मल्हार अध्याय 4 अनुमान और कल्पना से

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) “यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी है।” कल्पना कीजिए कि आप हरिद्वार में हैं। आप वहाँ क्या-क्या करना चाहेंगे?
उत्तर

यह कल्पना का प्रश्न है, पर इसे अच्छा बनाने का एक नियम है — जो कुछ आप करना चाहें, वह पाठ में वर्णित हरिद्वार से जुड़ा हो। तभी उत्तर में यह दिखेगा कि आपने पाठ पढ़ा है।

अच्छे उत्तर में क्या-क्या हो सकता है

  • हरि की पैड़ी के घाट पर बैठकर गंगा की धारा और शाम की आरती देखना
  • नील धारा और गंगा की मुख्य धारा — दोनों को अलग-अलग पहचानने की कोशिश करना
  • चण्डिका देवी की मूर्ति वाले उस छोटे चुटीला पर्वत तक चढ़ना और ऊपर से पूरा नगर देखना
  • कनखल जाकर उस स्थान को देखना जहाँ की कथा पाठ में दी गई है
  • पर्वतों पर फैली वल्ली और वहाँ की सुगंधित कुशा को पास से देखना
  • वृक्षों पर बैठे रंग-बिरंगे पक्षियों को देखना और उनकी आवाजें पहचानने का प्रयास करना
  • गंगा तट पर बैठकर, छींटों के बीच, अपनी यात्रा-डायरी लिखना

नमूना उत्तर: यदि मैं हरिद्वार जाऊँ तो सबसे पहले हरि की पैड़ी के पत्थरों पर बैठकर गंगा को केवल देखना चाहूँगा — बिना कुछ किए। लेखक ने लिखा है कि यहाँ जल के वेग का शब्द बहुत होता है; मैं आँखें बंद करके वही शब्द सुनना चाहूँगा। फिर मैं उस छोटे पर्वत पर चढ़ूँगा जिसके शिखर पर चण्डिका देवी की मूर्ति है, ताकि ऊपर से दोनों धाराओं को अलग-अलग देख सकूँ। शाम को मैं घाट की सीढ़ियों पर बैठकर अपनी डायरी में वही लिखूँगा जो उस दिन मैंने देखा — ठीक वैसे ही जैसे भारतेंदु जी ने अपने मित्र को पत्र लिखा था। और लौटते समय मैं वहाँ एक पौधा लगाना चाहूँगा, क्योंकि जिस जगह ने इतना दिया, उसे कुछ लौटाना भी चाहिए।

Tip: ऐसे उत्तर में क्रम रखिए — पहले क्या, फिर क्या, अंत में क्या। बिखरी हुई सूची से लिखा हुआ अनुच्छेद हमेशा अच्छा लगता है।
प्र2.
(ख) “जल के छलके पास ही ठंढे-ठंढे आते थे।” कल्पना कीजिए कि आप गंगा के तट पर हैं और पानी के छींटे आपके मुँह पर आ रहे हैं। अपने अनुभवों को अपनी कल्पना से लिखिए।
उत्तर

यह इंद्रिय-अनुभव लिखने का अभ्यास है। अच्छा उत्तर वही होगा जिसमें एक से अधिक इंद्रियाँ काम करें — केवल आँख नहीं।

इंद्रियक्या लिखा जा सकता है
स्पर्शछींटों की ठंडक, धूप में तपे चेहरे पर उनका पड़ना, पत्थर की गरमाहट, गीली हथेली पर चलती हवा
श्रवणधारा की कलकल, घंटियाँ, दूर से आती आरती, अपने ही मन का सन्नाटा
दृष्टिहरा-नीला जल, बहते दीये, ऊपर उड़ते पक्षी, हिलती परछाइयाँ
घ्राण / स्वादगीली मिट्टी और फूलों की गंध, होंठ पर आई बूँद का हल्का ठंडापन

