मल्हार अध्याय 4 सोच-विचार के लिए

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
पाठ को पुन: ध्यान से पढ़िए, पता लगाइए और लिखिए। (क) “और संपादक महाशय, मैं चित्त से तो अब तक वहीं निवास करता हूँ…” लेखक का यह वाक्य क्या दर्शाता है? क्या आपने कभी किसी स्थान को छोड़कर ऐसा अनुभव किया है? कब-कब? (संकेत— किसी स्थान से लौटने के बाद भी उसी के विषय में सोचते रहना)
उत्तर

यह वाक्य क्या दर्शाता है: लेखक शरीर से हरिद्वार से लौट आए हैं, पर मन से नहीं लौटे। ‘चित्त’ का अर्थ है मन और ‘निवास करना’ का अर्थ है रहना — यानी “मेरा शरीर लौट आया, मन वहीं रह गया।” यह वाक्य तीन बातें एक साथ कहता है —

  1. अनुभव की गहराई — जो जगह केवल अच्छी लगती है, वह याद रहती है; जो जगह भीतर तक छू जाती है, वह मन में बस जाती है।
  2. वर्णन की सचाई — पत्र में जो लिखा गया है वह सुनी-सुनाई बात नहीं, अब तक जिया जा रहा अनुभव है।
  3. पत्र का उपसंहार — इसके तुरंत बाद लेखक कहते हैं कि अब वे “मौनावलंबन” करते हैं, यानी चुप हो जाते हैं। जो कहा नहीं जा सकता, उसके आगे चुप हो जाना ही ठीक है।
ध्यान दीजिए: ‘निवास करता हूँ’ वर्तमान काल में है, जबकि पूरी यात्रा भूतकाल में हो चुकी है। काल का यही बदलना बताता है कि वह अनुभव उनके लिए अब भी चालू है, बीता हुआ नहीं।

नमूना उत्तर (अपना अनुभव): पिछली गर्मियों में मैं अपनी नानी के गाँव गया था। लौटने के बाद कई दिनों तक कक्षा में बैठे-बैठे मुझे वहीं का आँगन, नीम का पेड़ और शाम को तालाब की ओर जाती पगडंडी याद आती रही। रात को छत पर लेटते ही लगता कि मैं गाँव की चारपाई पर हूँ। तभी मुझे समझ आया कि किसी जगह से लौट आना और उसे छोड़ देना — ये दो अलग बातें हैं।

Tip: अपना अनुभव लिखते समय एक ठोस चित्र जरूर दीजिए — कोई पेड़, कोई आवाज, कोई गंध। केवल “बहुत अच्छा लगा” लिखने से उत्तर कमजोर हो जाता है।
प्र2.
(ख) “पंडे भी यहाँ बड़े विलक्षण संतोषी हैं। एक पैसे को लाख करके मान लेते हैं।” लेखक का यह कथन आज के समाज में कितना सच है? क्या अब भी ऐसे संतोषी लोग मिलते हैं? अपने विचार उदाहरण सहित लिखिए।
उत्तर

पहले पंक्ति का अर्थ: ‘एक पैसे को लाख करके मान लेना’ का अर्थ यह नहीं कि वे एक पैसे को लाख गिनने की भूल करते हैं। अर्थ यह है कि जो थोड़ा-सा मिल जाए, उसे वे लाख जितना मानकर संतुष्ट हो जाते हैं। ‘विलक्षण’ शब्द से पता चलता है कि लेखक को यह बात अनोखी लगी।

आज के समाज में कितना सच: इसका उत्तर एकतरफा नहीं हो सकता, इसलिए दोनों पक्ष रखकर फिर अपनी बात कहिए।

पक्षतर्क
आज यह कम सच हैबाजार और विज्ञापन हर दिन नई जरूरत गढ़ते हैं। तीर्थस्थानों तक में मोल-भाव, तय ‘रेट’ और भीड़ का दबाव है। संतोष को अब अक्सर कमजोरी या पिछड़ापन मान लिया जाता है।
फिर भी यह सच बचा हुआ हैकम में खुश रहने वाले लोग आज भी हैं — गाँव के दस्तकार, छोटी दुकान वाले, मंदिर-मस्जिद के सेवक। वे प्रचार में नहीं आते, इसलिए दिखाई कम देते हैं; हैं कम नहीं।

नमूना उत्तर: मेरे विचार से यह कथन आज पूरी तरह सच नहीं, पर पूरी तरह झूठ भी नहीं है। हमारे मोहल्ले में एक बुजुर्ग साइकिल-मरम्मत करने वाले हैं। पंचर लगाने के वे तय पैसे ही लेते हैं और यदि कोई विद्यार्थी बाद में पैसे देने आता है तो कहते हैं — “रहने दो बेटा, हवा तो मुफ्त की है।” उनकी दुकान कभी बड़ी नहीं हुई, पर वे कभी परेशान नहीं दिखे। दूसरी ओर, बड़े बाजारों में मैंने ऐसे लोग भी देखे हैं जिनके पास सब कुछ होते हुए भी असंतोष ही दिखाई देता है। इससे मैंने यह समझा कि संतोष कमाई पर नहीं, स्वभाव पर निर्भर करता है — और यही बात भारतेंदु 150 वर्ष पहले भी कह रहे थे।

