यह कल्पना का प्रश्न है, पर इसे अच्छा बनाने का एक नियम है — जो कुछ आप करना चाहें, वह पाठ में वर्णित हरिद्वार से जुड़ा हो। तभी उत्तर में यह दिखेगा कि आपने पाठ पढ़ा है।
अच्छे उत्तर में क्या-क्या हो सकता है
- हरि की पैड़ी के घाट पर बैठकर गंगा की धारा और शाम की आरती देखना
- नील धारा और गंगा की मुख्य धारा — दोनों को अलग-अलग पहचानने की कोशिश करना
- चण्डिका देवी की मूर्ति वाले उस छोटे चुटीला पर्वत तक चढ़ना और ऊपर से पूरा नगर देखना
- कनखल जाकर उस स्थान को देखना जहाँ की कथा पाठ में दी गई है
- पर्वतों पर फैली वल्ली और वहाँ की सुगंधित कुशा को पास से देखना
- वृक्षों पर बैठे रंग-बिरंगे पक्षियों को देखना और उनकी आवाजें पहचानने का प्रयास करना
- गंगा तट पर बैठकर, छींटों के बीच, अपनी यात्रा-डायरी लिखना
नमूना उत्तर: यदि मैं हरिद्वार जाऊँ तो सबसे पहले हरि की पैड़ी के पत्थरों पर बैठकर गंगा को केवल देखना चाहूँगा — बिना कुछ किए। लेखक ने लिखा है कि यहाँ जल के वेग का शब्द बहुत होता है; मैं आँखें बंद करके वही शब्द सुनना चाहूँगा। फिर मैं उस छोटे पर्वत पर चढ़ूँगा जिसके शिखर पर चण्डिका देवी की मूर्ति है, ताकि ऊपर से दोनों धाराओं को अलग-अलग देख सकूँ। शाम को मैं घाट की सीढ़ियों पर बैठकर अपनी डायरी में वही लिखूँगा जो उस दिन मैंने देखा — ठीक वैसे ही जैसे भारतेंदु जी ने अपने मित्र को पत्र लिखा था। और लौटते समय मैं वहाँ एक पौधा लगाना चाहूँगा, क्योंकि जिस जगह ने इतना दिया, उसे कुछ लौटाना भी चाहिए।