नमूना उत्तर: मैं गंगा के किनारे उस चौड़े पत्थर पर बैठा हूँ जो दिन भर की धूप से अब भी गरम है। धारा पत्थर से टकराती है और छोटी-छोटी बूँदें उछलकर मेरे मुँह पर आ गिरती हैं — इतनी ठंडी कि पहली बार में आँखें अपने आप बंद हो जाती हैं। दो-चार बूँदें होंठों पर आ जाती हैं; पानी का हल्का-सा मीठापन महसूस होता है। कानों में लगातार कलकल की आवाज है, और उसी आवाज के भीतर से दूर कहीं घंटियों की झंकार आ रही है। सामने पानी पर एक दीया बहता चला जा रहा है। कुछ देर बाद मुझे लगता है कि मैं कुछ सोच ही नहीं रहा — बस बैठा हूँ। शायद इसी को लेखक ने ‘चित्त का निर्मल हो जाना’ कहा था।

लिखने का सूत्र: ‘बहुत अच्छा लगा’ मत लिखिए — वह दिखाइए जिससे अच्छा लगा। भाव को नाम देने के बजाय उसका कारण चित्र के रूप में रखिए; पाठक भाव तक स्वयं पहुँच जाएगा।
प्र3.
(ग) “सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं।” यदि पेड़-पौधे सच में मनुष्यों की तरह व्यवहार करने लगें तो क्या होगा?
उत्तर

इस प्रश्न में मजा तभी है जब आप दोनों संभावनाएँ सोचें — अच्छा भी और डरावना भी

यदि पेड़ मनुष्य जैसे हो जाएँ तो…क्या हो सकता है
वे बोल सकतेवे बता पाते कि उन्हें पानी कब चाहिए, कौन-सी बीमारी लगी है, कहाँ की मिट्टी मर रही है। खेती और वन-रक्षा बहुत आसान हो जाती।
वे मना कर सकतेकुल्हाड़ी उठते ही वे विरोध करते। तब शायद पेड़ काटना उतना ही गंभीर माना जाता जितना किसी को चोट पहुँचाना।
वे चल-फिर सकतेवे सूखे इलाके छोड़कर चले जाते — और सबसे जरूरतमंद जगहें ही सबसे पहले उजड़ जातीं।
उनमें मनुष्य के अवगुण भी आ जातेवे भी छाया और फल के बदले कुछ माँगते, हिसाब रखते, नाराज होते। तब “पत्थर मारने से फल देते हैं” वाली बात ही समाप्त हो जाती।

नमूना उत्तर: यदि पेड़-पौधे मनुष्यों की तरह व्यवहार करने लगें तो पहली नजर में यह बहुत अच्छा लगेगा — वे अपनी जरूरत बता सकेंगे, अपने कटने का विरोध कर सकेंगे और शायद हम उन्हें वस्तु समझना छोड़ देंगे। पर थोड़ा और सोचने पर एक डर भी लगता है। मनुष्य जैसा बनने का अर्थ है — बदले में कुछ चाहना, नाराज होना, हिसाब रखना। तब कोई पेड़ यह भी कह सकता है कि “मैंने कल छाया दी थी, आज नहीं दूँगा।” और तब वृक्षों की वह सबसे बड़ी विशेषता ही नष्ट हो जाएगी जिसकी प्रशंसा भारतेंदु ने की थी — बिना शर्त, बिना बदले, बिना थके देते रहना। इसलिए मुझे लगता है कि पेड़ जैसे हैं वैसे ही ठीक हैं; बदलने की जरूरत उनमें नहीं, हमारे व्यवहार में है।

प्र4.
(घ) “यहाँ पर श्री गंगा जी दो धारा हो गई हैं— एक का नाम नील धारा, दूसरी श्री गंगा जी ही के नाम से।” इस पाठ में ‘गंगा’ शब्द के साथ ‘श्री’ और ‘जी’ लगाया गया है। आपके अनुसार उन्होंने ऐसा क्यों किया होगा?
उत्तर

क्योंकि लेखक के लिए गंगा केवल एक नदी नहीं, आदरणीय हैं। ‘श्री’ और ‘जी’ हिंदी में आदर बताने वाले शब्द हैं — ‘श्री’ नाम से पहले लगता है, ‘जी’ नाम के बाद।

गंगा → केवल नदी का नाम
श्री गंगा जी → आदरणीय, पूज्य, अपनी-सी
+ क्रिया भी बदल जाती है → “श्री गंगा जी दो धारा हो गई हैं
सबसे बड़ा प्रमाण पाठ में ही है: लेखक लिखते हैं — “यहाँ केवल गंगा जी ही देवता हैं, दूसरा देवता नहीं।” ‘गंगा’ एकवचन शब्द है, फिर भी उसके साथ ‘हैं’ लगा है। यही आदरार्थ बहुवचन है, जिसकी चर्चा अगली गतिविधि (‘है’ और ‘हैं’ का उपयोग) में की गई है। यानी आदर केवल ‘श्री’ और ‘जी’ में नहीं, वाक्य की क्रिया तक में उतर आया है।