प्र3.
(ग) “मैं दीवान कृपा राम के घर के ऊपर के बंगले पर टिका था। यह स्थान भी उस क्षेत्र में टिकने योग्य ही है।” आपके विचार से लेखक ने उस स्थान को ‘टिकने योग्य’ क्यों कहा है? उस स्थान में कौन-कौन सी विशेषताएँ होंगी जो उसे ‘टिकने योग्य’ बनाती होंगी? (संकेत— केवल आराम, सुविधा या कोई और कारण भी।)
उत्तर

‘टिकने योग्य’ कहने का कारण अकेले आराम या सुविधा नहीं है। इसका प्रमाण अगला ही वाक्य है — “चारों ओर से शीतल पवन आती थी।” लेखक ने सुविधाओं की सूची नहीं गिनाई, वातावरण की बात कही। यानी उनके लिए वह स्थान ठहरने लायक इसलिए था कि वहाँ मन ठहर सकता था

विशेषतापाठ से संकेत / कारण
ऊँचाई और खुलापन“घर के ऊपर के बंगले पर” — ऊपरी मंजिल, इसलिए नीचे की भीड़ और शोर से दूर, और चारों ओर का दृश्य सामने।
शीतल, स्वच्छ हवा“चारों ओर से शीतल पवन आती थी” — पर्वतों और गंगा से आती हवा।
तीर्थ और घाट की निकटतावे रात के ग्रहण में स्नान कर सके और गंगा तट पर जाकर भोजन बना सके — इसका अर्थ है कि घाट पास ही था।
शांति और सुरक्षापूरे क्षेत्र के बारे में लेखक लिखते हैं — “झगड़े-लड़ाई का कहीं नाम भी नहीं था” और “हरिद्वार में यह बखेड़ा कुछ नहीं है।”
आत्मीय मेजबानवे किसी सराय में नहीं, दीवान कृपा राम के घर ठहरे थे। परिचित का घर यात्री को केवल छत नहीं, अपनापन भी देता है।
साधना के लिए अनुकूलतावहीं रहकर उन्होंने “दिन में श्री भागवत का पारायण भी किया” — यानी वह स्थान पढ़ने-ध्यान करने लायक भी था।
निष्कर्ष: यात्री के लिए ‘अच्छा ठिकाना’ वह नहीं जहाँ सबसे ज्यादा सुविधा हो, बल्कि वह है जो यात्रा के उद्देश्य के अनुकूल हो। भारतेंदु तीर्थ के अनुभव के लिए आए थे, इसलिए उनके लिए ऊँचाई, हवा, शांति और घाट की निकटता — यही ‘टिकने योग्य’ होने की कसौटी बनी।
प्र4.
(घ) “फल, फूल, गंध, छाया, पत्ते, छाल, बीज, लकड़ी और जड़; यहाँ तक कि जले पर भी कोयले और राख से लोगों का मनोरथ पूर्ण करते हैं।” इस वाक्य के माध्यम से आपको वृक्षों के महत्व के बारे में कौन-कौन सी बातें सूझ रही हैं?
उत्तर

यह एक वाक्य वृक्ष के महत्व की पूरी सूची बन जाता है। उसे क्रम से खोलिए —

वृक्ष का अंगमनुष्य के किस काम आता है
फल, बीजभोजन और अगली फसल — बीज से नया वृक्ष जन्म लेता है
फूल, गंधसौंदर्य, पूजा, इत्र और मन की प्रसन्नता
छायाराहगीर, पशु और किसान — सबको धूप से राहत
पत्तेपत्तल, चारा, खाद; और यही पत्ते प्राणवायु बनाते हैं
छाल, जड़औषधि; जड़ें मिट्टी को बाँधकर कटाव रोकती हैं
लकड़ीघर, दरवाजे, हल, नाव, ईंधन
कोयला और राखजल जाने के बाद भी — ईंधन और खेत की खाद

इससे जो बातें सूझती हैं:

  1. वृक्ष का कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता। जड़ से लेकर राख तक हर अंश किसी न किसी के काम आता है — प्रकृति में कचरा नाम की कोई चीज नहीं होती।
  2. वृक्ष बिना शर्त देता है। वह न पूछता है कि लेने वाला कौन है, न बदले में कुछ माँगता है। इसीलिए लेखक ने उसे ‘सज्जन’ कहा।
  3. वह मरकर भी देता है। यही इस वाक्य की सबसे बड़ी बात है — “यहाँ तक कि जले पर भी।” मनुष्य का उपकार प्रायः उसके जीवन के साथ समाप्त हो जाता है, वृक्ष का नहीं।
  4. इसलिए वृक्ष काटना केवल एक पेड़ खोना नहीं है — वह इन सारी चीजों को एक साथ खोना है। एक पेड़ लगाना इसलिए दान से कम नहीं।
भाषा पर ध्यान दीजिए: लेखक ने ‘वृक्ष उपयोगी हैं’ जैसा सीधा वाक्य नहीं लिखा। उन्होंने नौ चीजें गिनाईं और अंत में ‘यहाँ तक कि’ जोड़कर एक और चीज और बढ़ा दी। सूची जितनी लंबी होती जाती है, प्रभाव उतना ही गहरा होता जाता है — यह वर्णन की एक सीखने लायक विधि है।
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