक साथ पत्र भी है और यात्रा-वृत्तांत भी। लेखक हरिद्वार को पहले आँख से दिखाते हैं — तीन ओर हरे पर्वत, पर्वतों पर फैली वल्ली (लताएँ), एक पैर पर खड़े तपस्वी-से बड़े वृक्ष, रंग-बिरंगे निडर पक्षी, बरसात के बाद की हरियाली, दो धाराओं में बँटी गंगा, नील धारा, चण्डिका देवी की मूर्ति वाला चुटीला पर्वत और हरि की पैड़ी का पक्का घाट। फिर वे हरिद्वार को मन से दिखाते हैं। यहाँ “केवल गंगा जी ही देवता हैं, दूसरा देवता नहीं”; पंडे “एक पैसे को लाख करके मान लेते हैं”; “इच्छा क्रोध की खानि जो मनुष्
त्वरित पुनरावृत्ति
| शब्द | अर्थ | पाठ की पंक्ति | अपने वाक्य में प्रयोग |
|---|---|---|---|
| वल्ली | लता, बेल | “अनेक प्रकार की वल्ली हरी-भरी सज्जनों के शुभ मनोरथों की भाँति फैलकर लहलहा रही है” | बरसात में दीवार पर वल्ली फैलकर हरी चादर-सी बिछ गई। |
| मनोरथ | मन की इच्छा, कामना | “सज्जनों के शुभ मनोरथों की भाँति” | परिश्रम करने वालों का मनोरथ देर से ही सही, पूरा होता है। |
| घाम | तेज धूप | “साधुओं की भाँति घाम, ओस और वर्षा अपने ऊपर सहते हैं” | दोपहर के घाम में खेत का काम बहुत कठिन हो जाता है। |
| अर्थी | जिसे कोई प्रयोजन हो; माँगने वाला, याचक | “इनके जन्म भी धन्य हैं जिनसे अर्थी विमुख जाते ही नहीं” | सच्चा दानी किसी अर्थी को खाली हाथ नहीं लौटाता। |
| बधिक | शिकारी, प्राणियों को मारने वाला | “नगर के दुष्ट बधिकों से निडर होकर कल्लोल करते हैं” | बधिकों के डर से पक्षी घने जंगल में चले गए। |
| कल्लोल | आनंद से उछलना-कूदना, क्रीड़ा करना | “अनेक प्रकार के जल-जंतु कल्लोल करते हुए” | बच्चे पानी में कल्लोल करते रहे और शाम हो गई। |
| मिष्ट | मीठा | “जल यहाँ का अत्यंत शीतल है और मिष्ट भी वैसा ही है” | कुएँ का जल ठंडा और मिष्ट था। |
| पाट | नदी की चौड़ाई | “श्री गंगा जी का पाट भी बहुत छोटा है पर वेग बड़ा है” | पहाड़ में नदी का पाट छोटा होता है, मैदान में चौड़ा। |
| बखेड़ा | झगड़ा, झंझट, फालतू का बवाल | “हरिद्वार में यह बखेड़ा कुछ नहीं है” | छोटी-सी बात पर इतना बखेड़ा खड़ा करना ठीक नहीं। |
| निदान | अंत में, आखिरकार | “निदान इस उत्तम क्षेत्र में जितना समय बीता, बड़े आनंद से बीता” | निदान सबने मिलकर वही रास्ता चुना जो सबसे सरल था। |
| पारायण | किसी ग्रंथ का आरंभ से अंत तक पूरा पाठ | “दिन में श्री भागवत का पारायण भी किया” | दादी ने सात दिन में रामायण का पारायण पूरा किया। |
| मौनावलंबन | चुप हो जाना, मौन धारण कर लेना | “वृत्तांत विदित करके मौनावलंबन करता हूँ” | अपनी बात कहकर वक्ता ने मौनावलंबन कर लिया। |
| स्थानदान | जगह देना; यहाँ — पत्रिका में छापना | “निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा” | संपादक ने मेरी कविता को अपनी पत्रिका में स्थानदान दिया। |
| विलक्षण | अनोखा, असाधारण | “पंडे भी यहाँ बड़े विलक्षण संतोषी हैं” | उसकी याददाश्त सचमुच विलक्षण है। |
| कुशा | पूजा में काम आने वाली एक पवित्र घास | “यहाँ की कुशा सबसे विलक्षण होती है” | पंडित जी ने कुशा की अँगूठी बनाकर उँगली में पहनी। |
अभ्यास
- मेरी समझ से
- मिलकर करें मिलान
- मिलकर करें चयन
- पंक्तियों पर चर्चा
- सोच-विचार के लिए
- अनुमान और कल्पना से
- लिखें संवाद
- ‘है’ और ‘हैं’ का उपयोग
- भावों की पहचान
- काल की पहचान
- पत्र की रचना
- पत्र
- शब्द से जुड़े शब्द
- लेखन के अनोखे तरीके
- आपकी बात
- प्रकृति का सौंदर्य और संरक्षण
- स्वास्थ्य और योग
- सज्जन वृक्ष
- अपने शब्द
- यात्रा के व्यय की गणना
- यात्रा सबके लिए
- आज की पहेली
- झरोखे से
- खोजबीन के लिए