इसके तीन कारण एक साथ काम कर रहे हैं —

  1. भारतीय परंपरा — नदियों को माता और देवी माना जाता है; गंगा को ‘गंगा माँ’ कहा जाता है।
  2. पत्र का विषय — यह तीर्थयात्रा का वर्णन है। जिस पूरे पत्र का भाव भक्ति और श्रद्धा का हो, उसमें नदी का नाम रूखा नहीं आ सकता।
  3. उस समय की भाषा-शैली — 150 वर्ष पहले पूज्य व्यक्तियों, ग्रंथों और स्थानों के नाम के साथ ‘श्री’ लगाना सामान्य था। पाठ में और भी उदाहरण हैं — “श्री भागवत का पारायण”।
अपने आसपास देखिए: हम आज भी कहते हैं — रामायण जी, गीता जी, गुरु जी, माता जी, अमृतसर के लिए ‘श्री अमृतसर साहिब’। भाषा में आदर इसी तरह घुला रहता है।
प्र5.
(ङ) कल्पना कीजिए कि आप हरिद्वार एक श्रवणबाधित या दृष्टिबाधित व्यक्ति के साथ गए हैं। उसकी यात्रा को अच्छा बनाने के लिए कुछ सुझाव दीजिए।
उत्तर

सबसे पहली बात — उनसे पूछिए कि उन्हें क्या चाहिए, अपने मन से मदद थोपिए मत। सहायता तभी सहायता है जब वह साथी को स्वतंत्र बनाए, निर्भर नहीं।

किसके लिएसुझाव
दृष्टिबाधित साथी
  • दृश्य को शब्दों में कहिए — “हमारे बाईं ओर घाट की सीढ़ियाँ हैं, सामने धारा तेज बह रही है, दाहिनी ओर मंदिर है।”
  • बाकी इंद्रियों को काम में लगाइए — जल के ठंडे छींटे, धारा का कलकल शब्द, फूलों और अगरबत्ती की गंध, घाट के पत्थर की गरमाहट।
  • चलते समय अपनी कोहनी पकड़ने दीजिए, उन्हें आगे मत खींचिए। सीढ़ी, ढलान या गड्ढा आने से पहले बताइए — “तीन सीढ़ियाँ नीचे।”
  • छड़ी, ब्रेल-नक्शा या मोबाइल के स्क्रीन-रीडर का प्रबंध रखिए; भीड़ में मिलने का एक निश्चित स्थान तय कर लीजिए।
श्रवणबाधित साथी
  • बात करते समय आमने-सामने रहिए और साफ रोशनी में — ताकि वे होंठ और चेहरा पढ़ सकें। मुँह ढककर या पीठ पीछे से मत बोलिए।
  • जरूरी बातें लिखकर या मोबाइल पर टाइप करके दिखाइए; संकेतों और चित्रों का प्रयोग कीजिए।
  • घोषणाएँ (गाड़ी का समय, आरती का समय, कोई चेतावनी) तुरंत उन तक पहुँचाइए — वे उन्हें सुन नहीं पाएँगे।
  • यदि संभव हो तो सांकेतिक भाषा जानने वाले साथी या गाइड को साथ रखिए; समूह में हाथ हिलाकर ध्यान खींचने का एक तय संकेत बना लीजिए।
दोनों के लिए समानभीड़ कम होने के समय का चयन, रुक-रुककर चलना, बैठने की जगह पहले से देख लेना, सुगम्य (रैंप वाले) रास्ते चुनना, और सबसे जरूरी — उनसे बच्चों जैसा नहीं, बराबरी का व्यवहार।
सोचने की बात: पाठ में लेखक हरिद्वार को आँख से देखते हैं, पर उसका असर वे मन पर बताते हैं — “मन शुद्ध हो जाता है।” इसका अर्थ यह हुआ कि किसी स्थान का असली अनुभव केवल आँखों का मोहताज नहीं। सही सहायता मिले तो हर व्यक्ति उस अनुभव तक पहुँच सकता है।
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